यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध का आगाज़

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘वर्तमान घटनाओं का यूक्रेन एवं यूक्रेनी लोगों के हितों का उल्लंघन करने की इच्छा से कोई लेना देना नहीं है। वे उन लोगों से रूस की रक्षा करने से जुड़े हैं, जिन्होंने यूक्रेन को बंधक बना लिया है और हमारे देश के विरुद्ध इसका इस्तेमाल करने का जोरदार प्रयास कर रहे हैं।

आखिरकार रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र की रक्षा करने हेतु एक विशेष सैन्य अभियान का आदेश दे दिया। इसके साथ ही रूस ने अमेरिका पर नाटो संगठन के विस्तार के साथ ही अपनी ‘लाल रेखा’ को पार करने का खुला आरोप लगाया था। पुतिन ने एक बयान में सुबह ही कहा कि रूस की यूक्रेन पर कब्जा करने की कोई योजना नहीं है और यूक्रेन की सेना अपने हथियार डाल दे किन्तु क्षण भर बाद ही यूक्रेन पर एक आकस्मिक, आपेक्षित आक्रमणात्मक कार्यवाही करके विश्व को एक भारी संकट में डाल दिया है। यूक्रेन का कहना है कि रूस ने एक बड़े पैमाने पर हम पर हमला कर दिया है। इसी दौरान रूसी सैन्य वाहनों से बेलारुस सहित उत्तर में खार्किव दक्षिण में ओडेसा और पूर्व में लुहान्स्क के अनेक स्थानों पर सीमा उल्लंघन की बात भी सामने आयी है। आज के रूस द्वारा आक्रमण में यूक्रेन के प्रमुख शहरों में राजधानी कीव, इवानो फ्रैंकीस्क, बार्किव, क्रामतोस्की, डिनीप्रो, ओडेसा तथा मारियूपोल में जोरदार प्रक्षेपास्त्रों के प्रहार किए गये।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘राष्ट्रपति पुतिन ने एक पूर्व सुनियोजित युद्ध चुना है जो जीवन एवं मानव पीड़ा हेतु एक बड़ा विनाशकारी व घातक परिणाम लायेगा। ‘ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि ‘‘वह यूक्रेन की इस भयानक घटना से स्तब्ध है तथा राष्ट्रपति पुतिन ने इस अकारण आक्रमण को आरम्भ करके रक्तपात और विनाश का रास्ता चुना है।’’ इस आकस्मिक हमले में यूक्रेन के 40 से अधिक सैनिक तथा लगभग 10 नागरिक मारे गये हैं। इसी बीच यूक्रेन ने दावा किया है कि लुहान्स्क में 7 रूसी लड़ाकू विमानों और एक हेलीकॉप्टर तथा 50 रूसी सैनिकों को मार गिराया है। इसके साथ ही रूस के साथ यूक्रेन ने राजनयिक सम्बन्ध तोड़ दिये हैं। रूसी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि उसने आक्रमण आरम्भ होने के तुरन्त  बाद उसने यूक्रेन के सैन्य हवाई अड्डों और उसकी वायु रक्षा प्रणालियों को पूरी तरह से निष्प्रभावी कर दिया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इस हमले पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘वर्तमान घटनाओं का यूक्रेन एवं यूक्रेनी लोगों के हितों का उल्लंघन करने की इच्छा से कोई लेना देना नहीं है। वे उन लोगों से रूस की रक्षा करने से जुड़े हैं, जिन्होंने यूक्रेन को बंधक बना लिया है और हमारे देश के विरुद्ध इसका इस्तेमाल करने का जोरदार प्रयास कर रहे हैं। उधर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एन्टोनियो गुटेरेस ने पुतिन से रूस में अपने सैनिक वापस बुलाने को एक जोरदार अपील की है और कहा कि मानवता के नाम पर यूरोप में इसे शुरू न करें, जो सदी की शुरूआत के बाद से सबसे भयानक युद्ध हो सकता है।

रूस ने अपनी एक व्यापक रणनीति के तहत पहले पूर्वी यूक्रेन के दो क्षेत्रों डोनेत्स्क तथा लुहांस्क को पीपुल्स रिपब्लिक की मान्यता प्रदान करके एक जोरदार झटका धीरे से दे दिया। रूस के इस निर्णय के विरुद्ध अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य योरोपीय राष्ट्रों की ओर से अनेक आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे, किन्तु पुतिन की चुप्पी कुछ और ही रणनीति, राजनय तथा सामरिक ताने-बाने बुनने में लगी हुई थी। रूस ने पहले ही यह कहना शुरू कर दिया था कि यूक्रेन सबसे पहले अपना नाटो (उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन) की सदस्यता लेने का विचार छोड़ दे। इस विवाद का सर्वाेत्तम समाधान यही हो सकता है कि यूक्रेन की वर्तमान सरकार स्वयं ही पहल करके नाटो संगठन की सदस्यता स्वीकार करने से खुद ही मना कर दे और निष्पक्ष राष्ट्र बन कर रहे और किसी के प्रलोभन में न आये। इसके साथ ही राष्ट्रपति पुतिन ने यह भी कहा था कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय इस बात पर भी गंभीरता से विचार करे कि क्रीमिया को रूस के एक हिस्से के रूप में मान्यता दे। रूस यूक्रेन के हवाई अड्डों व बन्दरगाहों को विशेष रूप से इसलिए निशाना बना रहा है ताकि उसकी मदद के लिये बाहर से रसद न आ सके।

