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****डॉ. छोटेलाल प्रसाद****

            उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का राष्ट्रीय विद्युत         प्रवाह में अविस्मरणीय योगदान है। यहां स्थापित कई विद्युत परियोजनाएं देश के विभिन्न हिस्सों को जगमग करने के साथ ही विकास की गति            की धार को भी तेज कर रही हैं। ऊर्जा की राजधानी के नाम से पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र के सोनभद्र जनपद की राष्ट्रीय स्तर पर अलग ही पहचान है। अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसकी उपयोगिता हमारे देश के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यहां विद्युत उत्पादन के लिए कई परियोजनाएं लगाई गई हैं, जो अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर रही हैं। इस क्षेत्र में स्थापित विद्युत परियोजनाओं में केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार तथा निजी क्षेत्र की परियोजनाएं हैं। ये सभी इकाइयां अपने उद्देश्य की पूर्ति में बखूबी भूमिका निभा रही हैं। इस क्षेत्र का राष्ट्र के विकास की मुख्य धारा में योगदान तो है ही, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी इसका काफी महत्व है। रामायण एवं महाभारत काल के सांस्कृतिक चिह्न यहां प्राप्त हुए हैं। हालांकि इस क्षेत्र की पहचान विद्युत उत्पादन की विभिन्न इकाइयों के कारण ज्यादा होती है। यहां पनबिजली घरों और तापीय बिजली घरों से विद्युत उत्पादन होता है। यहां स्थापित विद्युत परियोजनाओं में अनपरा पावर प्लांट (राज्य सरकार), ओबरा पावर प्लांट, जलविद्युत रिंहद (पिपरी), ओबरा पनबिजली, अनपरा-डी, अनपरा-सी, लैंको (अनपरा-डी), हिण्डालको रेनू पावर प्लांट, जे.पी. विद्युतगृह, हिण्डालको प्लांट, एन.टी.पी.सी. रिहंद (बीजपुर) और एन.टी.पी.सी. शक्तिनगर शामिल हैं। ये सभी विद्युत परियोजनाएं दक्षिणी ग्रिड से जुड़ी हुई हैं। केन्द्रीय, राज्य सरकार तथा निजी क्षेत्र की स्थापित उक्त परियोजनाओं का एकमात्र उद्देश्य देश के विकास में अधिकाधिक ऊर्जा का उत्पादन कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

            थर्मल पावर अनपरा की स्थापना राज्य सरकार द्वारा १९८० में की गई थी। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता १६३० मेगावाट की है जबकि इससे सामान्यतया उत्पादन १५३० मेगावाट होता है। यानी यह इकाई अपनी क्षमता से कम औसत विद्युत उत्पादन करती है।  इसी प्रकार राज्य सरकार की ही दूसरी थर्मल पावर परियोजना ओबरा थर्मल पावर जिसकी स्थापना सन् १९७१ में जनपद के ओबरा में हुई थी, इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता १२८८ मेगावाट की है, किन्तु इससे समान्यतया उत्पादन ५०० मेगावाट ही होता है। हालांकि राज्य सरकार की सबसे पहली तापीय विद्युत परियोजना होने का गौरव इसे प्राप्त है। राज्य सरकार की तीसरी विद्युत परियोजना जल विद्युत रिहंद (पिपरी) है। इस परियोजना को १९६३ में स्थापित किया गया था। इस परियोजना की विद्युत उत्पादन क्षमता ३०० मेगावाट की है।  जबकि इससे समान्यतया उत्पादन १८० मेगावाट ही हो रहा है। यह अपने क्षमता से कम विद्युत उत्पादन करती है। पनबिजली के नाम से मशहूर इस परियोजना का राष्ट्रीय स्तर पर काफी योगदान है। चूंकि रिहंद बांध के कारण यहां जल संयंत्र है जिससे विद्युत उत्पादन में इसका काफी योगदान है।                     

            ओबरा में स्थापित राज्य सरकार की एक और ओबरा पनबिजली परियोजना है। इसकी स्थापना सन् १९६८ में हुई थी। यह अपने निर्धारित क्षमता से अधिक बिजली उत्पादित कर राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दे रही है। इस परियोजना की विद्युत उत्पादन क्षमता ९९ मेगावाट है, जबकि यह अपनी क्षमता से अधिक यानी १०० मेगावाट बिजली उत्पादन करती है।

