हिंदी विवेक : we work for better world...

****अशोक कुमार सिन्हा****

             नई पीढ़ी को यह बताने की आवश्यकता है कि ६६वर्षों की               यह आज़ादी हमारे पूर्वजों की उस लड़ाई के कारण मिली है जिसे उन्होंने अपनी गरीबी, संसाधनों की कमी और अनेक लाचारी के बाद भी जाति, पंथ, भौगोलिकता, भाषा की सीमा से बाहर जाकर लड़ा था। पूर्वांचल अगर आज पिछड़ा, गरीब या उद्योगविहीन क्षेत्र के रूप में जाना जाता है तो इसके पीछे भी उसका बागी तेवर रहा है। पूर्वांचल के नागरिकों ने गुलामी को मन से कभी स्वीकार नहीं किया और चाहे मुगल रहे हों या अंग्रेज, जब भी और जहां भी मौका मिला, यहां के लोगों ने उनके विरूद्ध जम कर संघर्ष किया। यही कारण था कि प्रत्येक विदेशी शासकों को पूर्वांचल खटकता रहा। वे यहां पैर नहीं टिका सके। उन्हें जब भी विकास करने की याद आई- चाहे वह सड़क, उद्योग, कृषि, नहरें और अन्य साधन रहें हों, पूर्वांचल को सदैव छला गया। यहां केवल थाना, तहसील,जेल तो बनाए गए, जिससे राजस्व वसूली हो सके। परन्तु जब विकास की बात याद आई तो वे उन क्षेत्रों की ओर मुड़ गए, जहां के लोगों ने विदेशियों की चापलूसी की, उनकी आवभगत की और सेना में भर्ती होकर उनकी ओर से अपने लोगों पर अत्याचार किया। निःसन्देह आज भी आज़ादी के ६२ वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। कई प्रधान मंत्री और देश को दिशा देने वाला नेतृत्व पूर्वांचल ने दिया परन्तु उसकी झोली में सिर्फ गरीबी, बेकारी और उपेक्षा ही मिली। फिर भी पूर्वांचल ने अपना तेवर कभी नहीं बदला और न समय उसे बदल पाएगा। यहां की मिट्टी और पानी का कुछ ऐसा असर है कि यहां का निवासी आत्मा और मन से सदैव स्वतंत्र, मस्त और अन्याय, अनाचार शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाला बना रहता है।

            आज़ादी की लड़ाई में यदि पहला नाम उभर कर आता है तो वह मंगल पाण्डे का। २९ मार्च १८५७ को पूर्वांचल में बलिया का यह नौजवान बंगाल के बैरकपुर में अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे जुल्म के खिलाफ विद्रोह कर देता है। अपने सार्जेन्ट मेजर ह्यूसटन को गोली मार कर मौत के घाट उतार देने के बाद भी उसका मन शांत नहीं हुआ। मुआयना करने आए लेफ्टिनेंट बॉब पर भी उसने गोली दाग दी; परन्तु वह गोली उसे न लगकर उसके घोड़े को लगी। तुरन्त मंगल पाण्डे ने उसे तलवार से मौत के घाट उतार दिया। ८ अप्रैल १८५७ को उस क्रान्तिकारी वीर को फांसी दे दी गई।

            काशी नरेश महाराजा चेतसिंह ने वॉरेन हेस्टिंग्ज के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जिसका पूरा विवरण ‘चेतसिंह का सपना’ नामक पुस्तक में वर्णित है। चेतसिंह के सैनिकों ने अंग्रेजी फौज के सैनिकों की मारकाट शुरू कर दी। काशी के स्वामीबाग में उन दिनों वॉरेन हेस्टिंग्ज स्वयं कलकत्ता से चलकर महराजा चेतसिंह को दण्डित करने के लिए आकर रूका हुआ था। उसे जब विद्रोह की सूचना मिली तो वह औरतों का वेश बदल कर डोली में बैठ कर चुनार होते हुए कलकत्ता भाग गया। वाराणसी में आज भी कहावत प्रसिद्ध है कि-

