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    ***जीतेन्द्र सुमन ***

 ज्ञान की गंगा किसी की भी चौखट से गुजर सकती है. …इसके ज्वलंत उदाहरण हैं छपरा ज़िला के सिताबदियारा की माटी में जन्मे, पले-बढ़े भोजपुरी लोक-कला के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर। शिक्षा के नाम पर ब्रिटेन के प्रख्यात कवि, नाटककार विलियम शेक्सपीयर के समान किंतु, अंतर्दृष्टि के मामले में बिल्कुल सजग, सचेत….तभी तो लोगों के बेतरतीब, बेढ़ंगे, उग आए बाल-दाढ़ी को काटते-छॉंटते, चेहरे को संवारते-सजाते हुए समाज के चेहरे पर उग आए अमानवीय कुरीतियों, कुप्रथाओं के बाल-दाढ़ी को काटने-छांटने और सजाने-संवारने का संकल्प ले लिया।
      और यह संकल्प भी उस समय जिस समय देश बापू के नेतृत्व में अंग्रेजों के चंगुल से खुद को आज़ाद क़रने की लड़ाई में जुटा हुआ था। ऐसे विषम समय में भिखारी ठाकुर ने समाज को कुरीतियों एवं कुप्रथाओं के चंगुल से आज़ाद कराने की लड़ाई का शंखनाद किया और सामाजिक चेतना का अलख जगाने हेतु लोक-कला को अपना जंगी हथियार बनाया और समाज को अपने गीतों और नाटकों के माध्मम से जगाने का अभियान शुरु कर दिया।
       यहां यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उस समय व्यावसायिक पारसी थियेटर अपने ज़ोर पर था, तब उन्होंने कुछ अनुभवहीन कलाकारों को लेकर अपनी नाटक मंडली बनायी और अपनी उस नाटक मंडली को लेकर गांव-गांव घूमना शुरू कर दिया। शायद उन्हें यह पता रहा होगा कि जन-चेतना और सार्थक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्मम कला है। जन-जागृति कितनी हुई होगी या परिवर्तन कितना हुआ होगा, समाज की सोच कितनी बदली होगी यह शोध और विश्लेषण का विषय है किंतु दर्शकों की सराहना और उनकी भारी उपस्थिति भिखारी ठाकुर की सोच को बल अवश्य देती थी।
         उन्होंने समाज के जिस मर्ज़ को पहचाना था उसका दर्द समाज के हृदम में भी अवश्य था। उन कुरीतियों पर कुठाराघात प्रत्यक्ष था। उनके नाटकों में बिदेसिया, बेटी-बेचवा एवं अन्य कई ऐसे नाटक हैं जो आज के परिपेक्ष्य में उचित हैं। भिखारी ठाकुर को यह भी पता था कि केवल संवाद उतने प्रभावी नहीं होते। संवादों को उबाऊ माना जाता रहा है, इसलिए उन्होंने अपने नाटकों में स्व-रचित गीतों का समावेश किया ताकि हज़ारों की संख्या में आए हुए दर्शकों का मनोरंजन भी हो। उनका यह प्रयास स्व-प्रसिद्धि के लिए नहीं था बल्कि कथ्य-प्रधान समस्यामूलक नाटकों को रोचक तथा मनोरंजक बनाकर लोगों को जगाने की पहल थी ताकि एक सार्थक पहल बनकर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं कुप्रथाओं को जड़ से उखाड़ फेंके।
       भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता का पता बिहार के तत्कालीन शिक्षा सचिव स्व.जगदीशचन्द्र माथुर के इस कथन से लग जाएगा ‘मैंने सिर्फ भिखारी का ऑटोग्राफ लिया। अनेक व्यक्तियों को बड़े लोगों के हस्ताक्षर जमा करने का शौक बचपन से ही लग जाता है और कुछ तो नेताओं, अभिनेताओं, कवियों, खेल के विजेताओं इत्यादि को अपनी दस्तखत बही की पकड़ में लाकर ऐसे ही आह्लाद का अनुभव करते हैं जैसे बाज अपने शिकार को पंजे में पकड़ लेने पर करता है। इसीलिये अंग्रेजी में इस शौक को ‘ऑटोग्राफ हंटिंग’ कहा जाता है। यह शौक मुझ पर कभी हावी नहीं हो पाया। पर अब एक बार, केवल एक बार मैंने एक व्यक्ति से ऑटोग्राफ मांगा। वह व्यक्ति थे भिखारी ठाकुर।’
        उस दिन समाचार पत्र में तीन पंक्तियों का समाचार पढ़ा कि बिहार के ग्राम-गायक और भोजपुरी लोकरंग मंच के सुविख्यात कलावंत भिखारी ठाकुर का ८६ वर्ष की आयु में देहांत हो गया। मैंने १७ वर्षों से संजोकर रखी हुई, अनघड़ पोथी निकाली। पुस्तक का नाम-‘भिखारीकृत पुस्तिकासमूह‘। मोटे अक्षरों में छपी हुई, अनघड़ सज्जा, सस्ती जिल्द, इस ग्रंथ को तो शायद नगरों के पुस्तकालय में जगह भी न मिले। पुस्तक मुझे भेंट करते हुए उन्होंने बिहार की कैथी लिपि में लिखा- पढ़े, देखे वास्ते हम साहब के किताब देत बानी, भिखारी ठाकुर। यही वह मेरा एकमात्र ऑटोग्राफ है।’
