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निजी तौर पर तो कला के क्षेत्र में हो तो बहुत कुछ रहा है जिसके कारण भारत के चित्रकारों को निरंतर पहचान मिल रही है किन्तु आवश्यकता है इस दिशा में सरकार द्वारा भी कोई ठोस कदम उठाने की। कलाकारों को महज सम्मानित कर देने से कला का सम्यक विकास नहीं होगा।कला तभी जीवित रह सकती है, जब कलाकार जीवित रहे और अपने जीवन निर्वाह के लिए किए जाने वाले प्रयासों से परे होकर विचार करने के लिए उसका मन स्वतंत्र हो।

परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। कितने रंग बदलती है प्रकृति! मौसमों का चक्र ऐसा ही बदलाव तो है। कभी कंपकंपाती सर्दी तो कभी आंवे-सी तपती हुई गरमी। बीच में मूसलाधार बारिश, कहीं पानी को तरसती सूखी धरती तो कहीं अतिवृष्टि से बेहाल बस्तियां। कहीं इधर-उधर छितराए पत्तों का पीला पतझड़ तो कहीं महमहाते अनेक रंगों से नहाता मधुमास। यह सब परिवर्तन ही तो है। मौसमों में ही नहीं, यह बदलाव आदमी के स्वभाव में ही है- कभी ठंडा, कभी गरम। फिर भला कला इस बदलाव से कैसे बची रह सकती थी? इतिहास गवाह है कि कला में प्रत्येक युग में परिवर्तन होता रहा है।

भारत की कला-संपदा का पूरा संसार लोहा मानता रहा है। आज से नहीं, सदा से। यों कला सबसे पहले मानव के जीवन में आई। जब भाषा का आविष्कार नहीं हुआ था, आदिमानव सिर्फ चित्र बना कर ही अपनी बात दूसरे तक पहुंचाता था, इसके गवाह हैं भीमबेटका या बाघ की गुफाओं में आज भी सुरक्षित रखे हुए भित्तिचित्र। इन अनगढ़ चित्रों को गुहामानव ने संपर्क भाषा के रूप में इस्तेमाल किया।

आदिमकाल की बात छोड़ दें तो हमारी कला-संपदा युगों से संसार में प्रतिष्ठित होती रही है। विभिन्न प्रकार की मूर्तियां इसका प्रमाण है। मंदिरों के प्रकोष्ठों में ही नहीं, अन्य स्थानों पर भी इन मूर्तियों का प्रादुर्भाव रहा है। कोणार्क और खजुराहो इसके उदाहरण हैं। यहां तक कि कुषाणकालीन भग्न मूर्तियां भी मिली हैं। और फिर अजंता-एलोरा। हजारों वर्ष पुराने इन भित्तिचित्रों का रंग आज भी फीका नहीं पड़ा है, क्यों? इसके लिए विदेशी अचम्भा करते हैं और देश-विदेश के वैज्ञानिकों के लिए ये प्राकृतिक रंग आज भी समस्या बने हुए हैं। हालांकि अब कुछ भित्तिचित्र भग्न हो चुके हैं और उनके रंगों में भी बदलाव आया है जिसके कारणों का पता करने के लिए खोज जारी है।

मध्य युग में दरबारी चित्रकला का दौर चला था और राजाओं के दरबार में चित्रकार हुआ करते थे। वे मिनिएचर चित्रों में चित्र बनाया करते थे। भगवान राम और कृष्ण के जीवन के विभिन्न पक्षों के चित्रण के अलावा राजाओं के मिनिएचर चित्र आज भी उपलब्ध हैं। जयदेव के ’गीत गोविन्द’ को ऐसे ही चित्रों में अंकित किया गया है। पहाड़ी कलम, चंबा कलम और राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित शैलियों के चित्र, जैसे बूंदी आदि राजपूत कलम, पंजाब में राजा रणजीत सिह के जीवन पर या गुरु नानक और गोविन्दसिंह से सम्बंधित चित्र आज भी बेशकीमती समझे जाते हैं। मुगलों के आगमन के बाद मुग़ल शैली में बने मिनिएचर भी आज भी हैं।