वास्तव में यह विचारणीय विषय है कि यूक्रेन के उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) के सदस्य बनने को लेकर रूस का इस मामले में चिन्तित होना लाज़मी सा लगता है। इस समय नाटो के 27 देश जोकि यूक्रेन की योरोपीय सीमा के साथ जुड़े हुए हैं। नाटो संगठन द्वारा 1997 के बाद लगभग 14 देशों को इस संगठन का सदस्य बनाया है। निश्चित रूप से इस प्रकार अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो संगठन का शक्ति अनवरत बढ़ती नज़र आ रही है। रूस एवं अमेरिका के बीच खुली तनातनी के वातावरण में यूक्रेन को यदि नाटो का सदस्य बना लिया गया, तो रूस ही रूस प्रत्यक्ष रूप से नाटो देशों के निशाने में आ जायेगा। आखिर इसी डर ने आकस्मिक, अनापेक्षित आक्रमण आरम्भ करके रूस ने अपनी सैन्य संक्रिया आरम्भ कर दी।

दुनिया भर की चिन्तायें एक बार बढ़ी हैं कि क्या तीसरे विश्व युद्ध का आगाज़ हो गया है। इसमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए यह युद्ध वैश्विक अस्थिरता, अशान्ति और अनिश्चितता को अवश्य ही प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा ही देगा। ऐसा ही प्रतीत होने लगा है कि दो बड़ी शक्तियों की लड़ाई में यूक्रेन कहीं बीच में ही बुरी तरह से न पिस जाये। इससे एक कयास यह भी लगाया जा रहा कि चालाक चीन रूस की शह पर ताइवान पर अपना कब्जा करने की कोशिश कहीं न करे। चीन ने अपने चक्रव्यूह में घेरकर पाकिस्तान को भी रूस की ओर अपनी मित्रता व कृतज्ञता के लिए आगे बढ़ा दिया है। पाकिस्तान को भी कहीं न कहीं डर सता रहा है कि भारत की अब मौका पाकर पकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पी.ओ.के.) पर हमला न कर दे। इस युद्ध से वैश्विक संतुलन असंतुलित होने की सम्भावनाओं को एक बड़ा बल मिलेगा।

इस आक्रमण एवं अमेरिकी रूस की तनातनी के बीच भारत का तटस्थ रहना भी चिन्ता एवं चुनौती का विषय बना है क्योंकि भारत के समक्ष चीन की एक बड़ी चुनौती मुंह खोले हुए खड़ी है। भारत को जहां हिन्द प्रशान्त क्षेत्र के लिए अमेरिका सहित पश्चिमी देशों का सक्रिय सहयोग मिला है, वहां हमारी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस की एक बड़ी भूमिका रहती है। एक अनुमान के आधार पर रूस भारत को लगभग 60 प्रतिशत रक्षा सामग्री की आपूर्ति करता है। इस आक्रमण से भारत की एक बड़ी राजनय परीक्षा अग्नि परीक्षा के रूप में खड़ी हो गयी है। भारत को दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए बड़ी ही सतर्कता, सजगता, संयम के साथ सामयिक विश्लेषण की दृष्टि से काम लेना होगा।

चीन ने एक बयान में कहा कि वह अमेरिका की तरह युद्धरत दोनों देशों को हथियार की आपूर्ति या युद्ध में सहायता से जुड़े किसी प्रकार की सामग्री की आपूर्ति नहीं करेगा। रूस के निकट सहयोगी चीन ने यूक्रेन की इस लड़ाई में सभी पक्षों से संयम बरतने तथा तनाव बढ़ाने वाले कोई भी कदम उठाने से परहेज करने की एक अपील की है। इसके साथ ही चीन का कहना है कि ‘हम राजनयिक समाधान ढूंढने में जुटे हुए सभी पक्षों का स्वागत एवं उत्साहवर्धन करते हैं। इसके साथ ही चीन ने रूस के विरुद्ध अमेरिका की पाबन्दियों की ओर कहा प्रतिबन्ध समस्याओं के समाधान के सभी मौलिक रूप से कारगर तरीके नहीं हैं और चीन सदैव ही एकतरफा प्रतिबन्धों का विरोध करता है।

निःसन्देह इस तीसरे विश्व युद्ध की शुरूआत को पहले ही लगाम लगाने के लिए सभी को सामूहिक रूप से मजबूत मोर्चेबन्दी बनाने की जरूरत है। हम सभी जानते हैं कि मानव जाति के सामने आज एक अनिश्चित भविष्य मुंह खोलकर खड़ा हो गया है। यदि हम समय रहते एक ठोस एवं प्रभावी कदम उठाने में सफल नहीं हो सके, तो सम्पूर्ण विश्व विनासक युद्ध में बुरी तरह घिर जायेगा।

 -डॉ. सुरेन्द्र कुमार मिश्र                                                                                                

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  1. Anonymous

    सटीक विश्लेषण। 🙏🙏

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