            इसी प्रकार अनपरा-डी जिसकी स्थापना राज्य सरकार द्वारा २००८ में अनपरा में की गई थी। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता १००० मेगावाट की है। किन्तु यह परियोजना अभी बिजली उत्पादन नहीं कर रही है। यह निर्माणाधीन है। हालांकि निकट भविष्य में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। राज्य सरकार द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है कि जल्द से जल्द निर्माण कार्य पूरा कर देश के विकास में इसकी भी सेवाएं ली जाएं। इसी तरह राज्य सरकार की ओबरा-सी जिसकी विद्युत उत्पादन क्षमता १३२० मेगावाट की है, जो अभी निर्माण की प्रक्रिया में है। ओबरा की इस परियोजना से सरकार को काफी उम्मीद है। इसके प्रारंभ होने से विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में काफी सफलता मिलेगी। इसके साथ ही उत्पादन संकट से जूझ रही उत्तर प्रदेश की जनता को कुछ हद तक इससे निजात भी मिलेगी। यही नहीं बिजली किल्लत के चलते उद्योगों पर संकट के बादल भी खत्म होंगे।

            विद्युत हब के नाम से पहचाना जाने वाला यह जनपद निजी क्षेत्र के लोगों  के लिए भी काफी सुखद है। प्राइवेट विद्युत परियोजनाएं भी यहां लगाई गई हैं। इन परियोजनाओं में लैंको (अनपरा-सी), हिण्डालको रेनू पावर प्लांट, जे.पी. विद्युत गृह और हिण्डालको पावर प्लांट शामिल हैं। इनके द्वारा भी विद्युत उत्पादन होता है, जो राष्ट्र के विभिन्न उद्योंगों के संचालन में सहायक है। निजी क्षेत्र की अनपरा स्थित लैंको (अनपरा-सी) परियोजना सन २०११ से विद्युत उत्पादन कर रही है। इसकी क्षमता १२०० मेगावाट विद्युत उत्पादन की है। यह अपनी क्षमता के बराबर यानी १२०० मेगावाट बिजली का उत्पादन वर्तमान में कर रही है। इसी तरह निजी क्षेत्र की दूसरी विद्युत परियोजना हिण्डालको रेनू पावर है। यह सन् १९६७ से विद्युत उत्पादन कर रही है। इसकी क्षमता ७८८ मेगावाट विद्युत उत्पादन की है। यह अपने क्षमता से ज्यादा विद्युत उत्पादन करता है। मौजूदा समय में यह ८०० मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहा है। चूंकि जे.पी. विद्युत निजी क्षेत्र की तीसरी इकाई है। इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता ११०० मेगावाट की है। जबकि सामान्यतया उत्पादन ८० मेगावाट ही है। सन् २०१३ से कार्यरत इस इकाई की प्रस्तावित क्षमता से विद्युत उत्पादन काफी कम होे रहा है। निकट भविष्य में अपने उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त कर राष्ट्रीय विकास में यह महती भूमिका निभाएगा। निजी क्षेत्र की चौथी एवं अंतिम विद्युत परियोजना हिण्डालको प्लांट है। रेनूकूट स्थित इस परियोजना की विद्युत उत्पादन क्षमता ४० मेगावाट है और यह अपने क्षमता के समतुल्य विद्युत उत्पादन कर रहा है। यह प्लांट सन् १९६४ से ही विद्युत उत्पादन निरंतरकरता आ रहा है।

