हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

नेहरू युग, मोदी युग

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सेक्युलरिज्म का मतलब केवल अल्पसंख्यकों का अर्थात मुस्लिमों का तुष्टीकरण और बहुसंख्यकों की अर्थात हिंदुओं की प्रतारणा नहीं है; बल्कि यह हिंदुस्तान की बहुविध प्राचीन व अर्वाचित संस्कृति का सम्मान करना है। सभी धाराएं गंगा में आकर मिलें और पूरा देश एकत्व से जुड़े यह मोदी की सामाजिक नीति का आधार है।

पूरब से आतीभाजपा क्रांति

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पूरे देश के लोकसभा चुनाव पर गौर करें तो भाजपा के नेतृत्व में एनडीए के विजय की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। भाजपा को उत्तर में हो रहे घाटे को इस बार पूरब पूरा करते दिखाई दे रहा है।

हिंदी विवेक की दशक पूर्ति

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जब सूचना क्रांति ने मासिक पत्रिकाओं को परदे के पीछे ढकेल दिया हो तब ‘हिंदी विवेक’ जैसी वैचारिक पत्रिका के अविरत प्रकाशन के दस वर्ष पूर्ण होना अपने आप में कमाल की घटना है। इस संदर्भ में प्रस्तुत है कुछ अनुभव-आधारित निरीक्षण-

फैशन और सौंदर्य

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फैशन और सौंदर्य को जुदा नहीं किया जा सकता। जब दुनिया बर्बर अवस्था में थी तब प्राचीन भारत में एक समृद्ध संस्कृति थी। परिधानों, अलंकारों, सौंदर्य प्रसाधनों में हमारा कोई मुकाबला नहीं था। प्रस्तुत है फैशन शो के वैश्विक संदर्भ के साथ भारत में वस्त्रालंकारों, सौंदर्य के पैमाने एवं सौंदर्य-प्रसाधनों की एक झलक।

बहुत हो गया कबूतर उड़ाना… – जी.डी. उपाख्य गगनदीप बक्षी

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रक्षा के क्षेत्र में भी स्वाधीनता के बाद भारी बदलाव हुए हैं। थोड़ा-बहुत काम हुआ है, बहुत कुछ करना बाकी है। शांति के कबूतर बहुत उड़ा चुके। अब ठोस कार्रवाई हो। प्रस्तुत है फौज, युद्ध, हथियार आदि मुद्दों परें पर प्रसिद्ध वरिष्ठ फौजी अधिकारी, विचारक, तथा लेखक मेजर जनरल (नि.) जी.डी. उपाख्य गगनदीप बक्षी से हुई विस्तृत बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-

भारतमाला विकास का नया आयाम

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भारतमाला चरण -1 में 24,800 किलोमीटर के कॉरिडोर नेटवर्क के उन्नयन से, निर्माण के चरण में लगभग 34 करोड़ श्रम दिवस उत्पन्न होंगे और आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ लगभग 220 लाख स्थायी नौकरियों का सृजन होने की संभावना है।

बैंकों की जालसाजी और अनुशासन पर्व

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पंजाब नेशनल बैंक में 13 हजार करोड़ रु. के ऐतिहासिक घोटाले का भंड़ाफोड़ होते ही लोगों का सकते में आना स्वाभाविक है। सरकारी बैंक जिस तरह से अरबों के डूबत कर्जे में फंसे हुए हैं उसे देखते हुए धोखाधड़ी का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। तथ्य यह है कि ये कांग्रेस शासन के जमाने के कंकाल हैं, जो छिपाए नहीं छिप सकते। मोदी सरकार के जिम्मे अब सफाई का काम आ गया है। जिस तत्परता और कड़ाई से कदम उठाए जा रहे हैं उससे तो लगता है कि वित्तीय क्षेत्र में अनुशासन पर्व का आरंभ हो रहा है।

नया विधेयक, बैंक ग्राहक और जमापूंजी

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नये वित्तीय विधेयक की धारा ५२ के प्रावधानों को लेकर आम लोगों में बेचैनी है. इसमें प्रावधान है कि नया निगम चाहे तो जमाकर्ताओं की सारी जमापूंजी डकार सकता है. इससे न्यूनतम एक लाख रु. की बीमाकृत सुरक्षित राशि भी देने से इनकार कर सकता है. यह तो दिनदहाड़े डकैती हुई, जिसे रोकना सरकार का कर्तव्य है. लोगों में सरकार के प्रति विश्वास का माहौल पैदा होना चाहिए, संदेह का नहीं.

चीन की पानी डकैती

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चीन तिब्बत में झांगबो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर बांधों की शृंखला बना रहा है। अब जो नया विशालतम और बेहद खर्चीला बांध बन रहा है वह भारत-भूटान सीमा के पास तिब्बत के संगरा जिले में होगा। इस बांध का पानी उत्तर-पश्चिम में मोड़कर शिंजियांग प्रांत के तकलीमाकन रेगिस्तान तक पहुंचाया जाएगा। चीन की इस पानी डकैती का पूर्वोत्तर भारत पर गहरा असर पड़ने वाला है। भविष्य में जलयुद्ध का यह आगाज मानने में क्या हर्ज है? ‘ब्रह्मपुत्र’ नाम से हम सब परिचित हैं। उसी का तिब्बती नाम है यार्लंग झांगबो। तिब्बती में ‘झांग

धर्म और राजधर्म

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मानव सभ्यता के विकास के साथ ही धर्म और राजनीति एक-दूसरे के हाथ में हाथ डाले चल रही है। दोनों में संघर्ष भी शाश्वत है। धर्म बड़ा या राजनीति? राजनीति का माने राज्य की नीति या महज जोड़-तो़ड़ या कुटिलता? धर्म और राजधर्म का क्या अर्थ है? प्रस्तुत है विश्व भर के प्रमुख धर्मों के मुख्य सूत्रों और राजनीति पर प्रभाव का यह विहंगम अवलोकन।धर्म और राजनीति का चोली-दामन का सम्बंध है। धर्म का अर्थ महज कर्मकाण्ड नहीं है, अपितु वह नैतिकता का अधिष्ठान है। धर्म का अर्थ है आचार-व्यवहार, सदाचार की स्थापना, व्यक्ति और समाज के बीच एक

पटना टु गांधीनगर

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  समग्र देश में सत्ता हासिल करने की भाजपा की दौड़ पटना होते हुए गांधीनगर तक पहुंची है। बिहार में नीतीश कुमार के साथ वह फिर काबिज है; जबकि गुजरात में राज्यसभा की तीसरी सीट दो कांग्रेसी विधायकों की बेवकूफी के कारण वह हार गई। चुनावों में हारजीत तो न

पूर्वी हिमालय में भी ड्रैगन की साजिश

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डोकलाम में भारतीय व चीन सेनाएं भले ही आमने-सामने हो; लेकिन १९६२ को अब दोहराया नहीं जा सकता। वैश्विक परिदृश्य इतना बदल चुका है कि चीनियों की भौगोलिक और आर्थिक विस्तारवादी नीतियों के प्रति महाशक्तियों के कान खड़े हो चुके हैं। पूरे हिमालय में पश्चिम से लेकर प

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