आजीविका और समृद्ध जीवनशैली की आस में निकले प्रवासी मैथिली देश-दुनिया में रच-बस गए है, लेकिन आज भी उन्होंने मिथिला को दिल में संजोकर रखा है। प्रवासी मैथिली अनेक संस्था व संगठनों के माध्यम से मैथिली भाषा-संस्कृति का प्रचार प्रसार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मिथिला की धरती पर तेजी से हो रहे डेमोग्राफिक चेंज के संकट से वे अनभिज्ञ हैं।
अनुमानतः मैथिल अथवा स्वयं को मिथिलावासी कहने वाले प्रवासियों की संख्या लगभग 3 करोड़ से अधिक हैं। यह दुनिया के कई देशों तथा अपने घर बार से हजारों किलोमीटर दूर अनेक राज्यों में प्रभावी संख्या में जा बसे हैं।
70-80 के दशक में मिथिला से पलायन करने वालों की बाढ़ आ गई थी। आजीविका के संकट से उबरने के लिए बड़ी संख्या में मैथिल खेतिहर मजदूर हरित क्रांति को मूर्तरूप देने में लग गए। ट्रेन और बसों में भर-भर कर लोग पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश जाने लगे। वहां की खेतों को उन्होंने अपने श्रम के पसीने से लहलहा दिया, लेकिन वहां पर उनमें प्रवास का स्थाई भाव कम ही था। खेती के मौसम के बाद खेतिहर मजदूर घर लौटते रहे। कोराना काल की विभीषिका ने बड़ी संख्या में बाहर काम कर रहे मजदूरों से नौकरी छीनी। मजदूर जान बचाकर घर भागे और बेहाल व परेशान होकर घर बैठ गए।
खेतों में कमाई करने वाले मैथिल मजदूर की दिशा को औद्योगिकरण के झोंके ने कुछ हद तक बदल दिया है। दिल्ली, नोएडा, मुंबई, पुणे, सूरत, बैंगलोर, चेन्नई आदि महानगरों की फैक्ट्रियों को चलाने में मैथिल मजदूरों की खासी संख्या हैं। बीती सदी में कोलकाता मैथिलों के लिए रोजगार का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था, जो कोलकाता नहीं जा पाते थे उनके बीच कहावत प्रचलित थी ‘लिखा न विधि कलकत्ता कमाई’।
निजी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर खुले तो कोलकाता का रास्ता बदलकर मैथिल मजदूर दुनिया के विस्तार में समाहित होने लगे। इस सदी में आईटी क्षेत्र के खुले अवसरों की धूम ने मैथिलों को यूएस, यूके, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, स्विट्जरलैंड आदि विकसित देशों में अच्छी खासी संख्या में पहुंचा दिया। डॉलर और पाउंड वाली सैलरी स्ट्रक्चर ने खास वर्ग के मैथिलों को विपन्नता के श्राप से मुक्ति दिलाने में सहायता की है।
बड़ी आईटी कम्पनियों में यह राय आम है कि सभ्यता, संस्कृति को आत्मसात करने वाले लोगों की चेतना स्वस्थ रहती है और उपयुक्त सोचती है। स्वस्थ चेतना वाले मस्तिष्क किसी समस्या का समाधान अच्छी तरह से निकाल लेते हैं। इस सोच ने मिथिला की पृष्ठभूमि से आने वालों के लिए ‘सोने पे सुहागा’ जैसा अवसर उपलब्ध कराया, मगर सम्पन्न होते प्रवासी मैथिलों में यह टीस बढ़ रही है कि उनका अपना कोई स्थापित परिक्षेत्र नहीं है। ऐसा कोई दायरा नहीं जिसे मिथिला कहकर भौतिक जगत में रेखांकित किया जा सके। मैथिली भाषाई आधार वाले लोग दो राष्ट्र और दो राज्यों में बंटे हैं। इसमें भी मैथिली को अंगिका, वज्जिका, खोरठा में तो पहले से बांटने की कोशिश होती रही है। इन दिनों किशनगंज और अररिया की मुस्लिम जनसंख्या ने अपनी बोली को नया नाम सुरजपुरी दे रखा है। इसे लेकर तुष्टिकरण की राजनीति हावी होती जा रही है। मैथिली से अलग एक नई भाषा सुरजपुरी का आकार लेना प्रवासी मैथिलों को कचोट रहा है। खासकर प्रवासी मैथिलों का वो बौद्धिक वर्ग जो मनसा और वचना मिथिला को जी रहे हैं और कर्म से आकार देने का सपना संजोए हैं। अलग मिथिला राज्य बनें, इसके लिए मिथिला स्टूडेंट यूनियन और अन्य संस्थाएं दरभंगा, दिल्ली में खूब आंदोलन कर रही हैं। मैथिली संविधान की अष्टम सूची में शामिल होकर भारत की राष्ट्रीय भाषा है, पर मिथिला राज्य की मांग आसान नहीं है क्योंकि सम्पन्न हो रहा मैथिल वर्ग जिस मिथिला और मैथिली को अपने दिल में लेकर जी रहे हैं, उसकी जड़ में मट्ठा डालने का काम तेजी से चल पड़ा है। प्रवासी जिस मैथिल संस्कार, संस्कृति और समृद्धि की परिकल्पना को लेकर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, शिकागो, लंदन जैसे यत्र, तत्र सर्वत्र स्थानों में जी रहे हैं, वह उनको जमीन से गायब होता दिख रहा है। इसका बोध उड़ान भर कर दरभंगा एयरपोर्ट पर उतरते ही हो जा रहा है। दरभंगा एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन से ग्राम-घर तक पहुंचने के दौरान वज्रपात सा होता है। वह भाषा या संस्कार उनको विलुप्त होती नजर आ जाती हैं, जिसे लेकर वो प्रवास पर बचाने की श्रम साध्य यत्न कर रहे हैं। न सिर्फ आपसी बोलचाल की भाषा में मैथिली का प्रयोग कम से कमतर होता जा रहा है बल्कि विद्यापति गान, मखान, पकवान और व्यंजन सब बदल चुका है। जहां तिलकोरक पात के तरुआ की दुकान होनी चाहिए थी वहां जोमेटो के जादू से पीजा बर्गर और फास्ट फूड की होम डिलेवरी हो रही है।
मैथिल प्रवासियों की दारुण पीड़ा के बीच यह भी सच है कि प्रवासियों के प्रयास से दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में मैथिली का चलन जोर पर है। अन्य भाषी और क्षेत्रों के लोग मानते हैं कि मैथिल भाषियों में साहित्य, संस्कृति और सरोकार को लेकर खास आग्रह है। प्रवासी मैथिल संघों के मंचों के जरिए मैथिली संस्कृति का बोलबाला है। इनके बीच समस्या बस एक ही है कि मैथिल कई संगठनों के बीच आपस में बंटे हुए हैं। कोई जाति के नाम पर पृथक मैथिल संघ चला रहे हैं तो कई प्रांत और शहरों के नाम पर पॉकेट संस्थाएं चल पड़ी हैं। पिछले दिनों सिंगापुर में प्रवासी मैथिल संघ के सफलता की गूंज से यूएस में एक सम्यक मैथिल संघ बनाने की चर्चा खूब चल पड़ी है। इसी आधार पर यूके में भी काम हो रहा है। दिल्ली, मुंबई में मैथिलों की विशाल जनसंख्या को देखते हुए किसी एक बैनर तले मैथिली को समेटकर रखना अब असम्भव लगता है। दिल्ली में नाटक के लिए प्रसिद्ध मेलोरंग, मिथिलांगन जैसी निजी संस्थाओं के अलावा राष्ट्रीय नाट्य अकादमी, साहित्य अकादमी, मैथिली-भोजपुरी संघ जैसी कई सरकारी संस्थाएं अपने तरीके से सराहनीय काम कर रही हैं।
पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में मैथिली बोलने वालों की जनसंख्या वहां की अन्य भाषा यथा नेपाली, नेवारी, बंगाली, अवधी, थारू, कुमायुनी, गढ़वाली आदि की तुलना में काफी बड़ी है। जनकपुर, राजबिराज, बीरगंज और विराटनगर में मैथिली की ठोस उपस्थिति के अलावा राजधानी काठमांडू में आप सिर्फ और सिर्फ मैथिली में ही बोलकर काम चला सकते हैं। मैथिली की काठमांडू जैसी स्थिति आज मधुबनी जैसे मैथिली के भाषाई केंद्र में भी नहीं हैैं। आपको दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, लंदन हो या न्यूयॉर्क में बसे प्रवासी मैथिली अपनी सांस्कृतिक धरोहर को दिल में बसाए मिल जाएंगे।
– आलोक कुमार


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