हिंदी विवेक : we work for better world...

***प्रो.( डॉ) पन्ना झा*** 
      

        मैथिली साहित्य के इतिहासकार ने मैथिली के प्राक्काल को ८वीं से १२वीं शताब्दी माना है। मिथिला में ब्राह्मण राजाओं की प्रमुखता थी, जहां वैदिक और वैदांतिक मनीषियों को प्रश्रय प्राप्त था। मौखिक गीतों में राजाओं को प्रशस्ति प्राप्त है। राजा के राज्य से बाहर की यात्रा करने, यात्रा से लौटने पर, राजकुमारों के शिक्षा पूरी कर गुरुकुल से वापस आने के बाद, शादी-ब्याह में जाने या वधू संग प्रवेश करते वक्त सम्मान रूप में उनका चुमावन किए जाने की प्रथा थी। इसके लिए डाला (बांस का बना गोलाकार) को धान, पान, मखाना, दही, केला, दूर्वा से सजाया जाता था और बुजुर्गों द्वारा चुमावन कर आशीर्वाद दिया जाता था। यह प्रथा अभी तक प्रचलित है। प्रारंभ काल से ही पान, मखान और मांछ (मछली) मिथिला की संस्कृति के पर्याय बने हुए हैं।
मछली
      नदी प्रधान क्षेत्र होने के कारण यहां अनेक तरह की मछलियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। यहां पहले राजा-महाराजाओं द्वारा प्रजा के हित में और पारिवारिक नौका-विहार के लिए तालाब का निर्माण कराया जाता था, साथ ही गांवों के समृद्ध और वैभवशाली लोगों द्वारा भी अपने दालान (बैठक स्थान) के सामने या आसपास तालाब का निर्माण कराया जाता था। इन तालाबों में मछली, सिंघाड़ा, मखाना और कमल के फूल लगाए जाते थे। तालाब और नदी के अतिरिक्त चौर, मोइन और बड़े जलाशय में भी मत्स्य-पालन किया जाता था। नदियों में जब बाढ़ आती है तो नदी के साथ सभी गहरे स्थानों, तालाब, चौर-चांचर में पानी भर जाता है और मछलियां उनमें प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। मिथिला में मछली समृद्ध परिवार के लिए विशिष्ट व्यंजन का कार्य करती है तो गरीबों और आम जनों के लिए पेट भरने में आहार का काम करता है।
      मछलियों की भी विभिन्न प्रजातियां होती हैं। जैसे- रेहु, बुआरी, कतला, झींगा, इच्चा, पोठी आदि। विष्ठी बांधे बच्चों का झुंड कभी टाप-गाज लिए कभी अपने गमछी में मछलियों को पकड़ते हुए यत्र-तत्र देखे जाते हैं। उनके चेहरे की प्रसन्नता मनोहारी होती है। पौष्टिकता की दृष्टि से भी मछली महत्वपूर्ण है। इसमें कैल्शियम फॉस्फोरस, आयोडिन, मैग्नेशियम, लौह तत्व के साथ तेल की भी मात्रा रहती है जो शरीर और खासकर मस्तिष्क के विकास में सहायक होती है।
     मिथिला में मछली का सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व भी है। लोग मछली देखकर यात्रा करना शुभ मानते हैं। दरभंगा महाराजा के सभी राजकीय कागजों पर जोड़ा मछली और उनके द्वारा निर्मित सभी लौह-गेटों पर जोड़ा मछली बना रहता था, जो अभी भी अवशेषों पर देखने को मिलते हैं।
      मिथिलावासी अपने भोजन में तली हुई और मसालेदार मछली बड़े चाव और तृप्ति भाव से खाते हैं। बच्चे के छठिहारी के दिन, जो नवजात के जन्म के बाद छठे दिन मनाने की परंपरा है, जच्चा को छठिहारी-पूजन के बाद खिलाया जाता है साथ ही परिवार के सभी सदस्य इस विशेष भोजन का आस्वादन करते हैं। इसी तरह विवाह के चौथे दिन वर पक्ष की ओर से वधू के लिए अनेकों खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त शुभ के प्रतीक स्वरूप दही और मछली का भार आता है। इस दिन भी मछली खाने और खिलाने की परंपरा है। जितिया व्रत, जो मांएं अपने बच्चों की मंगलकामना और लंबी उम्र के लिए करती हैं, के एक दिन पूर्व मडुआ की रोटी और मछली का प्रयोग और श्राद्ध कर्म के समापन होने पर तेरहवें दिन भी मछली खाना और खिलाना आवश्यक माना जाता है। यह सभी परंपराएं मिथिला की संस्कृति में मछली के महत्त्व को बताती हैं।
मखाना
      

        इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘मखान्न’ शब्द से हुई है। हिंदी में इसे मखाना कहा गया है और वैज्ञानिकों ने इसका नाम ‘यूरीएल फेरोक्स ऐलिस्ब’ नाम दिया है। उत्तरी बिहार, मुख्य रूप से मिथिला के क्षेत्रों में, इसकी पैदावार स्थिर जल अर्थात नदी-तालाबों आदि में होती है। मखाना की पैदावार के लिए कम-से-कम दो मीटर चूना रहित जल का जमाव आवश्यक होता। उत्तम फसल के लिए पानी में खाद, अंडे की खली, यूरिया, कैल्शियम, अमोनिया नाइट्रेट को मिलाकर जलाशय में छिड़का जाता है। बीज नि:सारण से लेकर उपयुक्त रूप मेें मखाने को लाने की प्रक्रिया अत्यंत श्रमपूर्ण है, साथ ही इसमें कई व्यक्तियों का सहयोग लिया जाता है। मल्लाह जाति, जिन्हें केवट और निषाद नाम से भी जाना जाता है, की यह प्रमुख आजीविका है। मल्लाह लोग मखाना के साथ मछली का भी व्यवसाय करते हैं। संपूर्ण परिवार का इसमें सहयोग रहता है।
       मखाना बहुत ही पौष्टिक खाद्य-पदार्थ माना गया है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, जल, प्रोटीन, वसा, फ्लोरिन ऊर्जा तत्व पाए जाते हैं। वसा की मात्रा अत्यल्प होने के कारण यह सुपाच्य और अस्वस्थ लोगों के लिए हल्का नमक देकर भूना गया, उत्तम आहार माना गया है। प्रोटीन के कारण मखाना को काजू, अखरोट से उत्तम माना गया है, साथ ही औषधीय गुण के दृष्टिकोण से आयुर्वेदीय एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसका सेवन पाचन, प्रजनन, नि:सर्जन, रक्त-संचारण, हृदय रोग संबंधी विकार में अत्यधिक लाभदायी होता है। दमे की बीमारी के लिए मखाने का बीज प्रयुक्त होता है। मखाने का प्रयोग दाल और सब्जी में मिलाकर भी किया जाता है जो उसकी विशेषता को बढ़ा देता है। पानी में उत्पादित, फल की श्रेणी में माने जाने के कारण मखाना का प्रयोग व्रत-त्योहारों में भी किया जाता है। फलाहारी व्रती लोग पूजा-पाठ में मखाना को घी में भूनकर चीनी के पाक में देकर, साथ ही दूध में खौलाकर खीर के रूप में प्रयोग करते हैं, जो शुद्ध फलाहार माना जाता हैं।
         नव-विवाहित जोड़े के प्रथम कोजागरा पर्व, जिसमें लक्ष्म पूजन की प्रथा है, के अवसर पर वधू पक्ष की ओर से अन्य सामग्री के साथ शुभ चिन्ह के रूप में कई बोरों में भरकर मखाना भी भेजा जाता है, जिसे वर पक्ष टोले-मुहल्ले में आत्मीयजनों में प्रचुर मात्रा में वितरित करते हैं।
पान
      मिथिला में पान के उपयोग का वर्णन सदियों प्राचीन है। वैदिक-काल, बुद्ध काल, मुस्लिम शासन में मिथिला के राजाओं के शासन काल में भी इसके प्रयोग की चर्चा है। देवी-देवताओं को प्रसाद के साथ पान की खिल्लिया बीड़ा तथा डंठी लगे छुट्टा पान चढ़ाने की भी प्रथा है। पंडितों द्वारा उच्चारित शब्द, ‘एतानि धूप-दीप-तांबूल (पान का संस्कृत शब्द), यथाभाग नानाविध नैवेद्यानि भगवती श्री…….या भगवान श्री…. नम: या समर्पयेत।’ यह पूजा में पान की अनिवार्यता बताता है। लक्ष्मी पूजा की रात तो सभी को पान खाने का आग्रह किया जाता है। यह माना जाता है कि पान की लाली भगवती को प्रिय है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
        वैसे तो सभी प्रांतों में महिलाओं और पुरुषों द्वारा पान सेवन किया जाता है और कई राज्यों में इसकी खेती होती है किंतु अधिक प्रचलित और स्वादिष्ट बनारसी और मगही पान है। उसके बाद बंगाली और मद्रासी पान। पहले मिथिला में पान पर कत्था, चूना, इलायची, सादा या मीठी सुपारी (कसैली) पीपरमिंट डालकर उसे खिल्ली के रूप में खाया जाता था। खिल्ली बनाना भी एक कला है। यह लगाए पान को तिकोन मोड़कर, गोल मोड़कर, चनाचूर के पैकेट आकार में एक उंगली लंबी आदि तरीके से खिल्ली बनाई जाती है। छुट्टा पान को पानी से भींगे कपड़े में लपेटकर रखा जाता है, जिससे यह जल्दी नहीं सूखता। प्राय: प्रत्येक परिवार में पीतल या अन्य धातु का बना हुआ, अंदर अनेक भागों में बंटा हुआ, डिब्बे के रूप में रखा जाता था, जिसे ‘पनबसना’ कहते हैं। चांदी या पीतल या फूल (कांसा) के धातु का बना छोटा डिब्बा खिल्ली बनाए पान के साथ सुपारी, इलायची आदि परोसने के लिए रखा जाता था, जिसे पनबट्टी कहा जाता है। पान का इतना महत्व था कि बेटी के विवाह के बाद उसके साथ धातु का बना पनवट्टा, सरौता और उगलदान भी अवश्य जाता था। आंचल में चांदी की छोटी मछली भी बंधी होती थी।
      मिथिला में पूजा-अर्चना के साथ शादी-ब्याह के अवसर पर भी पान की खिल्ली और डंठी लगे पान का महत्व है। शादी के बाद होने वाले रीति-रिवाजों में देवताओं को प्रणाम करते वक्त वर के हाथ में छुट्टा पान-द्रव्य तथा वधू के हाथ में सिंदूर की गछी (पुड़िया) होती है, जो देवी-देवता के चरणों पर अर्पित किया जाता है। वर-वधू को पान खिलाने की भी प्रथा है। भ्रातृ द्वितीया में भाई से न्योता लेते समय पान में डंटी लगे पांच-पत्तों को रखने की प्रथा है, जो शुभ माना जाता है।
      इस तरह हम पाते हैं कि मछली, मखाना और पान- तीनों मिथिला की संस्कृति में सदियों से प्रयुक्त होते आए हैं और अभी भी अपनी महत्ता बनाए हुए हैं।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu