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****गंगाधर ढोबले****

इ च्छाओं का आकाश अनंत है, उसी तरह जानकारी पाने की जिज्ञासा का भी कोई अंत नहीं है। ब्रह्मांड की निर्मिति और मनुष्य के सृजन के साथ संदेश पाने की यह अभिलाषा उत्पन्न हुई है और जब तक मानव जाति का अस्तित्व है तब तक यह कभी समाप्त नहीं होगी। इसलिए इस ब्रह्मांड के पहले पत्रकार नारद मुनि हैं। इस तरह वे पत्रकारिता के पितृ-पुरुष हैं। उनकी विशिष्टताएं ही पत्रकारिता का बुनियादी आधार है। उनकी विदूषकी छवि किवदंतियों का विषय है, लेकिन उनकी गहन चिंतन वाली छवि और निष्पक्षता व विश्वसनीयता का कोई मुकाबला नहीं है। वे संदेश-वाहक के रूप में संवाददाता है और सम्पादक के रूप में वेदों संकलनकर्ता भी। पत्रकारिता के मूल सूत्र भी इसी के आसपास घूमते हैं।

धरती का अपने अक्ष पर घूमना कभी नहीं थमता। इसी तरह परिस्थितियां भी बदलना कभी नहीं रोकतीं। वे बदलती हैं, बदलती रहेंगी; लेकिन पत्रकारिता की भूमिका में विशेष अंतर नहीं आता, न आना चाहिए। यह भूमिका जब बदल जाती है तब वह चाटुकारिता हो जाती है और पक्षपात ज्यादा दिन नहीं चलता। ऐसे पत्रकार या पत्र-पत्रिकाओं का जीवन हवा के झोंकों की तरह झूलता है और अंधड़ जैसे ही थमती है उनके प्राण निकल जाते हैं। लोग ऐसी बातों को ज्यादा दिन तक नहीं सहते। बहुत सी पत्र-पत्रिकाएं हमारे देखते-देखते निकलीं और बंद हो गईं। इसका कारण यही है।

फिर पत्रकारिता को क्या करना चाहिए, जिससे वह नारद मुनि की तरह अबाधित व निष्कलंक चलती रहे? इसके कुछ निश्चित टोटके हैं। वे हैं- सच्चाई, विश्वसनीयता, निष्पक्षता, सजगता, पूर्वग्रहों से अलिप्तता, जनकल्याण, सामाजिक जिम्मेदारी, पाठकों की भागीदारी, उद्देश्यपूर्ण सम्प्रेषण, वर्तमान से जुड़ाव, खबरों और आलेखों में जीवंतता, सहज-सरल-प्रवाही भाषा, सुरुचिपूर्ण चित्रों और छायाचित्रों का उपयोग, डिजाइनिंग और लेआऊट आदि आदि। इस सूची को और छोटे-छोटे खंडों व उपखंडों में बांटा जा सकता है। कुल मिलाकर खबरों, आलेखों, छायाचित्रों के प्राप्त होने और सम्पादन की उसमें छौंक लगाने के बाद परोसा जाने वाला व्यंजन सुरुचिपूर्ण और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। यह आदर्शवाद लग सकता है, व्यवहारवाद नहीं। लेकिन आदर्शवाद के बिना कोई विकल्प भी नहीं है। व्यवहार को आदर्श का अनुगामी होना चाहिए, तभी वह टिक सकता है। अन्यथा वह तिनके की तरह उड़ जाएगा।

