हायब्रिड सुरक्षा तंत्र की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर की जनता का भरोसा भारत सरकार के प्रति बढ़ा है जिसने पाकिस्तान की जन सांख्यिकी बदलने की मुहिम को धक्का पहुंचाया है। इसीलिए वहां हायब्रिड आतंकियों द्वारा असुरक्षा का माहौल बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। इसे रोकने के लिए उनके आकाओं पर लगाम लगाना आवश्यक है।

जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी हमेशा से ही पाकिस्तान के निशाने पर रही है। जनसांख्यिकी में बदलाव के जरिए पाकिस्तान एकतरफ अपने नागरिकों की पांथिक भावनाओं को संतुष्ट करने की कोशिश करता है, तो वहीं दूसरी तरफ भारत में पांथिक विद्वेष को बढ़ाकर अराजकता की स्थिति पैदा करने की कोशिश करता है। इसके लिए वह समय-समय पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाता रहा है। 1990 के प्रारम्भिक महीनों में सामूहिक और संस्थागत रूप से कश्मीर की जनसांख्यिकी को बदलने की कोशिश की गई थी और अब हायब्रिड आतंकियों द्वारा की जा रही चयनित हत्याओं के जरिए जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी को निशाना बनाया जा रहा है।

पिछले पंद्रह महीनों में जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान चयनित हत्याओं को एक नीति के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हाल के दिनों में उसने अपनी इस नीति को गति दी है। जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष 3 जून तक 16 चयनित हत्याएं की हैं, जबकि मई के पहले सप्ताह से लेकर जून के पहले सप्ताह के बीच 9 चयनित हत्याएं हुईं। इन हत्याओं में धार्मिक पहचान और क्षेत्रीय अस्मिताओं को ध्यान में रखकर लोगों को निशाना बनाया। चयनित हत्याओं के केन्द्र में पांथिक पहचान है। हालांकि सुरक्षा प्रतिष्ठान से सम्बंधित कुछ ऐसे स्थानीय लोगों को भी निशाना बनाया गया जो आतंकी प्रभाव को चुनौती दे रहे थे।

जम्मू-कश्मीर में चयनित हत्याओं की शुरुआत 17 फरवरी 2021 से मानी जाती है जब श्रीनगर स्थित कृष्णा ढाबा पर आतंकियों द्वारा हमला किया गया। इस हमले में कृष्णा ढाबा के मालिक रमेश कुमार के बेटे की मौत हो गई थी। हालांकि, अभूतपुर्व साहस का परिचय देते हुए रमेश कुमार ने अपना कृष्णा ढाबा अप्रैल 2021 में फिर ग्राहकों के लिए खोल दिया था।

5 अक्टूबर 2021 को प्रसिद्ध दवा विक्रेता एमएल बिंद्रू की हत्या आतंकियों द्वारा कर दी गई। अक्टूबर में ही एक स्कूल प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक चंद की पहचान पत्र देखने के बाद हत्या कर दी गई। इसके बाद कुछ पुलिसकर्मियों और बाहरी मजदूरों को आतंकियों ने निशाना बनाया गया।  हाल ही में आतंकियों ने साम्बा में कार्यरत अध्यापिका रजनी बाला की हत्या कर दी थी। चयनित हत्याओं की रणनीति का एक सर्वाधित महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनको अंजाम देने के लिए हायब्रिड आतंकियों का उपयोग किया जा रहा है। हायब्रिड आतंकी आंतकवाद को आजीवन और निरंतर चलने वाली गतिविधि के रूप में नहीं अपनाता, बल्कि आकाओं द्वारा दिए गए कुछ लक्ष्यों को पूरा करने के बाद वह अगले आदेश तक सामान्य नागरिकों की भांति जीवन जीने लगता है। इसके कारण सुरक्षा बलों को ऐसे आतंकियों की पहचान करना मुश्किल साबित होता है।

इसके अतिरिक्त हायब्रिड आतंकी पिस्टल जैसे अपेक्षाकृत हल्के हथियारों का उपयोग करते हैं और ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जिनके इर्द-गिर्द प्रायः कोई सुरक्षा नहीं रहती। ये प्रायः सरकारी कर्मचारी या ड्यूटी से घर लौटे पुलिसकर्मी जैसे आसान लक्ष्यों को अपना निशाना बनाते हैं। हायब्रिड आतंकी पेशेवर अपराधी की तरह हत्याएं करता है और फिर सामान्य जीवन जीने लगता है। इसमें जिसकी हत्या की जा रही है, उसका महत्वपूर्ण व्यक्ति होना जरूरी नहीं है। बल्कि इसमें संख्या और पहचान का अधिक महत्व होता है और इन हत्याओं का उपयोग आतंकी कुछ निश्चित संदेशों को देने के लिए करते हैं।

अभी तक सुरक्षा प्रतिष्ठान और विशेषज्ञ हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को अपनी उपस्थिति दर्ज कराए रखने के अंतिम प्रयास के रूप में देखते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार लोगों में घटते प्रभाव के कारण आंतकी भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के बिगड़ते हालात से जोड़कर देखते हैं। ऐसे विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल स्थिति, बढ़ती महंगाई और सेना के प्रति बढ़ते अविश्वास से जनता का ध्यान हटाने के लिए कश्मीर में इस तरह के हमलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।  यह एक हद तक सही भी है कि 5 अगस्त 2019 के बाद आतंकियों और उनके आकाओं का प्रभाव जम्मू-कश्मीर में बहुत कम हो गया है और वह किसी भी कीमत पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। परन्तु यदि हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को प्रारम्भिक दौर में ही नहीं रोका गया तो वे सामूहिक विस्थापन का कारण बन सकते हैं और पाकिस्तान की जनसांख्यिकी बदलने की दीर्घकालीन योजना को नया बल मिल सकता है। चयनित हत्याओं के बाद सामूहिक धरना-प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करते हैं।

इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हायब्रिड आतंक और चयनित हत्याओं का प्रभावी प्रत्युत्तर दिया जाए। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि परम्परागत रणनीतियों के जरिए हायब्रिड आतंकियों को रोका जा सकता है? हायब्रिड आतंक की मुख्य ताकत उसका समूह के बीच सामान्य नागरिक की तरह रहना है। इसलिए उसकी पहचान सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि उन समूहों और संस्थाओं की पहचान की जाए जो हायब्रिड आतंकियों को गढ़ते हैं और सामान्य व्यक्ति के रूप में समाज में उनकी पहचान बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं। हायब्रिड आतंकियों को मानसिक और भावनात्मक तौर पर तैयार करने वाले समूहों और संस्थाओं की पहचान हायब्रिड आतंकियों को पहचानने का सबसे अच्छा तरीका है और इन समूहों और संस्थाओं पर नकेल कसना हायब्रिड आतंकियों पर नकेल कसने का सबसे प्रभावी तरीका है।

हायब्रिड आतंकियों को निष्क्रिय करने की रणनीति में सैन्य-पुलिस ऑपरेशन्स के साथ कुछ अन्य उपायों को भी शामिल करने की आवश्यकता होगी। हायब्रिड आतंक को रोकने के लिए ऐसे विधिक उपायों का उपयोग आवश्यक है जो उन समूहों की जवाबदेही तय कर सकें, जो हायब्रिड आतंक को पोषित करते हैं। हायब्रिड आतंकियों पर नकेल उन्हें गढ़ने वाली पारिस्थति की और उनका समर्थन करने वाली आर्थिकी को चोट पहुंचा कर ही कसी जा सकती है।

 

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