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****रमेश पतंगे******

ब चपन में एक कहानी हम जरूर सुनते हैं। एक राक्षस होता है। वह एक राजकन्या का अपहरण कर लेता है। उसका भाई उसे छुड़ाने आता है। तब उसे पता चलता है कि इस राक्षस के प्राण सात समुंदर पार स्थित एक तोते में बसे हैं। उस तोते को मार दिया कि राक्षस मर जाएगा। इस कथा की अद्भुत रम्यता बाल मन को मोह लेती है। इस कहानी के राक्षस आदि किस्सा का छोड़ देें। केवल एक ही बात का विचार करें कि किसी संकल्पना का प्राण, किसी अस्तित्व का प्राण कहां होता है? देश का प्राण किसमें होता है?

देश की या राष्ट्र की प्राण-शक्ति किसमें होती है? इस प्रश्न का उत्तर अनेक लोग अनेक तरह से देते हैं। कोई कहता है कि देश की प्राण-शक्ति, देश की समृद्धि में है, आर्थिक विकास में है। कोई कहता है कि देश की प्राण-शक्ति देश के सैन्य-बल में है। कोई कहता है कि, देश की प्राण-शक्ति देश चलाने की क्षमता रखने वाले अल्पसंख्यक समुदाय में होती है।

ये उत्तर गलत हैं ऐसा नहीं है। हरेक में कुछ न कुछ सत्यांश अवश्य है, किंतु कोई भी उत्तर परिपूर्ण सत्य नहीं है। सत्य उत्तर यह है कि, देश की प्राण-शक्ति ‘समरसता’ इस एक शब्द में है। समरसता का अर्थ है, देश में रहने वाली पूरी प्रजा में एक-दूसरे के प्रति अपनत्व का भाव, हम सब एक देश के अंग हैं यह अंगांगीभाव। समरसता भावनात्मक संकल्पना है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रत्येक को दूसरे के प्रति अपनत्व की भावना होनी चाहिए, स्नेह होना चाहिए। इसे ही सामाजिक बंधुत्व भी कह सकते हैं। समरसता का अर्थ है सामाजिक बंधुभाव।

सामाजिक बंधुभाव समाज को बांधकर रखने वाला एक तरह का सिमेंट ही है। बंधुभाव का सिमेंट न हो तो समाज शतखंडित होता है और दुर्बल होता है। हम इतिहास में पढ़ते हैं कि, सातवीं सदी से भारत पर इस्लाम का आक्रमण होता रहा है। ११९२ में दिल्ली में मुहम्मद गोरी की सत्ता आई और हम परतंत्र में चले गए। यह परतंत्र लगभग एक हजार वर्ष चला। परतंत्र में जाते समय भारत आर्थिक दृष्टि से विश्व महासत्ता था। विश्व में जितना उत्पादन होता था उसका ३०% हिस्सा भारत में उत्पादित होता था। भारत का वर्णन स्वर्णभूमि के रूप में किया जाता था। हीरे-माणिक, सोना आदि की भारत में बहुतायत थी। इस सम्पत्ति के मोह के कारण ही यूरोपीय लोग भारत में आए। भारत में शौर्य-शक्ति की कमी नहीं थी। राजपूत और मराठों की शौर्य कथाएं सुनकर आज भी शरीर में वीरश्री का संचार होता है। विचार-शक्ति के बारे में तो दुनिया भारत के चरण के पास बैठने लायक थी। नालंदा, तक्षशिला जैसे विद्यापीठ विश्वविख्यात थे। एक ही बात की कमी थी और वह थी समरसता।

इस देश का राष्ट्रीय समाज अर्थात हिंदू समाज जाति-पांति के भेदभाव के कारण दुर्बल हुआ। अस्पृश्यता की भयानक रूढ़ि के कारण उसे लकवा मार गया। हम सब एक हैं, एक ही ईश्वर की संतान हैं, भारतमाता की संतान हैं, तात्विक रूप से एक ही ब्रह्म के हम विविध रूप हैं यह भावना विस्मृत हो गई। जातियों की दीवारें खड़ी हो गईं। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं कि, हिंदू समाज बिना सीढ़ियों वाली कई मंजिली इमारत वाला समाज बन गया। जो जिस मंजिल पर है, उसे उसी मंजिल पर रहना है। परस्पर आदान-प्रदान कम हो गया। जो दूसरे से कम से कम संबंध रखेगा उसे शुद्ध कहा गया। रोटी व्यवहार बंद हो गया, बेटी व्यवहार बंद हो गया, मिलना-जुलना बंद हो गया, जिससे हिंदू समाज में बिखराव का बोलबाला हो गया।

॥नुकसान॥

समाज का इस तरह दड़बे-बंद विभाजन किया गया। उसके पीछे धर्म का अधिष्ठान खड़ा किया गया। धर्म ने तय किया कि ब्राह्मण सब से श्रेष्ठ है और अन्य वर्ग को उसकी पूजा करनी चाहिए। शूद्र को ज्ञानार्जन नहीं करना चाहिए, शस्त्र धारण नहीं करना चाहिए, अस्पृश्य को गांव के बाहर रहना चाहिए। उन्हें अत्यंत गंदे काम करने चाहिए। वे अच्छे कपड़े न पहनें। सोने-चांदी के गहने न पहनें। गांव जो कहे वे काम उन्हें करने चाहिए। अस्पृश्य बंधुओं को सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक गुलामी की बेड़ियों में कसकर जकड़ा गया।

हिंदू समाज द्वारा स्वीकार किए गए इस जातिभेद के कारण हिंदू समाज का प्रचंड नुकसान हुआ। पवित्रता की कल्पना के कारण समुद्र लांघने पर प्रतिबंध लगाया गया। विदेश में जाने पर जाति कलंकित होती है, यह धर्म नियम बन गया। लोकमान्य तिलक के इंग्लैण्ड से लौटने के बाद पुणे के धर्ममार्तंडों ने उनसे प्रायश्चित्त करवाया। किसी समय विश्व को आर्य बनाने के संकल्प के साथ हिंदू युवक दुनियाभर में गए। बाद में उन्होंने अपने को बंदिस्त बना लिया। किसी भी तरह का सार्वजनिक काम करना हिंदू समाज में अत्यंत कठिन हो गया। सार्वजनिक कार्यों में सभी जातियों का सहभाग होना चाहिए, लेकिन जातिभेद व जाति-गर्व के कारण यह संभव नहीं हो पाता था। राजर्षि शाहू महाराज ने, अपनी प्रजा को शिक्षित करने के लिए कोल्हापुर में छात्रावास स्थापित किए। आरंभ में सभी जातियों के छात्र एकसाथ रखे। परंतु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। अतः उन्हें विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग छात्रावास खोलने पड़े।

समाज के मुख्य व्यवहार तीन तरह के होते हैं- राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक। इन तीनों व्यवहारों में बहुजन समाज दूर फेंका गया। शासन करने का उनका अधिकार छीन लिया गया। वह धर्माधिकारी बन नहीं सकता था, और आर्थिक दृष्टि से वह कंगाल था। समृद्धि केवल कुछ वर्गों के हाथों में सिमट गई। सामान्य व्यक्ति सामान्य ही रह गया। समाज जब अपने घटकों पर इस तरह के बंधन लगाता है तब वह अपनी प्रचंड कर्तृत्व-शक्ति को दुर्बल बनाता होता है। फलस्वरूप समाज के सभी क्षेत्रों में जो ऊंचाइयां छूनी चाहिए वह नहीं होता। समाज विकलांग हो जाता है, दुर्बल होता है।

समाज के विविध घटक एक दूसरे से विभक्त होते हैं। तब वे स्वयं ही संकुचित हो जाते हैं। उनके विचार संकुचित होते हैं, उनकी दृष्टि संकुचित हो जाती है, और वे स्वार्थी हो जाते हैं। जीवन संघर्ष में अपना अस्तित्व कैसे बनाए रखे यह उनकी चिंता होती है। वे व्यक्तिगत रूप से स्वार्थी होते हैं और समूह के रूप में भी स्वार्थी बन जाते हैं। इसलिए हमारे देश में एक विचित्र इतिहास दिखाई देता है, मुस्लिम आक्रांताओं का साम्राज्य स्थिर करने और उसे बढ़ाने में अपने लोगों के बीच के ही सेनापति व फौजदार कारण बने। अकबर के साम्राज्य का विस्तार राजा मानसिंह ने किया। औरंगजेब के साम्राज्य का विस्तार राजा जयसिंह ने किया। आदिलशाह का विस्तार भोसले-जाधव, मोहिते आदि मराठी सरदारों ने किया। प्रत्येक का व्यक्तिगत स्वार्थ था और जातिगत स्वार्थ भी था। ब्राह्मण समाज भी इसमें पीछे नहीं रहा। उन्होंने आक्रांताओं का बौद्धिक काम किया।

समाज में समरसता की भावना नष्ट होने से ‘कोई भी नृप होइ हमें का हानि’ इस तरह की भावना बलवती हुई। जब सामान्य व्यक्ति देश की हलचलों से दूर रहता है, कट जाता है तब वह उदासीन हो जाता है। इसाप की एक कथा हैः एक गांव पर विदेशियों का आक्रमण होता है और भागमभाग शुरू हो जाती है। एक धोबी अपने गधे से कहता है, ‘तू भी भाग, विदेशी आक्रमण हो रहा है।’ गधा कहता है, ‘मालिक मैं क्यों भागूं? नए आने वाले मालिक मुझ पर उतना ही बोझ डालने वाले हैं जितना आप डालते हैं। अतः मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे मालिक बदल जाते हैं यही मेरी दृष्टि से फर्क है।’ विदेशी सत्ता हमारे देश में एक हजार वर्ष तक रहने का यही कारण है। रूस पर नेपोलियन ने हमला किया। रूसियों ने क्या किया? उन्होंने अपने देहातों में आग लगा दी और वे उत्तर व पूरब की ओर बढ़ते गए। नेपोलियन के हाथ में निर्जन गांव की जागीर आ गई। हिटलर ने भी रूस पर हमला किया। रूसियों ने पहले जैसा ही किया और नाजी सेना को संकट में डाला। अल्लाउद्दीन खिलजी केवल पांच हजार की सेना लेकर दिल्ली से औरंगाबाद पहुंचता है। उस हजार मील की यात्रा में उसे कोई नहीं रोकता। गज़नी का महमूद गज़नी से सोमनाथ तक बेखौफ आता है। उसका मार्ग कोई नहीं रोकता। कोई भी आए उससे मुझे क्या, यह अलिप्तता की भावना जब मन में घर कर जाती है तब परतंत्रता का नामपट्ट गले में आ ही पड़ता है।

॥महापुरुष॥

हिंदू समाज की समरसता का विचार दो महापुरुषों ने बड़ी गहराई से किया है। इसमें पहले महापुरुष हैं पूजनीय डॉ. हेडगेवार और दूसरे महापुरुष हैं पूजनीय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर। डॉ. हेडगेवार ‘मुझे उससे क्या?’ इस हिंदू समाज की अलिप्त मनोवृत्ति से भयंकर व्यथित हुआ करते थे। आज़ादी के आंदोलन के समय वे सोचते थे कि किन बुनियादी दोषों के कारण हम गुलाम हुए। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि, हमारे द्वारा अपनी पहचान भूल जाने से यह अनर्थ हुआ है। हमारी पहचान क्या है? जाति हमारी पहचान है या राष्ट्रीय शब्द हिंदू हमारी पहचान है? और उन्होंने दृढ़निश्चय किया कि वे हिंदू समाज में हिंदू की पहचान जगाएंगे। हम सब एक हैं, हमारा देश एक है, हमारी संस्कृति एक है, हमारी राष्ट्रीयता एक है, हमारा इतिहास एक है, हमारे आदर्श एक हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य समान हैं इस अर्थ में हम हिंदू हैं। उनका आत्मविश्वास था कि हिंदू भाव जाग्रत होने पर बंधुभाव स्वयमेव ही निर्माण होता है। बंधुभाव निर्माण होने पर स्वयमेव समरसता निर्माण होती है। समरस भाव निर्माण करने का अद्भुत कार्य डॉ. हेडगेवार ने संघ शाखाओं के माध्यम से कर दिखाया। वर्धा के संघ शिविर में महात्मा गांधी ने इसका अनुभव किया। शिविर में सभी जाति-पांतियों के हिंदू, जिनमें अस्पृश्य भी शामिल हैं, एकसाथ रहते हैं, एकसाथ भोजन करते हैं यह उन्होंने देखा। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने जब पुणे के संघ शिविर में गये तब उनका अनुभव भी यही रहा। समाज में बंधुभाव निर्माण हुए बिना देश शक्तिशाली नहीं होगा, अन्य बातें गौण हैं, यह जिस तरह इतिहास ने साबित कर दिया उसी तरह डॉ. हेडगेवार ने प्रत्यक्ष कार्य कर यह सिद्ध कर दिया।

॥दर्शन॥

अपने जीवन दर्शन को विशद करते हुए डॉ. बाबासाहब आंबेडकर कहते हैं, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व मेरे जीवन की सिद्धांतत्रयी है। आगे वे कहते हैं कि, ये तीनों तत्व एक-दूसरे से अिंभन्न रूप से जुड़े हैं। वे स्वतंत्रता व समता का पृथक रूप से विचार नहीं करते। वे कहते हैं, असीमित स्वतंत्रता, समता को नष्ट करती है, अमर्याद समता, स्वतंत्रता को भक्ष्य बना देती है। असीमित स्वतंत्रता व समता में बंधुभाव नष्ट होता है। इन तीनों तत्वों में सर्वाधिक महत्व बंधुभाव का है। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने कहा कि, भारत के नागरिकों को आपस में बंधुत्व की भावना से बर्ताव करना चाहिए। एक दूसरे पर सगे भाइयों की तरह प्रेम करना चाहिए। यह बंधुभाव पुरुष-प्रधान नहीं है यह ध्यान में रखना चाहिए। बंधु-बहन की तरह हमें अपना बर्ताव रखना चाहिए यह उसका भावार्थ है।

डॉ. बाबासाहब बंधुभाव को इतना महत्व क्यों देते हैं? इसका जवाब यह है कि, बंधुत्व के बिना समाज का संगठन असंभव है। और समाज यदि संगठित न हो तो वह बलशाली नहीं होगा। वे कहा करते थे कि, देश को आज़ादी आज न कल मिलने ही वाली है, किंतु मेरे समक्ष प्रश्न प्राप्त आज़ादी को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए यह है। जातिभेद बनाए रखकर, अस्पृश्यता बनाए रखकर, दुर्बल पर अन्याय कर स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की जा सकेगी। स्वतंत्रता की रक्षा करनी हो तो देश के सभी की ‘यह मेरा देश है, मैं देश के लिए हूं’ यह भावना होनी चाहिए। यह भावना केवल कानून बनाने से या भाषण करने से अथवा सरकारी सुविधाएं पैदा कर देने से उत्पन्न नहीं होगी। इसके लिए समाज में मानसिक परिवर्तन कराना होगा। मानसिक परिवर्तन का मार्ग धम्म होता है। भगवान गौतम बुद्ध ने जनता को सद्धर्म का उपदेश किया। उनके पास राजसत्ता नहीं थी। उन्होंने लोगों का मन-परिवर्तन किया। मन-परिवर्तन ही परिवर्तन का मार्ग है। इस मार्ग से ही समाज में समरसता निर्माण हो सकती है। वे कहते थे, बंधुत्व धर्म का दूसरा नाम है या बंधुता ही धर्म है।

समाज के मानसिक परिवर्तन का उनका मार्ग कुछ अलग था। मानसिक परिवर्तन के लिए उन्होंने १. आंदोलन, २. प्रबोधन, ३. कुविचारों के विरुद्ध संघर्ष, ४. हिंदू धर्म की बुराइयों पर कठोर प्रहार जैसे मार्ग अपनाए। जिसे आंदोलन करना हो उसे किसी न किसी का विरोध करना होता है और इसीलिए विरोधक उसे मित्र नहीं मानते। वे उसे शत्रु मानते हैं। बाबासाहब का आंदोलन चातुर्वर्ण्य मानने वाले, जातिभेद मानने वाले, अस्पृश्यता मानने वाले और उसे ही धर्म मानने वाले सनातनी विचारों के लोगों के खिलाफ था। उन्होंने जिस काल में आंदोलन आरंभ किया उस काल में सनातनी लोगों का हिंदू धर्म पर प्रभाव था। महात्मा गांधी के विचार भी इसी सनातनी परम्परा के थे। इसलिए बाबासाहब का वैचारिक संघर्ष महात्मा गांधी से हुआ। सनातनी लोगों ने बाबासाहब को धर्म-विरोधी, हिंदू धर्म का दुश्मन करार दिया। उनका प्रभाव सामान्य लोगों पर होने से सामान्य लोगों की भी यही धारणा बनी। लेकिन आज शांतिपूर्वक विचार करें तो ऐसा नहीं लगता। बाबासाहब हिंदू धर्म के परममित्र महसूस होते हैं।

॥कार्य॥

समरसता को उन्होंने बंधुभाव से जोड़ दिया। देश का निर्माण करना हो तो और प्राप्त स्वतंत्रता को सार्थक बनाना हो तो उसमें सब का सहभाग होना चाहिए। उन्होंने राज्य संविधान के माध्यम से सब की सहभागिता का जो कार्य किया उसका कोई सानी नहीं है। उन्होंने सभी को समान राजनीतिक अधिकार दिए। हरेक को एक वोट, और हर वोट का समान मूल्य तय कर उन्होंने राजनीतिक समता का निर्माण किया। लिंगभेद समाप्त कर दिए। राज्य, जन्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव न करने की गारंटी दी। आर्थिक विकास का सब को समान अवसर दिया। राज्य के दिशानिर्देशक तत्वों के जरिए दुर्बल घटकों के लिए राज्य को क्या करना चाहिए इसकी रूपरेखा पेश की।

उनका यह कार्य क्रांतिकारी है। वह क्रांतिकारी इसलिए है कि, हिंदू समाज की रचना मूलतया विषमता के आधार पर हुई है। जन्मसिद्ध, पवित्रता- अपवित्रता भी इस व्यवस्था की बुनियाद बनी। हजारों वर्ष इस व्यवस्था को चलाया गया। यह व्यवस्था तोड़कर उसके स्थान पर नई व्यवस्था लाना उतना आसान काम नहीं है। समाज का इतिहास इस तरह होता है कि, वर्तमान व्यवस्था कुछ समूहों के लिए लाभप्रद होती है। ये समूह सत्ता-स्थानों पर काबिज होते हैं। वे परिवर्तन का जी-जान से विरोध करते हैं, क्योंकि उनके स्वार्थ खतरे में होते हैं। ये सारे लोग अपने ही होते हैं। उनसे लड़ना आसान नहीं होता। वह काम बाबासाहब ने किया। अपने समाज की व्यवस्था किस तरह होनी चाहिए इसका एक मार्ग उन्होंने बताया।

॥बातें॥

समाज का विचार करते समय अन्य तीन बातों पर भी सोचना होता है। समाज में रहने वाला व्यक्ति एकाकी नहीं होता। वे परस्पर पर निर्भर होते हैं। परस्पर निर्भरता के कारण समाज व्यवस्था को ठीक ढंग से चलाने के लिए परम्पराओं के अनुकूल व्यवहार करना होता है। व्यक्ति चाहे जितना ताकतवर हो फिर भी वह रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, मनोरंजन, यातायात में से कोई भी चीज अकेला नहीं कर सकता। एक व्यक्ति को जिंदा रखने के लिए समाज के हजारों लोगों को अपनी-अपनी जगह श्रम करने होते हैं। बदन पर पहने जाने वाला कपड़ा भी हम नहीं बुन सकते। और, पकने वाला चावल का दाना भी हम तैयार नहीं कर सकते। यह सब हमें समाज देता है।

इसके लिए परस्पर संलग्नता, परम्परानुकूलता, परस्पर-निर्भरता ये तीन घटक समाज के तीन बुनियाद घटक होते हैं। समाज में समरसता कायम करनी हो तो इन तीनों का ध्यान हमें रखना होगा। हम परस्पर संलग्न हैं यह भाव मन में होने पर समाज में कोई भी भूखा नहीं रहेगा। इसी तरह मेरे पास पैसा है इसलिए मैं चाहे जैसे अन्न को बर्बाद करूंगा यह भाव भी नहीं रहेगा। व्यक्ति को एक दूसरे के अनुकूल व्यवहार करना होगा। हम एक दूसरे पर निर्भर हैं यह ध्यान में रखें तो किसान आत्महत्या नहीं करेगा, कृषि उपज को उचित दाम मिले इसका हम ध्यान रखेंगे। समाज में यह भावना दिन-ब-दिन प्रबल होना अत्यंत जरूरी है। इसके लिए क्या करना चाहिए इस पर भी विचार करना चाहिए।

॥कार्य॥

प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत स्तर पर, परिवार के स्तर पर, जाति के अहंकार से दूर रहना चाहिए। जन्म जाति से व्यक्ति का स्थान तय नहीं करना चाहिए, वह अपना है यह भावना मन में होनी चाहिए। दूसरी बात यह कि, हमारे घर के दरवाजे हमारे बंधुओं के लिए खुले होने चाहिए। हमें मिलने-जुलने, रोटी और बेटी के बंधन तोड़ देने चाहिए। जो सार्वजनिक कार्य हम करें उसमें उन्हें सम्मिलित करने की हमारी भूमिका होनी चाहिए। हमारा काम किसी एक जाति का नहीं होना चाहिए। अपने कार्य में अपने हिंदू समाज का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए। ईश्वर की पूजा करने का सब को समान अधिकार है। इसलिए हमारे गांव के मंदिर सब के लिए खुले होने चाहिए। मंदिर जिस तरह खुले होने चाहिए उसी तरह पौरोहित्य करने का अधिकार सब को समान होना चाहिए। ऐसा हो कि संस्कृत सभी पढ़ पाए, संस्कृत के मंत्र सभी कह सके।

आज भी समाज में दुर्बल घटाकों पर अन्याय, अत्याचार होते हैं। आज भी अन्याय, अत्याचार की घटना होने पर केवल उस जाति के लोग ही इकट्ठे होते हैं और निषेध मोर्चेनिकालते हैं। यह प्रथा बंद होनी चाहिए और समाज के किसी भी घटक पर अन्याय पूरे समाज पर अन्याय है यह भावना हमारे मन में उत्पन्न होनी चाहिए। सब को एकत्रित आना चाहिए और सामाजिक एकता का दर्शन कराना चाहिए। इस तरह होने पर ही समरसता केवल वैचारिक न होकर व्यवहार का विषय बनेगी। समाज में पैसे के अभाव में कोई काम रुकना नहीं चाहिए। बीमारी, शिक्षा, आकस्मिक संकट से व्यक्ति व परिवार संकट में पड़ते हैं। पैसे के अभाव से अनेक संकट आते हैं। समाज की स्थिति कल्पवृक्ष जैसी होनी चाहिए। यह यद्दपि आदर्शवाद है, फिर भी सब के हित का होने के कारण उसे प्रत्यक्ष व्यवहार में लाने के अलावा हमारे समक्ष और कोई विकल्प नहीं है।

मो.: ०९८६९२०६१०१

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