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राष्ट्र को अपनी पहचान कराना, अपने जीवनमूल्यों से परिचित कराना और अपने वैश्विक लक्ष्य की पहचान कराना, यही प्रमुख काम मोदी सरकार के समक्ष है। राजनीतिक क्षेत्र में नरेन्द्र मोदी याने भाजपा याने भाजपा की विचारधारा यही काम बखूबी कर रही है। …नवयुग का उषःकाल हो रहा है।
नरेन्द्र मोदीजी को दिनांक २६ मई २०१४ को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई। इस घटना को २६ मई २०१६ को दो वर्ष पूर्ण हो गए। समय एवं समुद्र की लहरें किसी के लिए रुकती नहीं हैं। प्रधान मंत्री पद के कार्यकाल को दो वर्ष पूर्ण होने पर स्वाभाविकतया इन दो वर्षों में नरेंद्र मोदी ने या भाजपा सरकार ने क्या प्राप्त किया इसकी चर्चा शुरू हुई। इस चर्चा में जाने के पूर्व प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की जीत पर लंदन के ‘गार्डीयन’ अरतबार ने अपने संपादकीय में जो लिखा वह महत्वपूर्ण है और वहीं से सच्चे अर्थों में नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल की चर्चा प्रारंभ होती है। गार्डीयन कहता है,‘‘आज १८ मई २०१४ का दिन इतिहास में अंग्रेजों ने हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया है, इन शब्दों में लिखा जाएगा। जिस पद्धति से अंग्रेजों ने इस भूभाग पर राज किया, करीब-करीब वैसा ही राज (स्वातंत्र्योत्तर) चलता रहा। इस कालखंड का नरेन्द्र मोदी की जीत ने अंत किया है। कांग्रेस के शासन में भारत याने अंग्रेजी राज का अलग-अलग तरीके से विस्तार होता रहा।’’ गार्डीयन को यह बताना है कि, मई २०१४ को भारत में अंग्रेजी राज का खात्मा हुआ याने अंग्रेजी विचारों के अनुसार, अंग्रेजी आचारों के अनुसार, अंग्रेजी मूल्यानुसार चलाने वाले राज की समाप्ति और अब भारतीय मूल्यानुसार, भारतीय विचारोंनुसार, भारतीय आदर्श के अनुरूप राज करने का कालखंड आया है। नरेंद्र मोदी के शासन का मूल्यांकन इसी आधार पर हमें करना चाहिए।
कांग्रेस का राज समाप्त होकर भाजपा का राज आना यह केवल सत्ता-बदलाव नहीं है। ऐसे सत्ता-बदलाव इसके पूर्व दो-तीन बार हुए हैं। इंदिरा गांधी का शासन समाप्त होकर मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने। सत्ताधारी दल था जनता पार्टी, परंतु उस समय कोई भी मूल्यात्मक परिवर्तन नहीं हुआ था। दूसरा सत्ता-बदलाव था राजीव गांधी के बाद श्री वी.पी.सिंह का प्रधान मंत्री होना। उस समय दल का नाम जनता दल था। उस समय भी किसी भी प्रकार का वैचारिक या मूल्यात्मक परिवर्तन नहीं हुआ था। उसके बाद देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, चंद्रशेखर एवं नरसिंह राव बारी-बारी से प्रधान मंत्री हुए। पहले तीनों के दल अलग होते हुए भी विचारधारा कांग्रेस की ही थी। नरसिंह राव गांधी खानदान के बाहर के प्रधान मंत्री थे, परंतु उनकी विचारधारा भी कांग्रेस की ही थी।
एक बीच का कालखंड अटल बिहारी वाजपेयी का था, परंतु उन्हें पूर्ण बहुमत न होने के कारण उनकी सरकार गठबंधन की सरकार थी। इसके कारण भाजपा की विचारधारा के अनुसार कार्य में उन्हें कई अड़चनों का सामना करना पड़ा। नरेन्द्र मोदी को स्पष्ट बहुमत है। केंद्र में केवल भाजपा की सरकार है। यह सत्ता-बदलाव केवल मनमोहन सिंह गए एवं नरेंद्र मोदी आए इतना मर्यादित न होकर कांगे्रस की विचारधारा गई एवं भाजपा की विचारधारा आई ऐसा बाजू पलटने वाला बदलाव है।
