राष्ट्र को जोड़ती गंगा नदी

मेरा व्यक्तिगत अनुभव! IIT Kanpur में पढ़ते समय मेरा एक मित्र था शंकरन, वह अब IIT मद्रास में प्रोफेसर है। उसके माता पिता कानपुर आए। हमने सोचा बिठूर पास ही है उन्हें गंगा दर्शन करवा लाएँ। वे दोनों पहली बार उत्तर भारत आए थे, केवल तमिल जानते थे। वहाँ पहुँचकर घाट पर मैनें उन्हें कहा ये गंगा मैया है। थोड़ी देर उस महिला को विश्वास न हुआ। उसने दो बार पूछा। और फिर जो हुआ वह आश्चर्य! आँखों से उसके अश्रु झरने लगे। साष्टांग दंडवत प्रणाम कर वह सीढ़ियों पर जा बैठी गंगा के पानी से खेलने लगी। मुझे ऐसा लगा जैसे इसे माता की गोद मे खेलने का आनंद प्राप्त हो रहा है। तमिलनाडु के गाँव से आते यह दंपत्ती आखिर क्यों गंगा से इतना प्रेम करते हैं? ऐसा ही कुछ मुझे गौहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी को देख अनुभव होता है। मैं उतर पड़ता हूँ उसे छूने प्रणाम करने। यह कुछ वैसा ही है जैसे हमारे उज्जैन में बैठे कालिदास हिमालय से प्रेम करते हैं। हमारे तीर्थ, नदियां पहाड़ हमें जोड़ते हैं। शासन व्यवस्था कोई हो, यह तंत्र हमें राष्ट्र के रूप में जोड़े है हजारों सालों से। यह प्रेम मुझे मॉस्को वोल्गा नदी या Poland की विस्तुला नदी को देखकर तो न हुआ!

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