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****डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह****

                     हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ कोलकाता से हुआ, लेकिन उसके   शक्तिसंवर्धन का श्रेय धर्म-संस्कृति की पुरातन नगरी काशी और प्रयाग को ही है। यहां की पत्रकारिता ने समूचे देश में अपनी धाक ही नहीं जमाई, वरन स्वतंत्रता संग्राम में भी अग्रणी भूमिका निभाई। पूर्वी उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता के केन्द्र भी यही दोनों नगर रहे। गोरक्षनाथ की पुण्य नगरी गोरखपुर से लेकर प्रयाग के संगम तट तक फैले इस भाग पर पत्रकारिता ने जो सुगंध बिखेरी है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

  भारतेन्दु काल

            १८५७ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय जनता में उद्वेलन की स्थिति थी। वह अपना अधिकार समझने का धीरे-धीरे प्रयास करने लगी थी, परन्तु अंग्रेजी शासकों के चाबुक के चलते असहाय थी। उसे कोई रास्ता दिखाने वाला नहीं था। समाचार पत्र तो निकलने लगे थे, लेकिन हिंदी प्रदेश की जनता उससे अनभिज्ञ थी। ऐसे समय में भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने अपनी आयु के १७ वें वर्ष अर्थात १८६७ में कविवचन सुधा,१८७३ में हरिश्चन्द्र मैगजीन, १८७४ में हरिश्चन्द्र चन्द्रिका और हिन्दी की पहली महिला पत्रिका बालाबोधिनी का प्रकाशन कर समाज को जो आईना दिखाने का काम किया वह अपने आप में अद्भुत व अविस्मरणीय है। उनकी पहल से हिन्दी भाषा ही संपुष्ट नहीं हुई, वरन् स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार हुई। 

            यह काल ऐसा था जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ बोलना व लिखना मना था। गोरों की शासन व्यवस्था लोगों पर कहर बरपाने से चूकती नहीं थी। ऐसे समय में भारतेन्दु बाबू ने सुधा के माध्यम से निज भारत के स्वत्व की ओर संकेत कर ‘नर नारि सम होहिं’ की आवाज बुलन्द की। इतना ही नहीं भारतेन्दु जी ने लेखकों का एक समूह तैयार कर लोगों में देश के प्रति चेतना जगाने व हिन्दी भाषा के उत्थान का कार्य किया।

            भारतेन्दु बाबू की प्रेरणा से प्रयाग से पण्डित बालकृष्ण भट्ट ने सितंम्बर १८७७ में ‘हिन्दी प्रदीप’ का प्रकाशन किया। अनवरत निकलने वाली इस पत्रिका में अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ लेख व अन्य सामग्रियां छपा करती थीं। १९०८ में माधव की एक रचना बन्दर सभा महाकाव्य प्रकाशित हुई, जिसमें अंग्रेजों को बन्दर की तरह बताया गया था। इस कविता से अंग्रेज शासक कुपित हो गए और कार्रवाई की नोटिस दे डाली। भट्ट जी ने किसी तरह जवाब देकर ‘हिन्दी प्रदीप’ को मुक्त कराया। इसी के फिर दो साल बाद माधव की एक रचना छपने के लिए आई, जिसका स्वर कर्कश था। इसका शीर्षक था ‘बम क्या है।’ इस रचना से अंग्रेज इतने कुपित हुए कि ‘हिंदी प्रदीप’ पर तीन हजार रुपये जुर्माना कर दिया। न देने पर हमेशा के लिए बंद करने का आदेश दे डाला। इतना धन न होने के कारण भट्ट जी ने ‘हिंदी प्रदीप’ को हमेशा के लिए बंद कर दिया। हिन्दी प्रदीप ने जो लेखकों को राह दिखाई, वह भारत के इतिहास में अमरता कायम कर गई।

       पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से माधव प्रसाद धवन ने १८८८ ईस्वी में साप्ताहिक पत्र ‘खिचड़ी समाचार’ का प्रकाशन किया। इसका आदर्श वाक्य था-

