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        प्रसिद्ध सेवाभावी संस्था ‘समस्त महाजन’ के गिरीशभाई शाह के भतीजे उच्च शिक्षित 24 वर्षीय ‘मोक्षेस’ ने जैन मुनि की हाल में दीक्षा ली। प्रस्तुत है मोक्षेस की दीक्षा के संदर्भ में जैन मुनि राजहंस सूरीजी से विशेष बातचीत-

चिरंजीव मोक्षेस के विषय में अपनी भावनाओं को व्यक्त करें।

मोक्षेस बचपन से ही भक्तिभाव, साधु-संतों की सेवा आदि के प्रति झुकाव रखता रहा है। उसके परिवार के सारे सात्विक भाव उसके अंदर उतर आए थे। पढ़ाई के दौरान भी यह भाव निरंतर रहा। सीए करने के बाद वह नौकरी या व्यवसाय कर सकता था पर उसे लगा कि इस जीवन में अपने लाभ के लिए उसे कितने ही जीवों को हानि पहुंचानी पड़ सकती है। एक ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसमें किसी को हानि न पहुंचाना पड़े। वह जैन धर्म का अनुयायी तो था ही, साधु-संतों के मध्य ज्यादा समय भी बिताता था। उसने संन्यासी जीवन का अभ्यास भी किया तो उसे लगा कि यही जीवन संसार में सर्वश्रेष्ठ है इसलिए उसने इसे अपनाया। इस जीवन की खासियत है कि किसी को नुकसान मत पहुंचाओ। ज्ञानलाभ लो तथा उसे लोगों में बांटो।

एक युवा के मन में जीव के प्रति ‘शिव’ का भाव पैदा हुआ। ऐसा कौन सा क्षण या विचार थे जब उनके मन में दीक्षा का भाव जागा?

इसके पीछे पुराने संस्कार, माता-पिता के संस्कार तथा आसपास के वातावरण का काफी बड़ा हाथ होता है। आखिर उसे लगा कि यह सारा प्रयास जीव के ‘शिव’ बनने के लिए ही है। जैन धर्म ने बताया है कि सभी जीवों में परमात्मा बनने का गुण होता है। इसलिए क्यों न शिव बनने की दिशा में प्रयास किया जाए। हम स्वयं शिव बनने के साथ ही दूसरों को भी शिव बनाने में योगदान दें। संसार में सभी जीव दुखी हैं। इन दुखों से मुक्ति का एकमात्र स्थान ‘शिवस्थान’ ही है। हर व्यक्ति के जीवन में एक बार ऐसा क्षण अवश्य आता है। अपने जीवन के उस क्षणमात्र के विषय में वे बेहतर बता सकते हैं।

चिरंजीव मोक्षेस के दीक्षा संस्कार समारोह को ‘संयम स्वीकार उत्सव‘ कहा गया था। इसके पीछे का अर्थ क्या है?

संयम का अर्थ काफी विशाल है। ‘सम्यक मन्‘ अर्थात् अब मन, वचन और काया को पूर्ण नियंत्रण में रखना है। संसार में देखने, सुनने, खाने-पीने, विचार करने इत्यादि को लेकर कोई संयम नहीं है। पर संन्यासी जीवन में उसे पंच महाव्रत का पालन करना है। किसी भी जीव के प्रति किसी प्रकार की हिंसा न करें। मन-वचन-काया का भी दुख न दें। यहां पर ये सारी शिक्षाएं दी जाती हैं। चलते समय साढ़े तीन हाथ आगे देखते हुए भूमि पर नजर रखकर चलना है। ऊपर नहीं देखना है। सत्य बोलना है पर कटु न हो। दीक्षा को संयम भी कहते हैं इसलिए यह संयम स्वीकार का उत्सव है।

भारतीय संस्कृति में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया है। मोक्षेस जैसे युवा इसे आगे बढ़ाने में कितने सहायक होंगे?

अहिंसा, संयम और तप की जो परंपरा लाखों साल पहले आदिश्वर से चलते हुए 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी से होते हुए आज तक चल रही है उसे अभी तक चालू रखने में युवाओं का काफी बड़ा योगदान रहा है। यह भी कुछ ऐसा ही है जैसे यदि किसी नदी की राह पूरी तरह चालू रखी जाए तभी वह सागर तक पहुंच पाती है। जिस युवा ने बेहतरीन शिक्षा पाई है, देश दुनिया देखी है, साथ ही शास्त्रों का भी अध्ययन किया है; वह युवा नई पीढ़ी के युवाओं को सही राह दिखाने में ज्यादा सहायक हो सकता है। इस समय लोग अपने आपको सुख-सुविधाओं में खपा रहे हैं जबकि मोक्षेस ने अपने आपको गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया है। ऐसा व्यक्ति आकाश जितना विशाल हो जाता है।

भगवान महावीरजी के तत्वों को आज के समाज में पुनर्स्थापित करने के लिए कौन से कार्य आवश्यक हो जाते हैं?

सबसे पहले इन तत्वों को अपने जीवन में अपनाना आवश्यक है। यदि एक व्यक्ति इन्हें अपनाता है तो उस व्यक्ति से परिवार, समाज, राज्य, देश से लेकर पूरे विश्व तक वह तत्व स्थापित हो जाता है। इन विचारों को प्रचार की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान महावीर स्वामी ने भी कहा था, किसी व्यक्ति के जीवन में अहिंसा का भाव जागने पर उसके आसपास के जीवों में भी यह भावना जागृत होगी। आज के हिंसावादी दौर में तो अहिंसा का संदेश फैलाना बहुत जरूरी है। महावीर के पथ की यात्रा ही संसार में शांति लाएगी।

वर्तमान यांत्रिक युग में, जबकि भावना और मोह का बोलबाला है, मोक्षेसजी की दीक्षा से समाज में क्या संदेश प्रसारित होगा?

एक काफी पढ़ा-लिखा युवा जो कि काफी सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखता है, यदि इस राह का चुनाव करता है तो युवाओं के बीच बहुत अच्छा संदेश जाएगा। इस वर्ष इस तरह के लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा युवकों तथा युवतियों ने दीक्षा ली है जिससे समाज में प्रसन्नता है और आश्चर्य भी। आज के भोगवादी युग में इस तरह का कदम उठाना काफी कठिन होता है। लेकिन आज के युवा ऐसा कदम उठा रहे हैं तो निश्चित ही देश के युवा वर्ग का धर्म के प्रति रुझान पैदा होगा।

मोक्षेसजी को आप किस प्रकार शुभेच्छा देनी चाहेंगे?

जिस सन्मार्ग पर वे अग्रसर हैं, उनका वह मार्ग प्रशस्त हो यही कामना है। साथ ही वे अपने अलावा अन्य युवाओं को भी इस उत्तम मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें ताकि समाज का कल्याण हो।

 

 

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