 घोडे़ पर हौदा, हाथी पर जीन।

 ऐसे भागा वोरेन हेस्टिंग्ज।

            गोरखपुर में रूद्रपुर के सतासी नरेश की सेना तथा क्रान्तिकारियों ने मिल कर विद्रोह का बिगुल फूंका। तत्कालीन ज्वाइंट मेजिस्ट्रेट मिस्टर बर्ड विद्रोहियों को काबू करने में विफल रहे तथा गोरखपुर पर १८५७ में क्रान्तिकारियों ने कब्जा जमा लिया था। इसी प्रकार सरदार नगर के जमींदार बन्धु सिंह ने अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह का विगुल फूंका। इतिहास में दर्ज है कि महारानी विक्टोरिया के शासन संभालने के बाद क्रान्तिवीर बन्धु सिंह को फांसी तथा सतासी नरेश को कालापानी की सजा दी गई। बन्धु सिंह की पूरी जमींदारी अंग्रजों ने जब्त कर ली। बाद में इस स्थान का नाम सरदार सिंह किया गया। १८५७ में ही बरहज देवरिया के निकट स्थित पैना नामक गांव के क्रान्तिवीरों ने २ माह तक गांव को अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त कर लिया था, सरकारी खजाना लूटा गया। नदी तथा सड़क मार्ग पर कब्जा हो गया। ३१ जुलाई १८५७ को अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने के लिये ब्रिगेडियर डगलस एवं कर्नल एक्राफ्ट के नेतृत्व में सेना भेज कर पूरे गांव को जला डाला। ८५ क्रान्तिकारी मारे गये। २५० ग्रामीण जल कर खाक हो गये। अनेकों महिलाएं नदी में कूद गईं, जिससे उनकी मौत हुई। गांव के जमींदार धन्नू सिंह सहित ६ क्रान्तिकारी पकड़े गए। गांव के क्रान्तिवीरों ने गिरफ्तारी का विरोध किया तथा अंग्रेज सैनिकों की ओर से आए असलमखां तथा दफेदार बब्बन सिंह को मार डाला। आज भी पैना गांव में शहीदों का स्मारक बना हुआ है।

            गोरखपुर के निकट बडहलगंज में नरहरपुर के राजा हरिप्रसाद, बढ़यापार के राजा तेज प्रताप बहादुर चन्द्र, निचलौल के राजा रनदौला सेन, डुमरी के बाबू बन्धु सिंह, पैना के हकीम मियां, मुहम्मद हसन, पाण्डेपार के गोविन्द बली सिंह, भौवापार के श्री नंत जमींदार, लार के भवन सिंह, अहिरौली के नारायण दयाल कानूनगो आदि ने स्वतंत्रता की लड़ाई अपनी पूरी शक्ति से लड़ी और सभी का एक ही लक्ष्य था, विदेशी दासता से अपने देश को मुक्त कराना।

            आजमगढ़ में प्रथम स्वतत्रता संग्राम का बिगुल भोदू सिंह यादव, जो १७वीं नेटिव इन्फैन्ट्री आजमगढ़ के सुबेदार थे, ने बजाया। बाबू कुंवर सिंह ने स्वतंत्रता सेनानियों का बहुत अच्छा संगठन खड़ा कर दिया था। कानपुर में सती चैराघाट पर नावों से नदी पार कर रहे अग्रेजों पर गोलीवर्षा कर मौत के घाट उतारने वाले विद्रोही सैनिक भी आजमगढ़ के ही थे। बाबू कुंवर सिंह ने बाद में अपनी जन्म भूमि जगदीशपुर को स्वतन्त्र करा कर २६ अपै्रल १८५८ को स्वेच्छया से मृत्यु का वरण किया था। आजमगढ़ के भीखी साव और गोगा साव तथा बनारस के राष्ट्रभक्त बाबू भैरव प्रसाद महाजन ने क्रान्तिकारियों की बड़ी मदद की।

            बलिया के चित्तू पाण्डेय को कौन नहीं जानता? उन्होंने स्वतं़त्रता के पहले ही बलिया को स्वतंत्र घोषित कर स्वयं कलेक्टर बन कर विद्रोह का संचालन किया था। बलिया, रसडा, बैरिया, नगरा आदि में हजारों क्रान्तिकारियों ने बागी तेवर की तलवार चमकाई। अंग्रेजों के अड्डों को जला दिया गया, जिसका कोई अधिक प्रतिरोध करने का साहस अंग्रेजों में नहीं हुआ।

            गाजीपुर में ६ जून १८५७ को गृहयुद्ध की स्थिति बन गई थी। गाजीपुर का खजाना बनारस भेज दिया गया। मैथ्यू नामक अंग्रेज के नील गोदाम में बांसगांव के विद्रोहियों ने आग लगा दी। मैथ्यू भाग निकला। गहमर के ठाकुर मैगर राय ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। २१जून १८५७ की घटना के प्रतिशोध में गाजीपुर तहसील के चैत नामक पूरे गांव को जला दिया गया। ५० पैदल व ५० घुड़सावार बागी सैनिक चैसा थाना में फूंक दिए गए। नील गोदाम व बंगलों में आग लगा दी गई। मैगर राय ने नेपाल की पहाड़ियों में शरण ली। बाद में नवम्बर १८६० में उन्होंने बनारस के न्यायाधीश के समक्ष आत्मसमपर्ण किया।

            वाराणसी में हिन्दू- मुसलमानों की कौमी एकता देख कर अंग्रेज थर्रा गए थे। अंग्रेजों ने फूट डालने का बहुत प्रयास किया। भदोही के पास उदवंत सिंह को क्रांति के जुर्म में फांसी दे दी गई। बदले में भूरी सिंह ने अंग्रेज मजिस्ट्रेट मि. मूर का सर कलम कर दिया था। भोला सिंह व राम बक्श सिंह ने अपने को भदोही का राजा घोषित कर दिया था।