      उस पोथी में एक फटे हुए कागज पर कैथी लिपि में ही भिखारी ठाकुर का छोटा सा पत्र था। कोई खास बात नहीं है उस पत्र में, पर उसका उध्दरण प्रासंगिक होगा। ‘रामजी’ श्री बाबू जगदीश चंद्र माथूर साहब चरण कमल में प्रणाम… हम अपना… साथ ता.२५/१/५४ के आइब… अपने के चपरासी अइसन मुसकिल… भइल। हम आपना खरच से आइब। ता.२६/१/५४ के रहब. द: भिखारी ठाकुर मोकाम कुतुबपुर पो.-कोटकपट्टी-सामपुर। छपरा हाल मोकाम नोखा. पो.-नोखा. जिला आरा आइब (छूटे हुये स्थानों के शब्द कागज के फट जाने के कारण अज्ञात हैं। जाहिर है कि भिखारी ठाकुर को कभी किसी अफसर के पास जाने से किसी चपरासी ने रोका होगा इसी लिए मुझ से व्यवस्था के लिये उन्होंने अनुरोध किया था। खर्च की बात इसलिये कि भिखारी ठाकुर की मंडली यदि कहीं बाहर जाती थी तो चिट्ठी लिखकर यात्रा भत्ता पहले मंगा लिया जाता था।)
       कैथी लिपि! टूटे-फूटे अक्षर जैसे कोई नौ-सिखिया जैसे-तैसे कर के लिखावट कर रहा हो। भिखारी ठाकुर से जब मैंने उनके हस्ताक्षर की मांग की थी तब उन्होंने मुझसे साफ कहा था- ‘हमको लिखना कहां आता है? बस थोड़ी बहुत दस्तखती कर लेते हैं.’ मैंने कहा- ‘बस, यही चाहिये’।
         लोकप्रियता के चरम पर होने के बाद भी यह थी उनकी विनम्रता। प्रतिभा की विलक्षणता यह थी कि भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र के सिद्धांतों को न जानने और न पढ़े होने के बाद भी वे नाट्य शास्त्र के सिद्धांत के विपरीत नहीं थे। भिखारी ठाकुर के विषय में महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने भोजपुरी, बरसात, संवत २००५ में लिखा है- हमनी के बोली में कतना ज़ोर हवे, कतना तेज़ बा, ई अपने सब भिखारी ठाकुर के नाटक में देखीले। लोग काहे नीमन लागेला भिखारी ठाकुर के नाटक। काहे दस-दस, पनरह-पनरह हज़ार के भीड़ होला ई नाटक देखे खातिर। मालूम होता कि एही नाटक में पउलिक (पब्लिक) के रस आवेला…जवन चीज़ में रस आवे उहे कवितई….भिखारी ठाकुर हमनी के एगो अनगढ़ हीरा हवें…उनकरा में कुलि गुन बा खाली एने-ओने तनी-तूनी छंटे के काम बडुए।
        भिखारी ठाकुर के तब के रचित नाटक आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तब थे…चाहे वे बिदेसीया हो, चाहे पियवा निसइल, चाहे भाई बिरोध। वे पात्रों के सृजन में भी समाज में व्याप्त चरित्रों को उठाते थे। तभी तो उनके पात्रों के नाम होते थे कूटनी, उपकारी, उपदर। वे ऐसा इसलिए करते होंगे कि लोग स्वयं को ढूंढ लें कि वे क्या हैं और कहां हैं। उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है। तभी तो इन सारी खूबियों के प्रणेता को अंग्रेज़ सरकार ने राय बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था। जबकि यह उपाधि रसूख वालों और बड़े लोगों को ही मिला करती थी। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि समाज की जिन कुरीतियों और कुप्रथाओं ने एक निरक्षर कलाकार को झकझोर डाला, आज वहीं उससे विद्रूप कुरीतियां, कुप्रथाएं, अमानुषिकता, संवेदनहीनता आराम से अपने क्रूर पंख पसारे राज कर रही हैं, पर किसी का हृदय आंदोलित नहीं हो रहा है;े जो निश्चित रूप से दुखद है। आज, कल से कहीं अधिक ज़रूरत है उस लोक-कलाकार राम बहादुर भिखारी ठाकुर की लगन, अंतर्दृष्टि और समर्पण की कसौटी पर सभी कलाकारों, बुद्धिजीवियों, राजनयिकों को स्वयं को कस कर परखने की। अन्यथा, उस अमर कलाकार के नाम की चर्चा अथवा उनके नाम पर की गयी परिचर्चाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। भिखारी ठाकुर के दर्द, उनकी पीड़ा को हमें अपने अंदर भी महसूस करना होगा तब कहीं जाकर उस मूर्धन्य लोक-कलाकार की कुरीतियों, कुप्रथाओं से आज़ादी के लिए लड़ी जाने वाली अधूरी लड़ाई पूरी होगी और हम यानि हमारा समाज उनसे पूरी तरह से आज़ाद होगा। आइये, हम इस क्रांतिदूत के संकल्प को आगे बढ़ाने का संकल्प लें।

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