हस्ती, मिटती नहीं हमारी…! आज बस्ती दिखती नही हमारी

प्यारे हिंदुओं, यदि आप ये मानते हैं कि आपकी हस्ती नहीं मिटी है तो आप बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं। दरअसल आपको एक ज़माने से इस धोखे में रखा जा रहा है कि आप दुनिया की वह क़ौम हैं कि जिसको ज़माना भी नहीं मिटा पाया।
ये आपकी नादानी का आलम ही है कि आप ये सोचते हैं कि “सच बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी…” नामक पंक्तियाँ आपकी तारीफ़ में लिखी गयी हैं। मगर शायद आपको ये नहीं पता कि ये पंक्तियाँ लिखने वाले घोर जेहादी शायर थे “मोहम्मद इक़बाल” जो सबसे पहले एक अलग इस्लामी मुल्क़ पाकिस्तान की संकल्पना करने वाले पाकिस्तानियों में से एक थे। “सारे जहाँ से अच्छा….” नामक नज़्म में जेहादी शायर मोहम्मद इक़बाल ने अल्लाह की इस्लामी सल्तनत की तारीफें करते हुए सारी ज़मीन को अल्लाह की ज़मीन बताते हुए पूरी दुनिया में एक तरह से “ग़ज़वा-ए-आलम” का ऐलान किया था।
प्यारे भाइयों और बहनों, ज़मीनी सच्चाई यह है कि हम पिछले 1,000 सालों से लगातार मिटते और सिकुड़ते जा रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश कश्मीर, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर, – जहाँ क्रमशः 150 वर्ष, 70 वर्ष, 45 वर्ष, 30 वर्ष, 70 वर्ष, 55 वर्ष एवं 30 वर्ष पूर्व तक हम ठीक-ठाक तरीके से आबाद थे, वहाँ हालात ये हैं कि आजकल वहाँ “बस्ती दिखती नहीं हमारी।” धीरे-धीरे बंगाल, केरल और फ़िर कमोबेश असम, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार एवं गोवा के अधिकांश हिस्सों में भी यही प्रक्रिया चालू है। अब आप स्वयं ये हिसाब लगा लीजिये कि आप वर्ष 2050 तक कितने राज्यों में बचे रह जाएंगे?
भारत की वर्ष 1947 की जनगणना में आप 85% थे जो अब 2016 में 78% पर आ चुके हैं। इन 78% में भी घोषित रूप से 28% सेकुलर और 19% वामपंथी हैं जो सदैव आपके विरुद्ध रहे हैं। अब बचे मात्र 31%। बस यही आपकी असल संख्या है।
… और मज़े की बात ये है कि 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग इसी के आस-पास भाजपा का वोट प्रतिशत भी है…!

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