मिथिला में हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी होने के बाद भी अब तक इसका स्थायी समाधान नहीं खोजा जा सका है। शासन-प्रशासन केवल राहत और सहायता कार्य की खानापूर्ति कर अपने काम की इतिश्री मान लेता है, जबकि यह सरकार का कर्तव्य है कि वह इस समस्या के निराकरण हेतु दुरगामी नीति और उपाय योजना बनाएं।
” हरल भरल छल बाग-बगीचा
सोना कटोरा खेत
देख-देख मोरी आफत ई है
सबरे बालू के ढेर”
अर्थात हरे भरे बाग-बगीचे, सोने के कटोरे जैसा खेत, मेरे दुर्भाग्य से देखते ही देखते सब बालू के ढेर में बदल जाते हैं। यह गीत बिहार के मिथिला क्षेत्र (तिरहुत, दरभंगा, मुंगेर, कोसी, पूर्णिया और भागलपुर प्रमंडल) की सबसे खास नदी कोसी नदी द्वारा लाई गई बर्बादी की कहानी कहता है और यह उस नदी की विनाशकारी शक्ति का परिचय देता है। एक बेचैन बच्चे की तरह, यह लगातार भू-भाग को आकार देती रहती है, यहां रेत जमा करती है और वहां जमीन का कटाव करती है। मिथिला के दूसरे भाग का बड़ा हिस्सा झारखंड के संथाल परगना प्रमंडल के साथ-साथ नेपाल के बागमती प्रदेश के तराई क्षेत्र के कुछ भाग भी शामिल हैं, किंतु उत्तर बिहार के 40 प्रतिशत हिस्से में कोसी नदी बाढ़ की प्रचंड विभीषिका अपने संग लेकर आती है। भारत में ब्रह्मपुत्र के बाद कोसी सम्भवतः सबसे अधिक गाद और रेत लेकर बहने वाली नदी है। जानकारों की राय में मिथिला में नदियों के तल में जमा अवसाद उसके प्रवाह को बाधित करता है, जिसके कारण वह प्राय: अपने किनारों का कटाव करती है और एक नया मार्ग बना लेती है। यह एक बड़ी चुनौती है। इस वर्ष भी यहां बाढ़ की लहरों में भूमि का कटाव खूब हुआ, सोशल मीडिया में इससे जुड़े रील्स लोकमानस के हाहाकार से सामना करवाने में सफल रहे हैं।
यहां की बाढ़ त्रासदियों और विरोधाभासों का मिलान है। इसी वर्ष कोसी नदी बहुत बड़े क्षेत्र की जमीन खा गई, जिसे किसी काश्तकारों ने तटबंधों के बीच खेती के लिए पट्टे पर लिया था। फसलें निगलकर भी कोसी को संतोष कहां हुआ, वह घरों को भी लील गई। कई गांवों में इस नदी ने जमीन में डेढ़ बांस गहरे घाव छोड़ गई है। ग्रामीणों की पीड़ा है, ‘जैसे ही पानी उतरा, एक ही बार में एक कट्ठा (126 वर्ग मीटर) जमीन पानी में समा गई।’ पहली फुहार के शुरुआती दिनों में अनूठा दृष्यबंध मिथिला को मोहने लगा। तटबंधों के बाहर दूर तक फैले हरे-भरे खेत, जिनमें बांस के मोटे गुच्छे बिखरे हुए हैं, नजर आते हैं, लेकिन कई गावों में बीते साल की बाढ़ का जमा पानी आज भी है। जल निकासी न होने के कारण तालाबों में पानी जमा है और कीचड़ की गहरी परत भी है। महिलाएं और बच्चे अपने घरों को दिवाली से पहले नया लेप देने के लिए मिट्टी निकाल रहे हैं। कुछ लोग पटर (सरकंडा) सुखा रहे हैं या तालाबों से भीगा हुआ पटसन (जूट का पौधा) खींच रहे हैं। नदी की मुख्य धारा पूर्वी तटबंध के पास शांति से बह रही है। पश्चिमी ओर काफी दूरी तक फैली हुई कास (जंगली उपज) की झाड़ियां बाद में जाड़े के आगमन से ठीक पहले खिलने लगती हैं। यह खूबसूरत दृश्य तब धुंधला हो जाता है जब हम लोगों से बात करना शुरू करते हैं।
उत्तर बिहार खास तौर से मिथिला की एक दर्जन से कहीं ज्यादा नदियां बरसात में बहुत चपल हो जाती हैं, चंचल और उद्विग्न भी। खास तौर मिथिला का क्षेत्र जो मुलायम माटी पर निर्मित सुंदर-सुखद घरौंदा सा दिखता है, लेकिन मानसून के मौसम में जैसे अनेक बस्तियां या तो डूब जाती हैं या नदियों के संजाल में उफनते हाहाकार के बीच द्वीपों में बदल जाती हैं। फिर यह निष्कर्ष स्वयंसिद्ध हो जाता है कि नदियों का मार्ग बदलना, उछलना और मचलना मानव सभ्यता के लिए घातक होता है। रिपोर्ट है कि वर्ष 1723 से 1948 के बीच के केवल 225 वर्षों में ही कोसी 160 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई थी। बुजुर्गों ने बताया कि इस नदी ने 1938 में सुपौल जिले से बहना शुरू किया। कोसी के आने से पहले यह क्षेत्र समृद्ध था। यहां पानी नहीं, बल्कि दूध की नदियां बहा करती थीं क्योंकि पर्याप्त चारागाह होने से पशुधन की कमी नहीं थी, किंतु कोसी जब आई तो अपने साथ महामारियां लेकर आई। हफ्ते-दस दिन के लिए बाढ़-महीनों के जलजमाव और उनसे पैदा हुई जानलेवा बीमारियों का सिलसिला बीती सदी के बाद के वर्षों में शुरू हुआ।
विनाश के बीच तकनीकी मूर्खता घातक हो गईं। तकनीकी मूर्खता क्या है? नदियों के किनारे तटबंध बनाने की नई संस्कृति यह मूर्खता है जो बड़े विनाश का कारण बन गई। बीते 15 वर्षों में अकेले कोसी ने अब तक आठ बार अपने तटबंधों को तोड़ा है, जिससे बड़ी बाढ़ें आई हैं। हर एक किलोमीटर पर तटबंधों से स्पर निकले हुए हैं, जो कोसी की तेज धारा से उनकी रक्षा करते हैं। ये तटबंध स्वतंत्रता के तुरंत बाद 1959 तक बनाए गए थे, ताकि कोसी नदी को नियंत्रित किया जा सके, जो अपनी धारा तेजी से बदलने और बाढ़ लाने के लिए कुख्यात रही है। तटबंध बनने के बाद मिथिला के कई गांव और क्षेत्र जेल में बदल गए हैं। पहले पानी आता और चला जाता था। जमीन उपजाऊ बनी रहती थी। अब तो जिनके पास तटबंध के भीतर 50 बीघा जमीन है, वे भी बाजार से अनाज खरीदते हैं। तटबंध बनने से पहले कोसी कई धाराओं में एक बड़े क्षेत्र में बहती थी। ये धाराएं भूजल स्तर बनाए रखती थीं और खेतों की सिंचाई करती थीं। तटबंधों ने कोसी की मुख्य धारा को बांध दिया, जिससे बाकी धाराएं बाहर रह गईं।
परिणाम दुखद हैं, बाढ़ का पानी कम हुआ तो संयोग से सुपौल जाने का अवसर मिला। यहां का सबसे बड़ा बाजार, जिसे 1956 में तटबंधों का एक घेरा बनाकर सुरक्षित किया गया था, आज ऐसा लगता है जैसे वह एक खाई में बंद हो गया हो। पूर्व में कोसी और पश्चिम में उसकी सहायक नदी भूतही बलान द्वारा लाई गई रेत ने तटबंधों के बाहर की ज़मीन का स्तर ऊंचा कर दिया है। वहां की तंग-भरी दुकानों ने मुझे पुरानी दिल्ली के पर्दा बाग की याद दिला दी। खाई में उतरने के बाद एक पुराने रेलवे स्टेशन का अवशेष दिखता है। बताते हैं कि जब बारिश होती है, तो इस खाई से पानी बाहर पम्प करना पड़ता है।
भारत-नेपाल के अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास है बीरपुर। यहां की कहानी किसी ने बताई थी, जहां 2008 में कोसी ने नेपाल के कुसहा में तटबंध तोड़ने के बाद बहना शुरू किया था। मानो एक विशाल रोलर उपजाऊ ग्रामीण क्षेत्र से होकर निकला हो। अपनी 3 किलोमीटर चौड़ी राह में नदी ने पेड़ों को उखाड़ दिया और पीछे रेत छोड़ दी। उस साल बाढ़ में आधिकारिक आंकड़े में 500 से ज्यादा लोग मारे गए थे। यहां कोसी ने एक नया रास्ता बनाकर बहना शुरू कर दिया था। यहां आया तो ढेरों प्रश्न सामने थे। बाढ़ का प्रकोप लगातार बढ़ क्यों रहा है? हर वर्ष मिथिला की जलसमाधि उसकी नियति क्यों बन रही है। क्या अयोध्या और द्वारका की तरह मिथिला भी अभिशप्त है? क्या यहां की भौगोलिक स्थिति, माटी के स्वभाव और पानी के चाल-चलन के अनुरूप बाढ़ की रोकथाम की दिशा में काम पूरा किया गया? पिछले वर्ष की बाढ़ से इस वर्ष कहीं अधिक प्रचंड बाढ़ थी। अगले वर्ष और भी भयावह होगी, यह तय है। यह भी मान चुके हैं कि नेपाल से बहकर आने वाली नदियों में कोसी से पैदा संताप सबसे अधिक बर्बादी करती है।
हिमालय विनाश के दौर से गुजर रहा है। पहाड़ काटे जा रहे हैं। जंगलों में विनाश का सिलसिला तेज हो चला है। बारिश के पानी के साथ पहाड़ों की माटी नदियों के साथ बहकर उसकी गोद को भरती जा रही है। तटबंध बनाने का सिलसिला थमा नहीं है। अब तो बिहार में नदियों की लम्बाई से कई गुना ज्यादा तटबंधों की लम्बाई हो चुकी है। बाढ़ तटबंधों को तोड़ देती है और गांवों का फैला पानी तटबंधों के कारण कैद हो जाता है। हजारों एकड़ जमीन वर्षोंजलप्लावन की भेंट चढ़ रही हैं। क्या तटबंधों के कारण मिथिला के गांव नदियों के द्वीप कहलाएंगे? क्या नदियों के चरित्र के अनुसार बाढ़ से जुड़ी नीतियों की आवश्यकता आज समय की मांग नहीं है? सरकार कब समझेगी कि बाढ़ स्वयं में समस्या नहीं है और किसान बाढ़ का दिल से स्वागत करता है। मिथिला मखान और मछली की संस्कृति है। यह सोचना होगा कि कहीं अतिशय जलजमाव इस संस्कृति को बर्बाद न कर दे।
तटबंधों के जाल ने कई गांवों के जल निकासी को अवरुद्ध कर दिया है। गाद से भरी नदियों की सफाई और जलग्रहण क्षेत्रों में वनरोपण बहुत आवश्यक है। मिथिला केवल भूगोल का एक हिस्सा नहीं है। यह पौराणिक परिधि में सजा एक सांस्कृतिक विचार है, लोकाचार है। गायकी, चित्रकारी और सभ्यता के काव्य सौष्ठव का गौरवगान है। मिथिला बाढ़ की त्रासदी के बाद मात्र राहत और नीतियों की असफलता के ऊपर फूहड़ निराकरण की रंगभूमि बनकर रह गई है।
-अमरेंद्र किशोर


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