 अन्याय भूख को हारनहार

 दे न्याय स्वाद आनन्द डंकार।

 स्वातंत्र्य प्रजा को बल अधार।

 देवै यह खिचड़ी समाचार॥

            खिचड़ी समाचार राष्ट्रीय तथा हिन्दू-मुस्लिम की पृथक्करण नीति का घोर विरोधी था। विचारों की उग्रता के कारण यह पत्र ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन बना। सम्पादक धवन ने जेल की भी हवा खाई। अधिक जमानत मांगे जाने के कारण इस पत्र को बंद कर देना पड़ा। १८८८ में ही गोरखपुर के मझगांवा बरही से ‘विद्याधर्म दीपिका’ का प्रकाशन किया गया। इसके सम्पादक चन्द्रशेखर धर थे। इस पत्र ने राजनीतिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देवरिया जिले के मझौली राज के खड्गबहादुर मल्ल की ‘क्षत्रिय’ पत्रिका ने ज्येष्ठ शुक्ल ५ संवत् १९४२ के अंक में जागरण का जो मंत्र दिया, वह आज भी याद किया जाता है। अम्बिका दत्त व्यास द्वारा लिखित ‘मछरी’ नामक लेख में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जाति के पतन का चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस लेख में ब्राह्मणों को अपने कर्म से विचलित होने पर जहां धिक्कारा गया है, वहीं क्षत्रियों को ललकारते हुए कहा गया है कि-‘क्षत्रिय गण जीते रहो उचित करते रहो। हमीं तुम्हारी शत्रु हैं, हमारा गोरा अंग देखो, हमीं ने तुमसे लोगों को पराधीन किया है। बस हमारे ही ऊपर वीरता के हाथ साफ करो और स्वतंत्र हो जाओ, क्या बात है अम्बरीष, रघु, दिलीप आदि महात्माओं के कुल में न जनमे हो बस ऐसे ही काम करो जिसमें बिना कहे कुल परिचय मिले।’ क्षत्रिय पत्रिका का यह उद्घोष राष्ट्रीय चेतना जगाने में मददगार साबित हुआ। 

 बीसवीं सदी

            १९ वीं सदी के अंत तक राष्ट्रीय चेतना मुखर होने लगी थी। ऐसे समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलने वाले पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘इण्डियन प्रेस’ प्रयाग से प्रमुख साहित्यिक पत्रिका का प्रथमांक निकला। जुलाई १९०३ के अंक में ‘सरस्वती’ ने स्वदेशी की भावना को पुष्ट करते हुए लिखा-

 ‘अपना बोया आप ही खावें।

 अपना कपड़ा आप बनावें॥

 ‘सरस्वती’ ने नवम्बर १९०६ में लिखा –

 ‘हे भामिनिओं, कुलकामिनियों

 ये चूड़िया हैं परदेशियों की।

 कलंक भारी पहनो इन्हें जो,

 छोड़ो, जरा तो मन में लजाओ॥

            बीसवीं सदी के प्रारम्भ में पूर्वी उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता राजनीतिक दृष्टिकोण से बाल गंगाधर तिलक से पूर्णत: प्रभावित हो चली थी। उनके विचार पनपते जा रहे थे। मिर्जापुर निवासी बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन ने १९०० ईस्वी में आनन्द कादम्बिनी नामक मासिक पत्र का प्रकाशन किया। चौधरी जी बड़े ही निर्भीक थे। उन्होंने १९०८ के अंक में लिखा-‘हाय भारत की रत्नगर्भा वसुंधरा तेरी यह कैसी दुर्दशा है। १९ वीं शताब्दी में जबसे यहां शासन पुष्ट और विस्तृत हुआ, मुश्किलों की संख्या भी क्रमश: बढ़ चली। तीसरे भाग में ६ बार अकाल पड़ा और ५० लाख मनुष्य भूख से छटपटा कर मर गए।’ इसी लेख में आगे उन्होंने अपनी वेदना उजागर करते हुए सरकार की जमकर खिंचाई की है।

            १९०० ईस्वी में ही गोपाल दास गहमरी ने गाजीपुर से जासूस निकाला। यह पत्र बनारस से छपता था। उन्होंने इस पत्र में लिखा-‘डरिये मत यह कोई भकौआ नहीं है। धोती सरका कर भागिये मत, यह कोई सरकारी सीआईडी नहीं है।’

