कानून से क्यों छूटा ऑनलाईन जूआ

ऑनलाइन की दुनिया में अब जूआ, सट्टा भी तकनीकी हो गया है। मटके का नंबर लगाने वाले लोग अब आइपीएल की टीम चुन रहे हैं। लगाया हुआ पैसा कई गुना बढ़कर उन्हें वापिस मिल रहा है, यह बताने वालों की संख्या तो नगण्य है, पर इन लोगों ने सट्टा खिलानेवाली कम्पनियों को मालामाल जरूर कर दिया है।

हमारे देश में जुए की परम्परा काफी पुरानी है। महाभारत की कौरव सभा और राजा नल का जुए में राजपाट हार जाना उसके कुख्यात उदाहरण हैं। पर एक बात तो तय है कि अपने यहां इसे हमेशा से ही बुरा माना जाता रहा है। अफगान मुसलमानों के आने के बाद इसमें सट्टेबाजी का भी समावेश हो गया। पहले मुर्गों, बकरों और अन्य जानवरों की खूंखार लड़ाइयों पर सट्टे लगते थे, जो धीरे-धीरे कई खेलों में अपने पांव पसारता चला गया। आज तो ऑनलाइन तरीके से आप दुनिया के किसी भी देश में बैठकर किसी भी विषय पर सट्टा लगा सकते हैं। वर्तमान समय में ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर देश में अलग-अलग तरह का प्रचलन है, पर हम पीछे इतिहास में जाकर देखें तो पहले एक पेन और डायरी के द्वारा क्रिकेट की सट्टेबाजी हुआ करती थी। सट्टेबाज व बुकी के बीच यह डायरी ही सही हिसाब रखती थी। तब यह काम विश्वास पर चलता था। उसके बाद यह कम्प्यूटर पर लिखा जाने लगा या मोबाइल में रिकार्ड होने लगा।

खेलने वाले को बताया जाता था कि इस ओवर में तुमने कितना पैसा लगाया और कितने पैसे कमाए। ओवर और खिलाड़ियों के प्रदर्शन को लेकर भाव भी बताना पड़ता था। फंटर और बुकी का रिश्ता बहुत ही अलहदा और भरोेसेमंद होता था। लेकिन अब यह सारी चीजें पूरी तरह से अधिकृत बना दी गई हैं। यदि किसी को सट्टेबाजी करनी हो, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उसे किसी बुकी को ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है। वह तुरंत ही बिना बुकी के अपने मोबाइल पर जाकर और पूरे वैध तरीके से जुआ खेल सकता है। अगर हम क्रिकेट की सट्टेबाजी को लेकर भी बात करें तो हर व्यक्ति का अपना अलग-अलग तरीका है। कोई ऑनलाइन या ऑफलाइन तरीके से बुकी को माध्यम बनाए या बिना बनाए सट्टा लगाता है, वहीं कोई तमाम ऑनलाइन ऐप्स के माध्यम से बहुत छोटा सा अमाउंट लगाकर मनोरंजन के लिए खेलता है। इसकी शुरुआत ऑनलाइन टीम बनाकर की जाती है।

ऑनलाइन सट्टेबाजी को स्पष्ट रूप से भारत के कुछ हिस्सों में अवैध कहा जाता है, लेकिन पूरे देश को कवर करने वाला कोई केंद्रीय नियम मौजूद नहीं है। 1867 का सार्वजनिक जुआ अधिनियम भारत में सभी प्रकार के सट्टेबाजी को प्रतिबंधित करता है। लेकिन यह कानून 150 साल पहले तैयार किया गया था (अप्रचलित है) और यह विशेष रूप से ऑनलाइन सट्टेबाजी का उल्लेख नहीं करता है। वर्तमान में, भारतीय न्यायपालिका द्वारा निर्धारित कोई विशिष्ट नियम या कानून नहीं हैं जो भारत में ऑनलाइन सट्टेबाजी के कानून के प्रश्न का उत्तर देते हों।

ऑनलाइन गेम शुरू होने की वजह से सट्टेबाजों को एक अच्छा सुनहरा मौका मिला है। हम मोबाइल पर अपना गेम खेलते हैं तथा अपनी जीत-हार की दशा में सीधे अकाउंट में पैसा डालने व निकालने का काम कर सकते हैं। इस वजह से बुकी या सट्टेबाज को कानूनी समस्याओं से दो-चार होने की नौबत नहीं आती क्योंकि जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि इसे लेकर कानूनी धाराओं में काफी झोल है। वहीं पर दूसरी तरफ देखें तो आरबीआई पॉलिसी के 2015 के सरकुलर के अनुसार स्पष्ट है कि ऑनलाइन गेमिंग, ऑनलाइन लॉटरी व क्रिकेट सट्टेबाजी आदि में आज भी एफडीआई अवैध है, जिससे हम समझते हैं कि केंद्र सरकार की मंशा ऑनलाइन को प्रोत्साहित करने की नहीं है लेकिन भारत देश के अलग-अलग राज्यों में जुए को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। उसको ध्यान में रखते हुए, हर प्रदेश में जुए के मामले में आंशिक रूप से व्यवस्था बनी हुई है। जैसे अगर हम मुंबई की बात करें तो जुए को लेकर पहले मटका खेला जाता था जिसमें अलग-अलग तरीके से मटके में लोग अपना नंबर लगाते थे। फिर उसी चीज को बुकियों द्वारा क्रिकेट में लाया गया। आगे चलकर अन्य खेलों तथा अलग क्षेत्रों में भी सट्टेबाजी चलने लगी। जैसे मौसम को लेकर सट्टेबाजी चलती है, कि बरसात कब होगी? अगला चुनाव कौन जीतेगा? आजकल रशिया व यूक्रेन युद्ध पर भी सट्टेबाजी चल रही है। ऐसा हरगिज नहीं है कि इतना बड़ा रैकेट चले और पुलिस प्रशासन को खबर न हो। पर बीच-बीच में छापे डालकर मामले की खानापूर्ति कर दी जाती है।