            यहां राज्य एवं निजी पावर प्लांट के अलावा केन्द्र सरकार की भी विद्युत परियोजनाएं हैं। इनमें एन.टी.पी.सी. रिहंद तथा एन.टी.पी.सी. शक्तिनगर शामिल है। एन.टी.पी.सी. रिहंद बीजपुर में स्थापित है। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता ३००० मेगावाट की है। यह अपनी क्षमता के अनुरूप विद्युत उत्पादन करती है। यह परियोजना सन् १९८९ से ही अपना कार्य करती है। तीन हजार मेगावाट बिजली उत्पादन कर देश के कई हिस्सों को ऊर्जावान की हुई है। केन्द्र सरकार की ही स्थापित दूसरी विद्युत परियोजना एन.टी.पी.सी. (शक्तिनगर) है। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता कुल २००० मेगावाट की है। यह भी अपनी क्षमता के सापेक्ष उतनी ही बिजली की उत्पादन कर रही है। सन् १९८४ में स्थापित इस परियोजना का भी राष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्व है। इन प्लांटों से देश के कई राज्यों को बिजली मुहैया कराई जाती है। देश के विभिन्न कल-कारखानों एवं उद्योगों के सुचारू संचालन में इनका महती योगदान है। क्योंकि बिजली के अभाव में मानो जीवन ही रूक सा गया है, ऐसा प्रतीत होने लगता है। यदि हम यह कहें कि वर्तमान समय बिजली का है तो अतिशयोक्ति न होगी। घर से लेकर बाहर के जीवन में भी किसी न किसी रूप में इसकी उपयोगिता है। इसी उपयोगिता एवं आवश्यकता को देखकर ही पूर्वांचल के सोनभद्र जनपद को ऊर्जांचल की संज्ञा दी जाती है। हालांकि पूर्वांचल क्षेत्र के अलावा भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अन्य कई विद्युत परियोजनाएं लगाई गई हैं। इन परियोजनाओं में पनकी परियोजना (पनकी-कानपुर), पारीक्षा परियोजना (झांसी), हरदुआगंज परियोजना (अलीगढ़), ललितपुर पावर प्लांट(झांसी) शामिल है। पनकी परियोजना की विद्युत उत्पादन क्षमता २१० मेगावाट की है। जबकि समान्यतया उत्पादन १५० मेगावाट कर रही है। पारीक्षा परियोजना की क्षमता ११४० मेगावाट विद्युत उत्पादन की है जबकि यह ९०० मेगावाट औसत विद्युत उत्पादन करती है। इसी तरह हरदुआगंज प्लांट की विद्युत उत्पादन क्षमता ६६५ मेगावाट की है, और यह ५०० मेगावाट उत्पादन कर रही है। ललितपुर पावर प्लांट की क्षमता १९८ मेगावाट विद्युत उत्पादन की है, किन्तु यह १०० मेगावाट ही विद्युत उत्पादन करता है। दूसरी तरफ एटा में अल्ट्रामेगापावर प्रोजेक्ट निर्माण की प्रक्रिया में है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता ४०० मेगावाट की है। इलाहाबाद के करछना में भी पावर प्लांट के निर्माण की प्रक्रिया चल रही है, जिसकी विद्युत उत्पादन क्षमता १३२ मेगावाट की है।

            पूर्वांचल के इस जिले का राष्ट्रीय विद्युत प्रवाह में अतुलनीय योगदान होने के साथ ही इसका अलग महत्व भी है। इसके इतिहास पर नजर डालें तो पर्वत मालाओं एवं जंगलों से अच्छादित तथा प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण मिर्जापुर के दक्षिणांचल को ०४ मार्च १९८९ में विभाजित कर जनपद सोनभद्र का नव सृजन किया गया। यह जनपद दक्षिण में मध्य प्रदेश के सरगुजा एवं सिंगरौली, पूरब में बिहार प्रदेश के पलामू, पश्चिम में मध्य प्रदेश के रीवा तथा उत्तर में मिर्जापुर से घिरा हुआ है।

            धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से मिले प्रमाणों के आधार पर रामायण एवं महाभारतकाल के सांस्कृतिक चिह्न यहां प्राप्त हुए हैं। ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध में जरासंध ने अनेक नरेशों को यहीं बंदी बनाकर रखा था। तृतीय शताब्दी में कान्तिपुरी नागवंशीय वाकाटक राजवंश के राजाओं की राजधानी रही है और नवीं शताब्दी तक इसका प्रभुत्व रहा है। इसी क्षेत्र में कोल राजाओं एवं अगोर वंश के प्रतापी राजाओं का भी राज्य था। इस जनपद में स्थित अगोरी दुर्ग पर गदऩशाह विजयगढ़ दुर्ग पर काशीनरेश चेत सिंह एवं सोढ़रीगढ़ पर गढ़वाल राजाओं का अधिपत्य था।

            इसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल ७३८८.८० वर्ग किमी है जो २३.५२ और २५.३२ उत्तरी अक्षांश तथा ८२.७२ एवं ८३.३३ पूर्वी देशांतर के मध्य में स्थित है। प्रशासनिक दृष्टि से इसे तहसील, रार्बट्सगंज, चोपन, चतरा, नगवां, दुद्धी, घोरावल, बभनी एवं म्योरपुर में विभाजित किया गया है। इसी प्रकार भूमि की बनावट एवं प्राकृतिक दृष्टि से इसे दो उप सम्भागों में बांटा जा सकता है। मध्यवर्ती पठार और सोनघाटी।

            प्रथम सम्भाग का क्षेत्र विंध्य पर्वत के अंतर्गत पठारी हिस्से से होता हुआ कैमूर पर्वत की अंतिम सीमा सोननदी तक फैला हुआ है। कर्मनाशा व चन्द्रप्रभा आदि अनेक छोटी पहाड़ी नदियां बहती हुई सोननदी में मिलती हैं। यह संभाग गंगा की घाटी से ४०० फीट से लेकर ११०० फीट तक की ऊंचाई पर है।

