ग़ड़रिया बने हिंदू समाज

लव जिहाद उस सब्जबाग की तरह है जिसका सुनहरा सपना दिखाकर मुसलमान भेड़िये हिंदू भेड़ों को फुसला रहे हैं और अपना काम साधने के बाद उनका शिकार कर रहे हैं। ये दोनों अपने मूल स्वभाव के अनुसार कार्य कर रहे हैं, परंतु कठिनाई यह है कि पूरा गड़रिया रूपी हिंदू समाज आंखे मूंदे बैठा है या यह कहें कि तब तक नींद से जागना नहीं चाहता जब तक उसके अपने घर की भेड़ को कोई भेड़िया अपना शिकार नहीं बनाता। लव जिहाद का मामला कोई नया नहीं है। आजकल हर दस-पंद्रह दिनों में ऐसे समाचार सुनने को मिलते हैं, परंतु उसके बाद होता क्या है? उनमें से कितने दोषियों को सजा मिल पाती है? श्रद्धा का मामला नया है, नृशंसता की सारी सीमाएं लांघने वाला है इसलिए कुछ दिनों तक लोगों के दिमाग पर छाया रहेगा। उसके दोषियों को सजा देने की मांग उठेगी, ‘कैंडल मार्च’ निकाले जाएंगे, उसके माता-पिता के शोक में साथ होने की बात कही जाएगी परंतु आगे क्या? आगे वही ढाक के तीन पात।

इस समस्या का समाधान निकालने के लिए अगर आज नहीं जागे तो हर हिंदू घर की बेटी का भविष्य फ्रिज या सूटकेस होगा। गड़रिए कभी भी भेड़ियों पर विश्वास नहीं करते। वे अपनी भेड़ों पर निरंतर ध्यान देते हैं और अगर कोई भेड़िया किसी भेड़ को ले भी जाए तो झुंड बनाकर उसका ही शिकार कर लेते हैं। यह झुंड बनाने की प्रवृत्ति प्रकृति ने सभी प्राणियों को दी है, परंतु  हिंदू समाज अपने स्वार्थ और एक दूसरे के प्रति उदासीनता में इतना लिप्त हो गया है कि उसे यह भान ही नहीं है कि वह एक सामाजिक प्राणी है। समाज में जो घटनाएं घटित हो रही हैं  उसका परिणाम उसके घर पर भी निश्चित ही होगा।

आज के लगभग सभी सामान्य हिंदू घरों में बेटियों को उनकी इच्छा के अनुसार पढ़ने, अपना कैरियन बनाने, शौक पूरे करने और कई घरों में जीवनसाथी चुनने तक की स्वतंत्रता दी जाती है। इन सभी के लिए उन्हें बौद्धिक और शारीरिक रूप से तैयार किया जाता है परंतु आज भी उनकी मानसिकता पर ध्यान नहीं दिया जाता। उसमें लोगों को पहचानने की कितनी क्षमता है, किस सीमा तक वह दबाव सहन कर सकती है, उसमें प्रतिकार करने की कितनी क्षमता है आदि-आदि। प्रतिकार करना मूल मानवी स्वभाव है परंतु शिष्टाचार का ‘ओवरडोज’ इस प्रतिकार करने की भावना को समाप्त कर देता है। अब समय आ गया है कि बेटियों को शिष्टाचार के साथ प्रतिकार करना भी बचपन से ही सिखाना होगा और यह भी बताना होगा कि किस सीमा के बाद प्रतिकार करना है। उनमें लोगों को पहचानने की क्षमता विकसित करनी होगी। यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है, विशेषत: किशोरावस्था से युवावस्था तक, क्योंकि इस आयु में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण अधिक होता है, हालांकि आकर्षण की कोई आयु नहीं होती परंतु बड़ी आयु में परिपक्वता आ जाती है।

इसके साथ ही वह किन लोगों से मिल रही है, किस दुकान से सामान खरीद रही है, किस दुकान से मोबाइल रीचार्ज करवा रही है। सोशल मीडिया से लड़कियों को शिकार बनाना आजकल बहुत आसान हो गया है अत: उसके मोबाइल पर कौन से एप डाउनलोड किए गए हैं इनका भी ध्यान रखना होगा। हो सकता है कि उसे यह सब उसकी स्वतंत्रता पर प्रहार लगे परंतु उसे समझाना होगा कि उसकी स्वतंत्रता से अधिक उसका जीवन महत्वपूर्ण है।

यह अवस्था अपनी आयु के दोस्तों, सहेलियों की निकटता की भी होती है अत: अगर किसी लड़की की सहेली मुसलमान है तो उनकी निकटता समाप्त कर देना ही उचित होगा क्योंकि अधिकतर मामलों में यह देख गया है कि ये मुसलमान लड़कियां ही अपने भाइयों के प्रति झुकाव के लिए इन हिंदू लड़कियों की भावनात्मक भूमि तैयार करती हैं। अगर हम अपनी बेटी को इस लव जिहाद से बचा रहे हैं और कॉलोनी, अपार्टमेंट, आस-पड़ौस की कोई और लड़की किसी संदिग्ध व्यक्ति के साथ दिखाई देती है तो उसके माता-पिता को सचेत करना हमारा कर्तव्य समझना चाहिए। उन्हें सचेत करते समय यह विश्वास दिलाना चाहिए कि हम उस लड़की पर या उसके माता-पिता पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं अपितु उस लड़की की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें सचेत कर रहे हैं।

जब भी किसी राष्ट्र को पराजित करना हो तो उसकी जर, जोरू और जमीन पर अधिकार किया जाता है और जिहादियों का तो उद्देश्य ही है भारत पर अधिकार करना तो उनके लक्ष्य तो निश्चित रूप से यह हैं ही। दुकानें जैसे सलून, बेकरी और रिपेयरिंग, ड्राइवर, डिलिवरी ऐसे सभी काम जिनमें साक्षर होने की कोई आवश्यकता नहीं है उन माध्यमों से वे हिंदुओं का धन ले रहे हैं, क्योंकि हिंदू ये देखकर पैसे नहीं देते कि लेने वाला हिंदू है या मुसलमान है। लव जिहाद के माध्यम से हिंदू घर की माताओं-बहनों को वे अपना लक्ष्य बना रहे हैं क्योंकि हिंदुओं घरों में महिलाओं का मान बहुत महत्वपूर्ण होता है और वह मान समाज में घट न जाए इस डर से हिंदू परिवारों के लोग इसके विरुद्ध आवाज भी नहीं उठाते हैं। इसका सुपरिणाम जेहादियों के ही पक्ष में जाता है और उनका मनोबल बढ़ता जाता है।

लैंड जिहाद के माध्यम से ये लोग हिंदुओं की भूमि को हथियाने के लिए तरह-तरह के रास्ते अपनाते रहते हैं। किसी की जगह पर हरा कपड़ा डालकर मजार बना देना और धीरे-धीरे उसके आस-पास चबूतरा बना कर वह जमीन हथिया लेना या कैराना जैसी सुनियोजित घटना को अंजाम देना आदि उनके ‘मंसूबों’ को साफ करते हैं।

हिंदुओं को अब जिहादियों की मानसिकता को समझने और अपनी बेटियों को उनसे बचाने के लिए इतना सचेत होना होगा कि किसी के यह कहने की नौबत ही न आए कि, “मेरा’ अब्दुल ऐसा नहीं है,” और अगर नौबत आ ही जाए तो हर सम्भव तरीके से समझाएं कि अब्दुल कभी किसी का नहीं हुआ तो तुम्हारा क्या होगा?

 

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