ऑनलाइन हो चुकी सट्टेबाजी का फायदा जुआ खेलने वाले लोगों को शायद ही मिल पा रहा है लेकिन ऑनलाइन कंपनियों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। एक सामान्य सी गणना करते हैं। एक करोड़ लोगों ने प्रति व्यक्ति के हिसाब से 100 रुपए का ऑनलाइन सट्टा लगाया। अगर वे सभी हार गए तो कंपनी कोे एक सौ करोड़ रुपए प्राप्त हो गए। कंप्यूटरीकृत खेल में हारने वालों की अपेक्षा जीतने वालों की संख्या लगभग नगण्य होती है। यहां पर एक और मामला काम करता है। जुए के अड्डे पर लोग एक दूसरे को पहचानते थे कि कौन हार या जीत रहा है? 10 लोग जीते जबकि 15 लोग हारे हैं। लेकिन यहां हारने वाले करोड़ों हैं और कोई एक दूसरे को पहचानता नहीं। और कोई बताने भी नहीं जाता। एक तरफ जहां इसका फायदा इन कंपनियों को हो रहा है वहीं दूसरी तरफ सरकार को टैक्स ना चुका कर बड़े पैमाने पर सरकार को नुकसान भी पहुंचाया जा रहा है। इसलिए अगर सरकार इस ऑनलाइन कारोबार को पूरी तरह से वैध बनाती है तो आने वाले दिनों में सरकारी खजाने में काफी बड़े पैमाने पर पैसा जमा हो सकता है।

सिक्किम राज्य में खुलेआम जुआ और कैसीनो चलता है। बहुत से लोगों ने इसे धंधा बना रखा है तो काफी लोगों के लिए शौक भी है। सूत्रों की मानें तो इस सफेदपोश कारोबारी भी इस काले धंधे में धंधे में शामिल हैं और अंडरवर्ल्ड के कई लोग पर्दे के पीछे से अपना रुपया लगाकर काम कर रहे हैं। लेकिन ठीक-ठीक कोई सामने नहीं आता है। यदि आप किसी कम्पनी की प्रोफाइल चेक करेंगे तो सामने दिख रहे चेहरे और कागजी कार्यवाही के लिए इस्तेमाल होने वाले नाम अलग होते हैं। कुछ समय पहले पुलिस ने ऑनलाइन सट्टेबाजी के मामले में देश के विभिन्न हिस्सों से कई लोगों को गिरफ्तार किया। कुछ एफआईआर भी हुए लेकिन समुचित प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हो पाई। ऐसी ही तमाम खामियों  का फायदा उठाकर देशी और विदेशी सट्टेबाजी कंपनियां भारतीयों को बेधड़क सट्टेबाजी में शामिल कर अपनी तिजोरियां भर रही हैं। आधुनिक कानून में सुधार की अनुपस्थिति ने लोगों को सट्टेबाजी पर वैधता के बारे में भ्रम ही पैदा किया है।

यानी देश में क्रिकेट और अन्य खेलों पर इलेक्ट्रॉनिक सट्टेबाजी पूरी तरह से आगे बढ़ रही है लेकिन ऑनलाइन सट्टेबाजी की वैधता और अवैधता को परिभाषित करने के लिए कोई सटीक कानून ही नहीं है। कई ऑनलाइन सट्टेबाजी साइटें जैसे ऊीशरा11, उीळलज्ञशीं360, ाूींशरा11 आदि का दावा है कि इसमें कोई सट्टेबाजी शामिल नहीं है और इसमें शामिल प्रतिभागियों के शुद्ध कौशल और ज्ञान की बात है।

यह ध्यान देने योग्य है कि ड्रीम 11, जो कि भारत में सबसे बड़ा ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म है, ने आईपीएल के लिए बीसीसीआई से आईपीएल टाइटल स्पोंसरशिप हासिल की है। वे नियमित रूप से टेलीविज़न में विज्ञापन करते हैं और लोगों को ऑनलाइन सट्टेबाजी में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। लेकिन फिर भी कोई कानून उन्हें ऑनलाइन सट्टेबाजी से रोकता नहीं है।

द इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 1872 की धारा 30 में कहा गया है कि ‘दांव के माध्यम से समझौते अवैध हैं’ लेकिन भारतीय अनुबंध अधिनियम ने दांव शब्द को परिभाषित नहीं किया है कि जिसकी वजह से भ्रम की स्थिति पैदा होती है। पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम 1955, कुछ प्रकार की सट्टेबाजी पर भी चर्चा करता है। लेकिन यह ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के बारे में कुछ नहीं बताता है। जिसका फायदा ऑनलाइन सट्टेबाज़ी वाली कंपनी उठाती है। अभी तक पूरी तरीके से सट्टेबाजी और जुए की वैधता व अवैधता पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कोई राय देने से इनकार कर दिया है।

 – आनंद मिश्रा                                                                                                                                                                                    

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