पत्रकारिता की विदेशी अवधारणा हमारा आदर्श नहीं हो सकती। वहां तो ‘आदमी कुत्ते को काटता है’ तभी खबर बनती है। यह नकारात्मक अवधारणा है। सनसनी फैलाने वाली है, सकारात्मक नहीं है। भारतीय अवधारण सकारात्मक है, जनकल्याण का मूल लक्ष्य रखती है। इसलिए भारतीय पत्रकारिता ‘मिशन’ है, केवल व्यवसाय नहीं है। पश्चिम की देखदेखी हमारे प्रकाशन समूह भी पहले कहते थे कि ‘हम विज्ञापन के व्यवसाय में हैं।’ अब यह तर्क भी उन्होंने छोड़ दिया है। अब कहते हैं, वे ‘खबरों के व्यवसाय’ में हैं। विज्ञापन के व्यवसाय से खबरों के व्यवसाय तक कि यह यात्रा खतरनाक है। इससे प्रायोजित सामग्री की बहुतायत हो गई है, जिसकी कोई विश्वसनीयता नहीं होती। तर्क यह दिया जाता है कि प्रकाशन का व्यवसाय धन-प्रदान हो गया है और प्रकाशन को जिंदा रखने के लिए किसी न किसी तरीके से धन प्राप्त करना अनिवार्य हो गया है। सतही तौर पर यह तर्क भले अच्छा व सत्य लगता है; लेकिन है छद्मी। इसके दीर्घावधि परिणाम घातक हो सकते हैं। इसे भ्रष्ट पत्रकारिता मानना चाहिए। अंग्रेजी में इसे ‘यलो जर्नालिज्म’ कहते हैं। यह पीत पत्रकारिता पहले कुछ चुनिंदा व्यक्तियों तक सीमित थी, जो अब प्रकाशन समूहों का अंग बनती जा रही है। अर्थात, इस तरह की पत्रकारिता का अब संस्थाकरण होता जा रहा है। ‘धन, उपकार या उपहार के बदले खबर’ की प्रवृत्ति को रोकना होगा। यह कार्य कौन करेगा? पत्रकारिता में मौजूद सज्जनशक्ति को इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी। यह लिखना आसान है, लेकिन करना भी कोई मुश्किल काम नहीं है। शुरुआत अपने से करें तो तेजी से बदलाव आएगा। माल्थस का जनसंख्या के बारे में एक सिद्धांत है। वह यह कि ‘प्रकृति अपने आप को नियंत्रित कर लेती है, इसलिए बढ़ती जनसंख्या की चिंता करने की जरूरत नहीं है।’ इसे पत्रकारिता पर चस्पां कर देखें तो लगेगा कि सज्जनशक्ति स्वयं अपने को समायोजित कर लेगी और साफसफाई कर लेगी। लेकिन प्रश्न यह है कि इस घड़ी का इंतजार हम क्यों करते रहे?

बीसवीं सदी से जीवन के हर क्षेत्र में तेजी से बदलाव हुए हैं। इससे पत्रकारिता भी अछूती नहीं है। जनसंचार अर्थात मीडिया में भी बेहद बदलाव हुए हैं। केवल छपे हुए अखबार या पत्रिकाएं ही हमें जानकारी का प्रेषण नहीं करतीं। इंटरनेट, चैनल, मोबाइल फोन, स्काइपे, वेब-पत्रिकाएं, सोशल नेट-वर्किंग साइट्स आदि मौजूद हैं, जो मात्र उंगली के स्पर्श से चाही-अनचाही ढेर सारी जानकारी क्षणांश में हमें पेश करती हैं। सूचनाओं के इस विस्फोट में पता ही नहीं चलता कि कौनसी जानकारी कितनी सही और कितनी विश्वसनीय है। किस बात को स्वीकार करें या अस्वीकार करें। एक उदाहरण ही काफी है। वि. प्र. सिंह जब प्रधान मंत्री थे, तब मीडिया ने होहल्ला मचाया कि उनका विदेश के एक देश में बैंक खाता है। इस सूचना से पूरा देश हिल गया। बहुत दिनों तक इसकी जुगाली होती रही। लेकिन मीडिया में से किसी ने पता नहीं लगाया कि इसके पीछे सच्चाई क्या है। पूरा मीडिया इस साजिश के हाथों खेल गया। अंत में भारत सरकार ने पता लगाया कि यह लफ्फाजी है। किसी ने उनके नाम से खाता खोल दिया, जिसमें मामूली पैसा है। यह वैसा ही है जैसे किसी ने राहुल गांधी के नाम से राशन कार्ड या पैन कार्ड या आधार कार्ड बनवा लिया। हमारी नौकरशाही इतनी भ्रष्ट हो गई है कि कोई भी दस्तावेज आसानी से बन सकता है, झूठे आंकडें प्राप्त किए जा सकते हैं। इसलिए परिवर्तित परिस्थिति में सच्चाई का पता लगाना और इसके बाद ही जानकारी देना अहम हो गया है।