            जौनपुर के माताबदल चौहान को १३ अन्य लोगों के साथ अंग्रेजों ने विद्रोह करने पर फांसी पर लटका दिया। आदमपुर के अमरसिंह तथा उनके पुत्र जानकी सिंह तथा नेवढ़िया के संग्राम सिंह अंग्रेजों के लिए खौफ बन गए थे। बदलापुर के ठाकुर सल्तनत बहादुर सिंह ने क्रान्ति वीरता दिखाई जो अविस्मरणीय है। अंग्रेजों ने उन्हें पूजा करते समय गोली से उड़ा दिया। उनकी मृत्यु का बदला जगेसर बक्श, अर्जुन सिंह आदि ने अंग्रेजों से लिया। बदलापुर से चांदा तक का क्षेत्र इन्होंने अंग्रेज विहीन कर दिया था। मछली शहर भी क्रान्तिकारियों का अड्डा बना रहा। डोभी के आगे दानगंज में यादवों ने अंग्रेजों से मोर्चा ले रखा था।

            इलाहाबाद में क्षत्रियों से धर्मान्तरित मेव जाति के मुसलमानों ने, विशेषकर सैफखां, शमशेर खां, दिलदार खां ने, भी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान गंवाई। भखारी स्टेशन फूंक दिया गया था। इलाहाबाद में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया था। यहां कर्नल नील ने देशभक्तों के खून से होली खेली थी। पूर्वांचल में स्वतंत्रता की जन्मजात भावना क्रान्तिवीरों में थी। इस लड़ाई में पत्रकार, व्यापारी, बुद्धिजीवी सभी लगे थे। पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने राष्ट्रवादी विचारधारा और आंदोलन की बड़ी मदद की। आज अखबार ने क्रान्ति का बिगुल खूब बजाया। काशी विद्यापीठ, गोरक्षधाम, आदि का इतिहास भी क्रांति से भरा पड़ा है। पूर्वांचल की जनता ने चप्पे-चप्पे पर अंग्रेजों को केवल परास्त ही नहीं किया; वरन उनके हौसले भी पस्त कर दिए। यद्यपि कुछ राजा-महाराजा और जमींदार अंग्रेजों से भी मिल गए, परन्तु जनता नें क्रान्तिवीरों का पूरा साथ दिया। यहां के अनेक साधु सन्त, महात्माओं ने भी स्वतंत्रता संग्राम में बढ-चढ़कर हिस्सा लिया। भोजपुरी लोकगीतों में भी स्वतंत्रता संग्राम का पूरा इतिहास है। अंगे्रजों से नाराज ग्रामीणों ने चैरी-चैरा थाना ही फूंक दिया था। जिसमें १८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। स्वयं मदनमोहन मालवीय जी ने उन क्रान्तिकारियों का मुकदमा लड़ा था। आज भी गोरखपुर के निकट चैरी-चैरा थानें मे उन क्रान्तिबीरों के नाम शिलापट्ट पर अंकित है।

            कहावत है कि जहर से कुछ ही लोगों की जान ली जा सकती है, तीर, तलवार, गोली से भी चंद लोगों की जान जाती है; परन्तु यदि विचारों का आक्रमण करो तो पूरा देश मारा जा सकता है। मीडिया अखबारों ने भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति में अतुलनीय योगदान किया था। शायर अकबर ने लिखा था-                                           

 खींचों न कमानों को, न तलवार निकालो।

 जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो॥

            अंग्रेजी तोपों के प्रतिरोध में पूर्वांचल की हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी शक्ति का भरपूर प्रदर्शन किया था। काशी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कवि वचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन,निकाल कर देशभक्ति के राष्ट्रीय भाव को खूब जगाया। २३ मार्च सन् १८७४ की कविवचन सुधा में उन्होंने जोर दिया था ’’हम लोग आज के दिन कोई विलायती कपड़ा नहीं पहनेंगे। हिन्दुस्तान का ही बना कपड़ा पहनेंगे। इलाहाबाद से पं. सुन्दर लाल ने ‘कर्मयोगी’ तथा ‘भविष्य’ साप्ताहिक निकाला। बनारस में सन् १९२० में प्रारम्भ हुए ‘आज’ के सम्पादक बाबूराव विष्णु पराड़कर ने राष्ट्रीयता और भारत स्वाधीनता के लिए क्या क्या नहीं लिखा। उस समय भूमिगत क्रान्तिकारी पन्नों का भी प्रकाशन हुआ था। काशी के कोतवाली में ‘रणभेरी’ का प्रकाशन होता था और काशी की सीआईडी शहर करा चप्पा-चप्पा छान रही थी। उस समय स्व. शिव प्रसाद गुप्त ने काशी में क्रान्तिकारियों की न केवल मदद की वरन समाज सेवा के माध्यम से भी उन्होंने राष्ट्रीयता की अलख जगाई। वे स्वयं बडे़ क्रान्तिवीर थे। उनके द्वारा स्थापित ‘आज’ अखबार के सम्पादकीय पर अंग्रेजी हुकूमत ने कई बार प्रतिबंध लगा दिया। सेंसर किया परन्तु क्रान्ति की ज्वाला बुझी नहीं।

 मो.: ९४५३१४००३८

 

 

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu