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***वीरेन्द्र याज्ञिक***

          कुछ दिन पहले मुंबई के एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक इकोनॉमिक           टाइम्स में विलियम डी कोहन की एक रिपोर्ट छपी थी, जिसमें उन्होंने अमेरिका के वालस्ट्रीट में बड़े वित्तीय संस्थानों में काम कर रहे नौजवानों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्तियों का वर्णन किया था। उस रिपोर्ट में कोहन ने बताया कि किस प्रकार वित्तीय संस्थानों में काम कर रहे नौजवान वित्तीय विश्लेषक बिना आराम किए लगातार आठ-आठ दिन-रात काम में लगे रहते हैं। काम का दबाव और अनथक परिश्रम करते रहने से मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि वे नशे, ड्रग्स और शराब के शिकार हो जाते हैं और एक ऐसी स्थिति आती है कि वे अंततोगत्वा आत्महत्या कर लेते हैं। कोहन ने अपनी रिपोर्ट में ऐसे कई उदाहरण दिए, जिसमें थामस हूयग्स का एक उदाहरण था। २२ साल के उस नवयुवक ने अपने आवास की २७वीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी। इससे पहले भी दिल्ली के गुप्ता नामक युवक की आत्महत्या की खबर आई थी। यह नौजवान अपनी माता-पिता की एकमात्र संतान था और तीन चार दिनों तक लगातार काम करने के दबाव को वह सह न सका और अपने प्राणों से हाथ धो बैठा। अपनी रिपोर्ट में कोहन कहते हैं कि चूंकि ये पढ़े लिखे नौजवान केवल धन कमाने और अपने कैरियर बनाने में लगे रहते हैं, अतएव इनका परिवार, समाज तथा अन्य सामाजिक गतिविधियों से कोई संबंध नहीं रहता है। जीवन एकाकी और नीरस हो जाता है, जिसका परिणाम आत्महत्या के रूप में हमारे सामने आता है। इस प्रकार की भयावह स्थिति से निपटने के लिए जे.पी.मॉर्गन जैसे बड़े वित्तीय संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेमी डिमान को अपने नौजवान अधिकारियों को समझाना पड़ा, ‘‘आपको अपना ख्याल स्वयं रखना चाहिए। आप यह सुनिश्चित करें कि आप मानसिक, शारीरिक और आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ हैं। जे.पी. मॉर्गन आपके लिए यह काम नहीं कर सकता। यदि आप अपने मन, शरीर और आत्मा का ख्याल नहीं रखेंगे तो आप स्वयं को बरबाद कर लेंगे। आपके पारिवारिक और सामाजिक जीवन तथा संबंध नष्ट होंगे और आपके जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा।’’

          यह चित्र केवल अमेरिका के वालस्ट्रीट का ही नहीं है, बल्कि विश्व में भारत सहित सभी देशों का है, जहां आर्थिक विकास और आर्थिक समृद्धि की अंधी दौड़ चल रही है। सामाजिक विचारक तथा मनोवैज्ञानिक समाज में बढ़ रही इस प्रवृत्ति से चिंतित हैं। धन तथा सुख के साधन को अधिक से अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए जो प्रतिस्पर्धा चल रही है, उससे मानव जीवन अशांत, अस्थिर तथा अत्यधिक तनाव से ग्रस्त होता चला जा रहा है, जिसकी परिणति परिवारों के बिखरने तथा समाज में विघटन के रूप में हो रही हैं। इस स्थिति से बचने के लिए मनोचिकित्सक, शिक्षाविद् तथा समाज विचारक एक ही रास्ता बता रहे हैं कि समाज में मानवीय जीवन मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा की जाए; ताकि व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सके और शांतिपूर्ण सार्थक जीवन जी सके।

          आज के संदर्भ में जबकि मानव जीवन संघर्ष, गलाकाट प्रतियोगिता और प्रतिकूलताओं से भरा हुआ है, ऐसे में मानव मात्र को रास्ता दिखाने वाला, जीवन के विषाद को समाप्त कर उसमें उत्साह का संचार करने वाला साथ ही साथ मानव को सुख, समृध्दि और सभी प्रकार की संपन्नता प्रदान करने वाला यदि कोई ग्रंथ है तो वह श्रीमद्भगवत गीता है। गीता का अध्ययन, मनन, चिंतन व्यक्ति को समृध्दि के साथ साथ शांति और स्थिरता प्रदान करता है। जिस प्रकार आज की परिस्थितियां हैं, समस्त सुख सुविधाएं तथा साधन होने के बावजूद संपूर्ण विश्व आतंक, अन्याय और अनिश्चय की स्थिति से जूझ रहा है, वैसी ही परिस्थितियां उस समय भी थीं, जब महाभारत का युद्ध हुआ था और कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के रणांगण में गीता का यह दिव्य संदेश दिया था। तब से लेकर आज तक पांच हजार दो सौ वर्ष की इस कालावधि में गीता जीवन का संगीत बन कर मानव मात्र का उपकार कर रही है। सुविख्यात कवि श्री अरुण प्रकाश अवस्थी की निम्न पंक्तियां हमें इसका बोध कराती हैं।

 गीता तो यदुवंश-शिरोमणि वासुदेव की वाणी है

 यह आचार संहिता पावन सुरसरि सी कल्याणी है।

 जीवन रण में विजय दिलाने वाली यह जगदंबा है

 स्वर्ग और अपवर्ग इसी में यह हीरक अवलंबा है

 गीता कर्म ज्ञान का संगम यह तम में दिनमान है

 गीता का आदर्श ग्रहण कर जीवित हिन्दुस्तान है।

       अतः श्रीमद् भगवद् गीता विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है, जिसे भारत की सांस्कृतिक चेतना ने प्रदान किया है। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए महात्मा गांधी से किसी ने पूछा कि बापू अनेक प्रतिकूलताओं और विपरीत परिस्थितियों में आप किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होते। गांधीजी का उत्तर था कि गीता मेरी मां है, जब भी मैं निराश होता हूं, हताशा के सागर में डूबने लगता हूं, जीवन से हार मानने लगता हूं, तब मैं विनम्र भाव से गीता माता की शरण में, उसकी ममतामयी गोद में जा बैठता हूं। बस वहां मुझे संजीवनी प्राप्त हो जाती है और जीवन में आगे बढ़ने का उत्साह मिल जाता है। मैं ऊर्जा से युक्त होकर अपने पथ पर आगे बढ़ जाता हूं। लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्य लिख कर कर्म के नए सिध्दान्त का प्रतिपादन कर दिया। उन्हें जीवन के संघर्ष में सफल होने का सूत्र श्रीगीताजी में प्राप्त हुआ, और वे लोकमान्य बन गए।

          आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्योग तथा सुख-साधनों के निर्माण में मानव ने चाहे जितनी भी प्रगति कर ली है। मानव मंगल ग्रह तक पहुंच गया है, खोज चल रही है कि वहां जीवन है या नहीं; किन्तु धरती पर मानव जीवन में मंगल का अभाव क्यों हो रहा है, इसका कोई विचार क्यों नहीं हो रहा है। श्री गीता जी में इन प्रश्नों का उत्तर है, क्योंकि समाज और व्यक्ति के जीवन में शुभ, मंगल और आनन्द की सृष्टि गीता का ज्ञान कराती है और उस शून्य को भरती है जो आधुनिक जीवन की विसंगतियों के कारण उत्पन्न हो गई है। अज्ञान के अंधेरे को समाप्त कर ज्ञान के उजास को भर मानव जीवन का पथ प्रशस्त करती है।

          आज जिस वातावरण में व्यक्ति अपना जीवन जी रहा है, उसमें बहुत आवश्यक है कि उसके काम करने के ढ़ंग में संतुलन बना रहे तथा विचारों में स्थिरता और सात्विकता बनी रहे। गीता का चिंतन एवं मनन व्यक्ति के विचारों को सात्विकता से पुष्ट करता है और निराशा के गर्त से निकाल कर मन में आशा का नया संचार करता है।

          गीता का प्रारंभ जीवन में विषाद से होता है। कुरुक्षेत्र के रणांगण में कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी हैं। कौरव और पांडवों के बीच युध्द की रणभेरी बज रही हैं। अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि वह उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच में प्रस्थापित करें। कृष्ण दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच में रथ स्थापित करते हैं और तब अर्जुन देखते हैं कि उन्हें जिनसे युध्द करना है, जिनको मारना है, वे उनके सगे संबंधी गुरू, पितामह आदि ही हैं। अर्जुन मोहग्रस्त होते हैं। विषाद से युक्त होकर अर्जुन कृष्ण के सामने गांडीव धनुष्य उतार कर रथ के पिछले भाग में जा बैठते हैं और कहते हैंः-

          सीदन्ति मम् गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

          वेपुथश्च शरीरे मे रामहर्षश्च जायते॥

       मेरा शरीर फट रहा है, मुख सूख रहा है, शरीर रोमांचित है। मेरा मन भ्रान्त हो गया है। अर्जुन के विषाद और अवसाद से ही श्री गीता जी का प्रारंभ होता है। तब कृष्ण अर्जुन को सांत्वना भी देते हैं और साथ ही कठोर वचनों से उसे प्रताड़ित करते हुए उसको प्रोत्साहित भी करने का प्रयत्न करते हैं।

          कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्

          अनार्थजुष्टमस्वर्ग्यम कीर्तिकरमर्जुन

          क्लैव्य मा स्म गमः पार्थ गैतत्वव्युपपद्यते

          क्षुद्रं हृदय दौर्बल्य व्यक्त्वोतिष्ठ परतप॥

       हे अर्जुन, कायरों की तरह बातें मत करो, नपुंसक मत बनो, तुम योद्धा हो, मन छोटा मत करो, उठो अपना कर्तव्य निभाओ और युध्द करो। तब अर्जुन जो उत्तर देते हैं, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं, अर्जुन कहते हैं –

          कार्पण्यदोषा पहत स्वभाव, पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढ़चेता

          यच्छ्रेयंः स्थान्निश्चितं ब्रूहितन्मे, शिष्यस्तेहंशाधिमांत्वां प्रपन्नम्

 

 

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