देश में हाल में जो सत्ता परिवर्तन हुआ उससे पत्रकारों की जिम्मेदारियां अधिक बढ़ गई हैं। हमारे पूर्वग्रहों और तथाकथित आयकॉन पर हमें गौर करना होगा। नए आयकॉन हो सकते हैं और हैं इसे स्वीकार करना होगा। गढ़े रास्तों पर चलने की आदत छोड़नी होगी। इसके बाहर भी कोई रास्ता है इसे जनता तक पहुंचाना होगा। हमारी शहर-केंद्रित पत्रकारिता को गांवों की आबोहवा दिखानी होगी। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल मीन-मेख निकालना और सनसनीपूर्ण तथाकथित घटनाओं की जुगाली करते रहना नहीं है। कौओं की हमारी भूमिका को बदलना होगा। कोई मृत पशु दिखने पर एक कौआ अपने भाईबंदों को बुलाने के लिए कांव-कांव करता है और सब वहां जुटते ही कांव-कांव शुरू कर देते हैं। इसी तरह किसी छोटी सी घटना एक चैनल पर आने से बाकी सब चैनल वाले उसी घटना को इतना तूल देते हैं कि दर्शकों का उन पर से विश्वास ही उड़ जाता है। बहुत बार तो ऐसा होता है कि उस घटना की सच्चाई का भी पता लगाने की कोई चिंता नहीं करता। इसकी भी कोई परवाह नहीं करता कि पीड़ितों पर उससे क्या गुजरती होगी। सब को टीआरपी बढ़ाना होता है और टीआरपी विज्ञापन का मक्खन देता है, जो सब को चाहिए। टीआरपी याने चैनल देखने वालों की संख्या। यह टीआरपी भी कितना सही है यह प्रश्न ही है। प्रिंट-मीडिया में यह इतना नहीं है, लेकिन इंटरनेट मीडिया में तो कोई सीमा नहीं है।

चटपटी खबरें लाने का दबाव इतना है कि पुलित्जर का एक किस्सा याद आता है। पुलित्जर जर्मन था। बहुत पढ़ा-लिखा नहीं था। दूसरे विश्व युद्ध में उसके अभिभावक मारे जा चुके थे। वह अकेला ही अमेरिका पहुंचा। पत्रकार बनने की बड़ी ख्वाहिश थी। बना भी। उसका ‘सन’ अखबार आज भी चल रहा है। उसके नाम से विश्व पत्रकारिता पुरस्कार दिया जाता है।

किस्सा यह है कि जब पहले पहल वह संवाददाता बना और न्यूयार्क की सड़कों पर घूमने लगा तब उसे समझ में नहीं आए कि चटपटी खबर कहां से लाए। न्यूयार्क में तब सार्वजनिक नल हुआ करते थे। महिलाएं पानी भर रही थीं। वह सामने एक पत्थर बैठ उन्हें निहार रहा था। तभी उसे एक सांड दिखा। ‘आइडिया’ दिमाग में आई। उसने वहां खेलते बच्चों को बुलाया। उन्हें टॉफियां दीं और सांड को नल की तरफ भगाने के लिए कहा। बच्चों ने वैसा ही किया और आनन-फानन में महिलाएं भागने लगीं। कुछ को चोटें आईं। पुलित्जर की खबर बन गई। उसकी ‘विशेष’ खबर बन गई। फिर बाकी अखबारों ने बाल की खाल निकालकर नगर निगम की छीछालेदार कर दी। इस तरह की ‘प्लांटेड़ स्टोरी’ अब राजनीति में होने लगी है। यह भावना भी बदलनी होगी कि सरकार जो करती है वह गड़बड़ ही करती है; अच्छा कुछ नहीं करती। यह वर्ग भी नहीं बनने चाहिए कि एक सरकार का नमन ही करते फिरे और दूसरा खालिस विरोध। नीरक्षीर विवेक रखना वर्तमान स्थिति में पहले की अपेक्षा ज्यादा जरूरी हो गया है।

हम जनहित में सरकार की खामियों को अवश्य उजागर करें, लेकिन उसके अच्छे कामों को भी पेश करें। इस तरह ‘मीन-मेखी’ पत्रकारिता के मुकाबले ‘विकास’ की पत्रकारिता का इस समय बहुत महत्व है। कहीं भ्रष्ट आचरण होता है तो उसका अवश्य पर्दाफाश करें; लेकिन कहीं सदाशय का काम होता है तो उसकी भी अवहेलना न हो। पक्षपाती सामग्री से बचना चाहिए। विवाद की स्थितियों में दोनों पक्षों को बेहिचक रखना चाहिए। पत्रकार की राय जनहित की राय होती है। हो सकता है कि उसकी व्यक्तिगत राय कुछ अलग हो; लेकिन जनहित की राय के साथ उसे चलना चाहिए। जनहित की राय में कोई खामी दिखाई दें तो उसे भी उजागर करना चाहिए। इस तरह पत्रकार लोककल्याण के ‘गाइड’ हैं।

यह विषय इतना बड़ा है कि उस पर हजारों ग्रंथ लिखे गए हैं और लिखे जाते रहेंगे। लेकिन विश्वसनीयता व लोककल्याण के सूत्र पत्रकारिता की हमेशा बुनियाद बनी रहेंगे। देवर्षि नारद के समय भी यही बुनियाद थी, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी शाश्वत रहेगी।

मो.: ०९९३०८००४५३

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