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दिव्यांगों के क्षेत्र में तेजी से सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है। मूल बात यह है कि उन्हें दया नहीं, स्वावलम्बी बनने के लिए मदद चाहिए। प्रस्तुत है दिव्यांगों के क्षेत्र में आए बदलावों, संस्थाओं, समस्याओं पर पश्चिम महाराष्ट्र, सक्षम के अध्यक्ष एड. मुरलीधर कचरेजी से  हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंशः-

जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ उस दौर में समाज दिव्यांगों को किस दृष्टि से देखता था?

पुराने समय में किसी बच्चे या व्यक्ति में विकलांगता क्यों आती है, इसके कारण अज्ञात थे। परंतु जैसे-जैसे समय बदलता गया विकलांगता के प्रकार एवं परिभाषा भी बदलती गई। अस्वच्छ वातावरण, गरीबी, ग्रामीण भागों में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव, दुर्घटना तथा अज्ञानता के कारण यह होता है। पोलियो सरीखी बीमारी बड़े पैमाने पर देश के विविध प्रांतों में व्याप्त थी। समाज का, परिवार का इस बीमारी की ओर देखने का दृष्टिकोण भी सही नहीं था। पोलियोग्रस्त बच्चे दिमाग से तो सामान्य बच्चों की तरह ही होते हैं, परंतु उनका पैर या हाथ काम नहीं करता। परिवार मान लेता था कि ये बच्चे अब कुछ नहीं कर सकते। इसलिए वे बच्चे घर के एक कोने में दुर्लक्षित पड़े रहते थे। और अगर परिवार गरीब होता तो सड़कों पर भीख मांगते थे। 90% मामलों में उनकी चिकित्सा या शिक्षा-दीक्षा का विचार कोई नहीं करता था। संतान अगर गूंगी और बहरी है तो क्यों है, इसकी चिंता कोई नहीं करता था। वास्तविकता यह होती है कि बहरा होने के कारण बच्चा सुन नहीं पाता इसलिए चुप रहता है और बोल नहीं सकता; यह समझ समाज में थी ही नहीं। परंतु आज प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि जो सुन नहीं सकते वे भी बोल सकते हैं।

कुष्ठ रोगियों की भी यही स्थिति थी। यदि व्यक्ति कोकुष्ठ रोग हो गया तो समाज उसका बहिष्कार कर देता था। उसे गांव से, समाज से अलग कर गांव के बाहर रखा जाता था। उसकी सेवा सुश्रुषा कोई नहीं करता था, उसे अछूत समझा जाता था। ऐसे दिव्यांग एवं कुष्ठ रोगियों का उपचार कुछ समाजसेवी करते थे। शासन थोड़ी बहुत सहायता करता था। परंतु वह सहायता निष्फल जो जाती थी। यह बात समाजसेवी कार्यकर्ताओं के ध्यान में आई एवं फिर अनेक जगह ऐसी सहायता संस्थाओं की स्थापना हुई।

अपंग कल्याणकारी संस्था सन में 1956 में स्थापित हुई। समाजसेवी कार्यकर्ता गांव-गांव घूमते थे एवं लोगों की समस्याओं का पता करते थे। उस समय उन्हें पता चला कि गावों में पोलियो की समस्या विकराल है। बच्चे जानवरों सा जीवन जीने को मजबूर हैं। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। जब कार्यकर्ताओं के ध्यान में आया कि यह अकेले के बस की बात नहीं है। इसके लिए संगठित उपाय आवश्यक है। तब उन्होंने जगह-जगह संस्थाओं की स्थापना की। यद्यपि संस्थाएं अच्छे उद्देश्य से स्थापित की गई थीं परंतु सेवा करने के लिए साधनों की कमी थी। उनके उपचार के लिए आवश्यक साधन, रहने हेतु जगह, उनके खाने-पीने की सुविधा इ. सुविधाएं बहुत कम थीं।

उस समय दिव्यांगों की शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं सामाजिक स्थिति कैसी थी?

दिव्यांगों को शिक्षा देने या उनके उपचार करने के बारे में समाज कुछ नहीं सोचता था; क्योंकि हमारा देश बहुत पिछड़ा था, गरीब था, यहां शिक्षा का अभाव था। परंतु जैसे-जैसे सामाजिक विकास होता गया वैसे-वैसे समाज के इस दृष्टिकोण में भी बदलाव आता गया।

स्वतंत्रता के 71 साल बाद दिव्यांगों के प्रति समाज का दृष्टिकोण सकारात्मक दिखाई देता है इसका विकास कैसे हुआ?

इसके बदले जाने के मूल में समाज प्रबोधन है जैसे-जैसे समाज की इस संदर्भ में मानसिकता को बदलने में सामाजिक कार्यकर्ताओं को सफलता मिली, समाज का रुख भी बदलता गया। राज्य एवं केंद्र शासन द्वारा इस ओर दिया गया ध्यान, इसके लिए बनाए गए कानून एवं समाजसेवी संस्थाओं को दिया जाने वाला अनुदान भी इसमें सहायक रहा। कुछ संस्थाएं अनुदान पर निर्भर थीं। परंतु कुछ बिना अनुदान के भी चलती थीं। परंतु जिन संस्थाओं को अनुदान नहीं मिलता था, उनमें दिव्यांगों को संभालने की क्षमता कम थी। कोर्ई 10, कोई 15, कोई अधिकतम 40 बच्चे ही संभालती थीं। उस समय उन बच्चों को संभालना एवं उपचार करना यही काम था। बाद में उन्हें चॉक, अगरबत्ती, मोमबत्ती इत्यादि बनाने जैसे काम भी सिखाए जाने लगे। अब तो कम्प्यूटर एवं मोबाइल रिपेरिंग जैसे काम भी सिखाए जाते हैं; जिससे ये बच्चे आत्मनिर्भर बन सकें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिव्यांगों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। उनके पहले क्या किसी ने दिव्यांगों के उत्थान हेतु कार्य किया है?

यह हमारे देश का भाग्य है कि हमें मोदीजी जैसे संवेदनशील प्रधानमंत्री मिले। वे स्वत: व्यक्तिगत रूप से इन समस्याओं पर ध्यान देते हैं। महाराष्ट्र में जब सुधीर मुनगंटीवार विपक्ष में थे तब वे दिव्यांगों के कल्याण संबंधी प्रश्नों के लिए रात दो बजे तक विधान सभा में बैठे रहते थे। क्योंकि किसी को भी इस विषय में सहानूभुति नहीं थी। वे ऐसे प्रश्नों को महत्वहीन समझते थे। परंतु अब सब को इन प्रश्नों का उत्तर देना अनिवार्य है। इसकी अवहेलना करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। प्रत्येक नगर निगम, नगर पलिका, ग्रामपंचायत को बजट का 3% दिव्यांगों के लिए खर्च करना आवश्यक है।

आप पिछले कुछ वर्षों से अपंग कल्याणकारी संस्था या सक्षम संस्था के माध्यम से दिव्यांगों के लिए काम कर रहे हैं। इन दोनों संस्थाओं के माध्यम से उल्लेखनीय कार्य हुए हैं या संस्था के माध्यम से कोई दिव्यांग किसी ऊंचे पद पर पहुंचा है इसके बारे में संस्था या आपके व्यक्तिगत अनुभव के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले एवं यहां संस्था में आने वाले बच्चों को प्राथमिक ज्ञान भी नहीं था। जब उन्हें यहां अंग्रेजी, गणित विषयों की शिक्षा दी गई तब उनमें से कई इंजीनियर बने, कई अध्यापक या मुख्य अध्यापक बने। इन बच्चों को शिक्षा देते समय ही बताया जाता था कि उनको अपने पैरों पर खड़ा होना है, भीख नहीं मांगनी है। इस प्रकार के संस्कार करने से उन्हें स्वाभिमान से जीवन जीने की प्रेरणा मिली। बहुत सी संस्थाओं एवं शासन द्वारा दी जा रही सुविधाओं के कारण उन्हें अब रोजगार के कई साधन उपलब्ध हैं।

अपंग से दिव्यांग तक की यात्रा, समाज का बदलता दृष्टिकोण, अपने बंधु समझकर समाज में सम्मानजनक स्थान इत्यादि जो परिवर्तन हुए हैं, उसके बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?

सच कहें तो समाज में आई जागरूकता एवं प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा उनका नामकारण दिव्यांग के रूप में करने कारण समाज में उन्हें उचित स्थान मिल रहा है। ये भी सम्माननीय लोग हैं और समाज में इसका विशेष स्थान है। अब समाज तथा दिव्यांगों दोनों में जागृति आई है। ’सक्षम’ संस्था उन्हें स्वाभिमानी बनने एवं स्वयं के पैरों पर खड़े होने में मदद करती है। वे समाज के लिए उपयोगी हैं, ऐसा भाव ’सक्षम’ उनमें पैदा करती है।

मैं एक उदाहरण देता हूं- भावेश भाटिया नामक एक व्यक्ति का मोमबत्ती बनाने का कारखाना है। वहां सौ अंध व्यक्ति कार्य करते हैं। केवल चैरेटी नहीं दिव्यांगों की ओर देखने का दृष्टिकोण बदलना होगा। उनकी ओर दयनीयता से न देखें; बल्कि उनकी सहायता करें। वे जैसे हैं वैसे ही उनका उपयोग करें। आज इस प्रकार के लोग सामान्य व्यक्तियों से अधिक काम करने वाले हैं ऐसा भी परिलक्षित होता है।

विकसित देशों में दिव्यांगों को सामान्य व्यक्ति की तरह ही देखा जाता है, यह स्थिति हमारे यहां कब आएगी?

विदेशों में दिव्यांग लोग समाज में निडरता से सारा काम करते हैं। हमारे यहां उन्हें बताना पड़ता है, मदद करनी पड़ती है। वहां बसों में इस प्रकार की बनावट है कि दिव्यांग भी आसानी से बस में चढ़ सकते हैं। सभी इमारतों में लिफ्ट है। उनके यहां ये सभी चीजें 20 वर्ष पुरानी हैं। हमारे यहां होने में अभी 20 वर्ष और लगेंगे। विदेशों में दिव्यांगों की सहायता करने वाले जो साधन हैं वे अच्छी क्वालिटी के हैं। उन्होंने इस पर बहुत संशोधन किया है।

आज हम देखते हैं कि दिव्यांगों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाएं केवल सेवाभाव या दिव्यांगों की मदद के लिए काम नहीं करतीं, अपने फायदे के लिए भी काम करती हैं? क्या परिवर्तन के इस युग में केवल सेवा भाव होने से काम चलेगा?

सेवा भाव अब स्थायी भाव होना चाहिए। क्योंकि सेवा भाव के बिना कुछ भी साध्य नहीं हो सकता। दिव्यांगों को यदि स्वावलंबी बनाने के लिए कुछ करना पड़ता है तो उसमें व्यापारिक दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। दिव्यांग यदि उद्यमी या व्यापारी बनना चाहता है तो भी उसे सहायता करने वाले के मन में सेवा भाव ही होना चाहिए।

कुछ जगह हम देखते हैं कि दिव्यांग सहानुभूति के आधार पर जीवन जीने का प्रयत्न करते हैं। उनमें उपजी इस भावना को खत्म कर वे भी सामान्य व्यक्ति जैसा जीवन जीयें, इसके लिए क्या करना होगा?

मुख्यत: इसका प्रमाण बहुत कम है। इस क्षेत्र में कौन काम कर रहा है एवं किस मनोवृत्ति से कर रहा है, यह महत्वपूर्ण है। कार्य करने वाली संस्था या व्यक्ति की मनोवृत्ति यदि व्यापार करना, लाभ कमाना है , सेवा करना नहीं है तो दिव्यांग का बर्ताव भी वैसे ही बनता है। यदि दिव्यांग यह समझता है कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए कार्य किया जा रहा है तो उसमें वैसा ही भाव निर्माण होता है। इसलिए यह सेवा करने वालों के भाव पर निर्भर है। यदि कहीं दिव्यांगों को दुर्लक्षित किया जाता है तो व सहानुभूति वाले मार्ग पर चले जाते हैं। परंतु इसका प्रमाण बहुत कम है।

हम देखते हैं कि दिव्यांगों के लिए काम करने वाली संस्थाओं में कुछ स्वार्थी तत्वों का प्रवेश हो गया है, वे अपने स्वार्थों को इन संस्थाओं के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। इनकी रोकथाम के लिए क्या कोई उपाय है?

सरकार ने अब संस्थाओं को पंजीबध्द कर उन्हें लाइसेंस देना प्रारंभ किया है। कुछ भ्रष्ट अधिकारी आंख मूंद कर पैसे लेकर अनुमति देते हैं; परंतु सभी अधिकारी ऐसे नहीं हैं। वे कानूनी कार्रवाई भी करते हैं। ऐसी बहुत सी संस्थाओं को बंद किया जा चुका है जो दुर्व्यवहार करती थीं। कुछ संस्थाएं अनाथ लड़कियों का विवाह करवा कर उन्हें ईसाई बनाने का कार्य करती हैं। हालांकि यह कम तादाद में है फिर भी इनकी ओर ध्यान देना आवश्यक है।

आपने बताया कि स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में दिव्यांगों की स्थिति में परिवर्तन आया है। परंतु वर्तमान में उनकी जो स्थिति है उसमें सुधार हेतु शासन से आपकी क्या अपेक्षा है?

सरकार ने वर्तमान कानून तो बहुत अच्छा बनाया है। उसमें दिव्यांगो के 21 प्रकार बताए गए हैं। उन्हें क्या सुविधा दी जा सकती है इसका प्रयत्न चल रहा है। परंतु वास्तव में उन्हें क्या सुविधाएं मिलनी चाहिए इस ओर ध्यान देने की अपेक्षा है। उन्हें उच्च शिक्षा हेतु हॉस्टल नहीं है, उसकी व्यवस्था होनी चाहिए। उनके विवाह के प्रयत्न करने चाहिए। उनके लिए आवश्यक साधन जैसे अच्छी क्वालिटी की व्हीलचेअर तथा सुनने की मशीन प्राप्त हो। नेत्रदान की जागृति लोगों में करने का प्रयत्न किया जाए। कॉर्निया की खराबी से यदि अंधत्व है तो कांबा (कार्निया बाधित मुक्त भारत अभियान) नामक एक बड़ा अभियान सक्षम ने प्रारंभ किया है। देशभर में इसका बहुत बड़ा काम चल रहा है। आंध्र प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगड़ एवं महाराष्ट्र में भी हम काम प्रारंभ कर रहे हैं; ताकि जिनके दृष्टि नहीं हैं उन्हें हम दृष्टि दे सके। यदि बच्चा छह वर्ष से कम उम्र का है एवं सुन नहीं सकता तो उसका इलाज संभव है। सक्षम के कार्यकर्ता डॉ. अविनाश यह कार्य कर रहे हैं। अब तक बहुत से बच्चों का आपरेशन कर उन्होंने ठीक किया है।

 

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