            शांति नारायण भटनागर ने प्रयाग से १९०७ ईस्वी में स्वराज्य नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। इसी साल वसंत पंचमी को अभ्युदय भी महामना मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से निकला। इन दोनों पत्रों का स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है। १ सितम्बर १९०९ को प्रयाग से पण्डित सुन्दरलाल ने कर्मयोगी निकाला। यह साप्ताहिक पत्र था, जो बड़ा ही तेजस्वी था। अंग्रेज विरोधी नीति के कारण इस पत्र से १९१० में जमानत मांगी गई। सम्पादक को राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। फलत: कर्मयोगी बंद हो गया। गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेरणा से गोरखपुर से १९१९ में स्वदेश निकला। इसके सम्पादक दशरथ प्रसाद द्विवेदी थे। यह गजब का पत्र था। इसकी तेजस्विता का नमूना देखें-

 ‘स्वर्ग लाभ के लिए

 आत्मबलि हम नहीं करेंगे।

 जिस प्रदेश में जिए

 उसी पर सदा मरेंगे॥

            बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय राजनीति पर महात्मा गांधी का प्रभाव पड़ने लगा। इस दौरान काशी से ‘आज’ दैनिक का प्रकाशन महती उपलब्धि है। यह पत्र ५ सितम्बर १९२० को ज्ञान मण्डल यंत्रालय से निकला। प्रारम्भ में इसके सम्पादक श्रीप्रकाश जी थे। बाद में बाबूराव विष्णु पराड़कर ने सम्पादक पद की कमान संभाली। आज का उद्देश्य था गांधी के पदचिह्नों पर चलते हुए भारत को स्वतंत्र कराना। यह समाचार पत्र अंग्रेज सरकार की आंखों का छर्रा था। १९३० के नमक आंदोलन, १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन के अलावा कई मौकों पर इसे अंग्रेजी सरकार ने बंद कर अपनी कुदृष्टि का परिचय दिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मुंशी जी ने काशी से १९३० में साहित्यिक पत्र हंस का प्रकाशन किया। इसका उद्देश्य हिन्दी को समृद्ध बनाने के अतिरिक्त स्वतंत्रता संग्राम में योग देना भी था। नमक आंदोलन के समय हंस को भी बंदी का मुंह देखना पड़ा था। स्वतंत्रता संग्राम में काशी से प्रकाशित संसार का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यह दैनिक पत्र था। इसका स्वर उग्र था। इसके १९४३ से १९४५ तक सम्पादक बाबूराव विष्णु पराड़कर भी रहे।

 

महामना मालवीय

            महामना मदनमोहन मालवीय ने हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान के लिए पत्रकारिता को हथियार बनाया। इनका पत्रकार जीवन प्रतापगढ़ के कालाकांकर से निकलने वाले हिन्दोस्थान से प्रारम्भ हुआ, परन्तु इसके बाद भी उन्होंने इलाहाबाद से १९०७ में अभ्युदय, १९०९ में लीडर का सम्पादन किया। उनकी प्रेरणा से महिलाओं की पत्रिका मर्यादा भी निकली। लीडर का हिन्दी संस्करण भारत भी निकाला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सनातन धर्म प्रकाशित किया। कहीं न कहीं से इन पत्रों का उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम में योग देना ही था।

 

 रणभेरी

            १९३० के नमक आंदोलन के समय देश के अधिसंख्य पत्र बंद कर दिए गए। काशी से आज का प्रकाशन भी बंद हो गया तो यहां के बुद्धिजीवियों व क्रांतिकारियों ने गुप्त पत्र रणभेरी का प्रकाशन कर समाचार पत्र प्रकाशन की निरंतरता बनाए रखी। रणभेरी फुलस्केप साइज का पत्र था। इसकी भाषा उग्र थी। रोज स्थान बदलकर प्रकाशित होता रहता था। लाख प्रयास के बाद भी अंग्रेजी सरकार इसके प्रकाशन का पता नहीं लगा पाई। पराड़कर जी जैसे सम्पादकों के सहयोग व कुशल रणनीति से इस पत्र का प्रकाशन सफल हो पाया। रणभेरी में प्रकाशित सम्पादक व प्रकाशक का नाम फर्जी होता था। रणभेरी के अतिरिक्त रणडंका, तूफान, चण्डिका आदि गोपनीय पत्र भी प्रकाशित हुए, लेकिन रणभेरी का नाम सर्वोपरि था। इस तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता का स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

  मो.: ९४५२८२९४५५

 

 

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