            जबकि दूसरा सम्भाग राबटर्सगंज तहसील का चोपन विकास खण्ड एवं दुद्धी, बभनी तथा म्योरपुर विकास खण्ड में स्थित है। यह सोननदी के दक्षिण का इलाका है। सिंगरौली सोनघाटी एवं दुद्धी घाटी अपनी प्राकृतिक संपदाओं एवं उपजाऊ भूमि के लिए महत्वपूर्ण है।

            मजे की बात यह है कि ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर होने के बावजूद इस क्षेत्र के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। पूरे देश को प्रकाशवान करने वाला यह क्षेत्र कई समस्याओं का दंश झेल रहा है। यहां प्रदूषण की सबसे बड़ी समस्या है। क्षेत्र में स्थापित विभिन्न परियोजनाएं लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। प्लांटों से निकलने वाला धुंआ लोगों के फेफड़ों को कमजोर बना रहा है। कोयला निकालने के लिए सरकार द्वारा की जा रही खुदाई एवं ब्लास्टिंग के चलते यहां के लोगों की औसत उम्र घट रही है। एन.सी.एल. (नादर्न कोलफील्ड लिमिटेड) इस क्षेत्र में कोयले के खनन का कार्य करता है। इसके द्वारा निकाले गए कोयले की यहां के विभिन्न विद्युत पावर प्लांटों को आपूर्ति की जाती है, तब जाकर विद्युत उत्पादन का कार्य सुचारू रूप से संचालित होता है।

            खनिज पदार्थों से सम्पन्न यह क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है। पिछड़ेपन के कई कारण हैं। सबसे मुख्य कारण यह है कि सरकार का ध्यान इन क्षेत्र के निवासियों की ओर न होना है। इस क्षेत्र का उपयोग कर देश के अन्य हिस्सों को विकसित तो किया जा रहा है, किन्तु इसका पुरूसाहाल कोई नहीं है। न तो राज्य सरकार कुछ कर रही है और न ही केन्द्र की सरकार। ऊर्जा की राजधानी कहा जाने वाला यह क्षेत्र स्वयं विद्युत संकट का सामना कर रहा है। यही नहीं उत्तर प्रदेश की हालत ऐसी है कि भरपूर बिजली ही नहीं मिल पा रही है, जबकि यहां कई विद्युत परियोजनाएं लगाई गई हैं। नगरों में कुछ हालात काबू में हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अनियमित विद्युत कटौती से किसान से लेकर व्यवसायी भी संकट झेल रहे हैं। जबकि इस क्षेत्र में राज्य सरकार की कई विद्युत योजनाएं कार्य कर रही हैं। राज्य सरकार की लैंकों पावर प्लांट (अनपरा -सी) की समस्त बिजली राज्य को दी जाती है। इसके बाद भी भारी विद्युत कटौती का सामना लोगों को करना पड़ रहा है।

            दूसरी तरफ उ.प्र. सरकार बिजली व्यवस्था पटरी पर लाने के लिए कोशिश कर रही है। सरकार का दावा है कि अगले साल मार्च तक बिजली संकट से काफी हद तक राहत मिल सकेगी। उत्तर प्रदेश के अनपरा-डी, बारा और ललितपुर ताप बिजली परियोजनाओं से मार्च तक ३००० मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलने लगेगी। इसके अलावा प्रदेश में बढ़ी हुई बिजली की मांग को पूरा करने के लिए बाहर से २००० मेगावाट से ज्यादा बिजली खरीदी जाएगी। उ.प्र. पावर कॉरपोरेशन अधिकारियों के मुताबिक अगले साल मार्च तक प्रदेश में करीब १६००० मेगावाट बिजली की उपलब्धता होगी।

            हालांकि जो भी हो केन्द्र और राज्य तक बिजली को लेकर की जा रही पहल उस आम आदमी के लिए तब तक कोई मायने नहीं रखेगी, जब तक की उसे कीमत चुकाने पर बिजली मिलते रहने का सुख हासिल नहीं हो जाता, क्योंकि बीमारू होने का दाग लगने की ओर बढ़ रहे उत्तर प्रदेश के लोगों में अब भी न सिर्फ विकास करने का माद्दा है, बल्कि तड़प भी है लेकिन वह बिजली की कमी और राजनैतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति के अभाव में खुद को लाचार या कहें ‘बुझा’ हुआ महसूस कर रहा है।

 

 मो. ९१२०५९४२१७

 

 

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