इतिहास की भूलों की ओर इशारा करता काव्य संग्रह

राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत, सम्मानित, राष्ट्रवादी विचारधारा के पोषक, प्रखर चिंतक, मनीषी, गत दो दशकों से अधिक से सक्रिय भूमिका निभाते आ रहे विनोद बब्बर ने अब तक 18 देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं की हैं। इनकी प्रकाशित 37 पुस्तकों में से 8 पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। साथ ही देश के 5 विश्वविद्यालयों में इनके साहित्य पर शोध कार्य हो चुके हैं। इनकी पुस्तक-‘प्रताप महान’ पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला। इस पुस्तक को विद्वान रचनाकार ने महाराणा प्रताप की 17वीं पीढ़ी कारोई के वर्तमान महाराज श्रीयुत् श्री शिवदान सिंह जी को समर्पित किया है।

पुस्तक में अलग-अलग शीर्षकों से 21 पद्य रचनाओं को समाहित किया गया है। पहली रचना का शीर्षक ‘माटी है बलिदान की’ रखा गया है जिसमें मेवाड़ के कण-कण में वीर जवानों के शौर्य और स्वाभिमान की गाथा लिखी हुई है तो अपने ही राष्ट्र के प्रति गद्दारी करने वालों का भी इसमें उल्लेख मिलता है। यहां बप्पा रावल, सांगा, झाला और राणाप्रताप के शौर्य के गुणगान के साथ ही साथ महाराणा प्रताप के अश्व की वफादारी का भी उल्लेख किया गया है। रानी पद्मावती के जौहर, मीरा की भक्तिभावना और श्रीनाथ जी के प्राकट्य, सभी का उल्लेख राष्ट्रवादी रचनाकार ने अपनी लेखनी से संग्रह की प्रथम कविता-‘माटी है बलिदान की’ में समाहित कर दिया है-

इस धरती का कण-कण गाता गाथा वीर जवानों की

रेत के टीले कहें कहानी शोणितमय बलिदानों की।(पृष्ठ-19)

संग्रह की दूसरी रचना का शीर्षक ‘प्रणाम’ है जिसमें कवि ने अपने अन्तस की गहराई से वीरों को, वीरों के शौर्य को, शौर्यभूमि चित्तौड़, उदयपुर और अरावली को, महाराणा प्रताप के अश्व चेतक को तथा हल्दीघाटी आदि सभी को नमन करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है-

वीरों की चिर शौर्य धरा को अपना शीश नवाता हूं

यशोगान को गा-गाकर निशदिन मैं हर्षाता हूं।(पृष्ठ-21)

‘गाथा वीर प्रताप की’ तथा ‘सुन लो तुम गौरव गाथा’ संग्रह की तीसरी और चौथी रचना हैं जिनमें उन्होंने राणा प्रताप के जीवन चरित्र की वास्तविक तस्वीर दिखाकर नई पीढ़ी में ओज उत्पन्न करके उन्हें जाग्रत करने का प्रयास किया है-

अकबर ने किए उपाय सभी, पर सारे ही बेकार हुए

पद, रुतवा, धन, दौलत विवेक के पासे सभी लाचार हुए                                                                                                                                            

शाही दरवार हुआ भौचक, पर वीर बांकुरा रुका नहीं

गर्वीले मानी का मस्तक, शत्रु के सम्मुख झुका नहीं

उस महावीर बलिदानी की, जय कीर्ति सुनाने आया हूंं

उठो! शिवा राणा के पुत्रों, मैं तुम्हें जगाने आया हूंं। (पृष्ठ-24)

विषम परिस्थितियों में राणाप्रताप का साथ देने वालों का, झाला के बलिदान का और राणा प्रताप के अश्व चेतक के रण कौशल का इस रचना में इस तरह उल्लेख किया गया है कि पढ़ने वाले के सामने साक्षात् दृश्य उपस्थित होकर उसके रोंगटे खड़े कर देता हैं तो देश के प्रति गद्दारी करने वालों को इसमें धिक्कारा भी है। अपनी माटी, अपने देश के प्रति वफादार न रहकर अकबर के पक्ष में लड़ने वालों की प्रताड़ना करते हुए राष्ट्रवादी कवि विनोद बब्बर ने लिखा है-

मांं की लोरी, संस्कारों को, बिल्कुल भुला दिया तुमने?

तुम पर जो गर्व किया करती, उस मांं को लजा दिया तुमने।

बहनों की इज्जत कोे, अरि की बाहों में झुला दिया तुमने

ले जन्म सिंह कुल में तुमने, गीदड़ सा बना लिया तुमने। (पृष्ठ-32)

अन्त में राष्ट्रवादी चिंतक ने संग्रह की 19 वीं रचना में राणा प्रताप को नमन किया है।

104 पृष्ठीय इस पुस्तक में यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री राम जिस प्रकार आतताइयों से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए अवतरित हुए थे, राणा प्रताप भी दुष्ट,आक्रमणकारी और आतताई यवनों से  राष्ट्र   की रक्षा के लिए अवतरित हुए। अतः चाटुकार इतिहासकारों ने जो आतताइयों को महिमामंडित किया है उस इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है, जिसमें  राष्ट्र   के लिए बलिदान होने वाले सच्चे  राष्ट्र  भक्तों का उल्लेख किये जाने की आवश्यकता है।

पुस्तक का आवरण नाम के अनुरूप है। मुद्रण साफ-सुथरा, त्रुटिहीन है। पुस्तक  राष्ट्रीय विचारधारा के पाठकों को  निश्चित रूप से चाटुकार इतिहासकारों की भूलों को सुधारने के लिए प्रेरित करेगी।

 

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