इसके बाद अंग्रेजों की आमद हुई तो खानसामा, बटलर या शिकार खेलते और विद्रोह का दमन करती अंग्रेज फ़ौज के रेखाचित्र बनाए जाने लगे। यह दौर बंगाल स्कूल के आने तक चलता रहा। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और उनके भाइयों के बनाए चित्र इसके उदाहरण हैं। शांति निकेतन की स्थापना के बाद कला में नई चेतना आई और भारतीय कला-संपदा को नई पहचान मिली। यामिनी राय, नन्दलाल बसु, रामकिंकर, शैलोज मुखर्जी आदि का प्रादुर्भाव हुआ।

उधर मुंबई में भी कला विद्यालय खुला और अनेक चित्रकार नए-नए शिल्प-विधान लेकर सामने आने लगे। आज हज़ारों की संख्या में चित्रकार हैं और हर साल यह संख्या बढती ही जाती है। धुरंधर, हेब्बार, बेंद्रे, माधव सातवलेकर जैसे लोगों के अलावा आरा, सूजा, रज़ा, हुसेन आदि सामने आए और प्रोग्रेसिव ग्रुप बना। बाद में तैयब, रामकुमार, कृष्ण खन्ना, अकबर पद्मसी, लक्ष्मण श्रेष्ठ आदि भी अपनी-अपनी अलग पहचान बनाने लगे। यह क्रम अभी जारी है। अनेक नई प्रतिभाएं उभर कर आ रही हैं। रवि मांडलिक, सुजाता बजाज, जतीन दास, आदि तो अब वरिष्ठ हो गए, अब नई पीढ़ी सामने आ रही है और वे अपनी अलग पहचान बनाने में लगे हुए हैं।

इस कला-संपदा को आज दुनिया भर में पहचान मिल रही है। इसका प्रमाण है न्यू यार्क और लंदन होने वाले आक्शन हैं जहां भारतीय चित्रकारों के काम को लाखों-करोड़ों की कीमतें मिल रही हैं। अब तो ये आक्शन हांगकांग, दुबई, कोरिया और सिंगापूर में भी होने लगे हैं, भारत में क्रिस्टीज़, सौद्बीज़ आदि की देखा-देखी इन नीलामघरों के अलावा कई शुद्ध भारतीय नीलामघर बन गए हैं। कुछ ने तो आन लाइन नीलामी भी आरंभ कर ली है। सैफरनआर्ट और अस्तागुरु इनमें बहुत सफल हुए हैं।

एक बात बहुत खटकती है कि सभी नीलामघर केवल स्थापित या दिवंगत चित्रकारों के काम ही बेच पाते हैं। प्रायः नए और उभरते चित्रकारों के चित्र विशेष कीमतें नहीं ला पाते। यह रुझान कई बार नए कलाकारों को हतोत्साहित भी करता है।

यों 2004 में एक बड़ा उभार आया था। चित्रों की कीमतें आशातीत रूप से बढ़ गई थीं। आज भी बहुत से कलाकार उन बढ़ी हुई कीमतों से उबर नहीं पाए हैं। कीमतों के पीछे भागने का दौर तभी से शुरू हुआ। उसके कारण हुआ यह कि चित्रकार केवल उस प्रकार के चित्र बनाने लगे जिनकी कीमत ज्यादा मिल सके। फिर भी वे उसमें विशेष सफल नहीं हुए। जो कीमतें उन दिनों बढ़ गई थीं, वे अव्यावहारिक थीं और अमेरिका तथा यूरोप में जब आर्थिक उफान नीचे गिरा तो चित्रों की कीमतें फिर वही पुराने ढर्रे पर आ गईं। वह गिरावट बहुत से आर्टिस्ट पचा नहीं पाए। ज़्यादातर तो आज तक उसी खुशफहमी में जी रहे हैं। उन्हें लगता है कि फिर से कला की कीमतों में उछल आएगा पर यह अब संभव नहीं है। यों भी इधर कला-बाज़ार गिरावट पर है। स्थापित गैलरियों में खरीदार तो दूर, सामान्य दर्शक भी नहीं जाते, जबकि पहले यहां खासी भीड़ हुआ करती थी। इसी कारण कई आर्ट गैलरियां बंद हो गईं या सस्ती जगह पर शिफ्ट हो गईं।

चित्रों की कीमतों ने चित्रकार को निराश तो किया ही साथ ही इनके काम पर भी इसका बुरा असर पड़ा। चित्रकला को आय का साधन मानकर चित्र बनाने के कारण उनकी कला में बड़ी गिरावट आई है। एक तो इससे उनकी नए-नए प्रयोग करने की क्षमता पर भी बड़ा असर पड़ा है, दूसरे, उनका काम सतही होने लगा। कई महत्वपूर्ण चित्रकार तक कला को आय का साधन मानकर झूठे व्यामोह में पड़कर नए-नए प्रयोगों से बचने लगे हैं जो कला के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

इस बीच सोशल मीडिया अपने चरम पर है। उसका उपयोग साहित्य, फैशन, फिल्म और यहां तक कि राजनीति भी करने लगी है। फिर भला कला कैसे पीछे रह जाती! लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। दरअसल स्थापित और बड़े चित्रकार उसका उपयोग करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और नए और उभरते हुए चित्रकार ही अभी तक उसका उपयोग करते हैं। हां, कुछ गैलरियां अवश्य अपने चित्रकार के काम को सोशल मीडिया पर डालती ज़रूर हैं। ज्यादातर ने तो अपने साईट बना लिए हैं और आनेवाली प्रदर्शनियों का ब्यौरा उन पर डालती हैं। साथ ही, उन गैलरियों से चित्रकारों को प्रमोट करती हैं।

कुल मिला कर अपने देश में कला का परिदृश्य अपनी सीमाओं में रह कर औसत रूप में ठीकठाक है, पर उसके लिए और भी बहुत कुछ किया जाना चाहिए। ललित कला अकादमी तथा राष्ट्रीय गैलरी इधर कोई विशेष योजना लेकर नहीं आ रही हैं, बल्कि काफी हद तक वे निष्क्रिय ही हैं। निजी तौर पर बहुत-सा उत्साहवर्धक काम हो रहा है। केरल में निजी प्रयास से अंतरराष्ट्रीय स्तर के बनाले यानी प्रति दो वर्षों में होनेवाला आयोजन किया जा रहा है। वडोदरा और नई दिल्ली में भी इसी तरह के उपक्रम हो रहे हैं। नई दिल्ली में प्रसिद्ध कला संग्राहक नाडार और मुंबई में पीरामल म्यूजियम आफ आर्ट इसी प्रकार के आयोजन हैं। मुंबई में ही भाऊजी लाड म्यूजियम भी कला के लिए अच्छा काम कर रहे हैं जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के चित्रकार उपस्थित होते हैं। कोरिया, हांगकांग, सिंगापूर और जर्मनी में कई आयोजन ऐसे होते रहते हैं जहां भारत के कलाकारों की उल्लेखनीय भागीदारी होती है। कई युवा चित्रकारों को इस तरह के आयोजनों में विदेशी चित्रकारों के स्थान पर पुरस्कार और सम्मान मिले हैं।

इस प्रकार निजी तौर पर तो कला के क्षेत्र में हो तो बहुत कुछ रहा है जिसके कारण भारत के चित्रकारों को निरंतर पहचान मिल रही है किन्तु आवश्यकता है इस दिशा में सरकार द्वारा भी कोई ठोस कदम उठाने की। केवल ललित कला अकादमियां बनाने या पद्मश्री या पद्मभूषण से चित्रकार को सम्मानित करने भर से कला का सम्यक विकास नहीं हो पाएगा।

 

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