यह परिवर्तन समझने के पहले कांग्रेस की विचारधारा याने क्या? यह समझना होगा। स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस ‘‘राष्ट्रीय कांग्रेस’’ थी। देश के अलग-अलग विचार प्रवाह कांग्रेस में थे। सबको साथ लेकर चलने की हिन्दू मानसिकता का कांग्रेस प्रतिनिधित्व करती थी। स्वतंत्रता के बाद कांगे्रस धीरे-धीरे गांधी घराने की कांग्रेस हो गई और यही विचारधारा देश की मुख्य विचारधारा बन गई। इस विचारधारा की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-१) समाजवादी समाजरचना २) समाजवाद के लिए पंचवर्षीय योजना ३) निजी उद्योग-धंधों पर उसके प्रतिबंध ४) नौकरशाही पर निर्भरता ५) अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में गुटनिरपेक्षता; परंतु रूस से दोस्ती एवं अमेरिका से दुश्मनी ६) हिन्दू-हिन्दुत्व का कड़ा विरोध ७) मुस्लिम तुष्टीकरण ८) हिन्दू समाज का जातिगत विभाजन पक्का कर उसके आधार पर राजनीति ९) भारतीय मुसलमानों की धारणानुसार पाकिस्तान से संबंध रखने की नीति १०) हिंन्दू जीवनमूल्य, हिन्दू श्रद्धा, हिन्दुओं के पवित्र स्थानों एवं विदेशों में बसे हिन्दुओं के प्रति अनास्था की नीति ११) सेक्यूलरिज्म को प्रधानता; परंतु उसके अर्थ के विषय में संदिग्धता १२) व्यवहार में सेक्युलरिज्म याने हिन्दुओं को हानि पहुंचाना और मुसलमान, ईसाइयों को खैरात बांटना। इस सबको ‘‘नेहरूवियन मॉडल’’ ऐसा कहा गया। इसमें बुद्धिवादी, उदारमतवादी, मानवतावादी, अंतरराष्ट्रीय भाईचारा, लोकतांत्रिक मूल्य जैसे भारी भरकम शब्द जोड़े गए।
करीब-करीब साठ वर्ष इस विचारधारा ने देश पर राज किया। बीस वर्ष की एक पीढ़ी यदि माने तो तीन पीढ़ियों का यह राज हुआ। इन तीन पीढ़ियों में उपरोक्त विचारधारा के अनुरूप अलग-अलग संस्थाएं निर्माण हुईं, बहुत बड़े साहित्य का निर्माण हुआ। इस विचारधारा से अपने-आप को जोड़ने वालों को अनेक पद मिले; विदेश यात्रा के मौके मिले; पैसा, प्रतिष्ठा, सत्ता सबकुछ मिला। ऐसा सब जिनको मिला उन सुविधाभोगी गुटों का एक वर्ग तैयार हो गया। कोई भी व्यवस्था यदि एक बार स्थिर हो गई तो उस व्यवस्था में सुविधाभोगियों का एक वर्ग तैयार हो जाता है। इस व्यवस्था पर यदि किसी ने चोट पहुंचाने का प्रयत्न किया तो वह वर्ग अस्वस्थ हो जाता है; क्योंकि उस वर्ग को इसी व्यवस्था में सुरक्षितता होती है। फिर वह वर्ग अपनी विचारधारा के प्रति प्रामाणिक रह कर उदारमतवाद, लोकतंत्र, मानवता इ. को किस प्रकार खतरा निर्माण हो रहा है इस पर लिखने लगता है या लिखवाने लगता है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के दो वर्ष के कालखंड पर इसी वर्ग के लोगों के लेख हैं। मणिशंकर अय्यर महाराष्ट्र के सुहास पलशीकर, बाद में आशुतोष (जो आप पार्टी हैं) इन तीनों के लेख पढ़ने मिले। तीनों ने एकसाथ बैठ कर ये लेख लिखे हैं ऐसा लगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं है। परंतु नेहरूवियन विचारों में पले-बढ़े लेखक मोदी का विचार क्यों करते हैं एवं कैसा करते हैं यह इन लेखों से समझ में आता है।
तीनों ने ही कांग्रेसमुक्त भारत यह विषय लिया है। तीनों ने ही हिन्दुत्व की विचारधारा यह विषय लिया है। और तीनों ने ही पानसरे, कलबुर्गी और अखलाख इन तीनों की हत्या का विषय लिया है। गोहत्या एवं गोमांस के विषय हैं ही; साथ में असहिष्णुता, शाहरुख खान, आमिर खान, इनके वक्तयों के विषय हैं। गत दो वर्षों से जिन-जिन विषयों पर मोदी सरकार की टीका की जा रही है उसी आधार पर मोदी सरकार की समीक्षा अनेक लोगों ने की है। इन सब को मोदी जी की अर्थात भारतीय जनता पार्टी के विचारों की जीत पचाना बहुत कठिन होता जा रहा है।
नरेन्द्र मोदी की जीत से भारतीय राजनीति की विषयसूची में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। कांग्रेस के ६० वर्षों के कार्यकाल में गलती से भी हिंदू आस्थाओं का विषय नहीं आया। मोदी प्रधान मंत्री बनने के बाद वाराणसी गए। उन्होंने गंगाजी का पूजन किया। राष्ट्रसंघ ने २१ जून यह योग दिवस निश्चित किया। नरेन्द्र मोदी ने संपूर्ण भारत भर यह दिवस कुछ इस प्रकार मनाया कि संसार देखते ही रह गया। नेहरूवियन विचारों के लोगों को योग दिवस पचाना कठिन हो रहा है। उन्हें उसमें धर्म दिखता है। हिन्दुत्व दिखता है, मुस्लिम विरोध दिखता है, परंतु संसार को उसमें केवल शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रखने का बिनाखर्च का उपाय दिखता है।
नेहरू विचारधारा ने केवल गरीबी हटाओ की घोषणाएं कीं। संविधान की उद्देश्य पत्रिका में समाजवाद यह शब्द न होते हुए भी १९७६ में संविधान संशोधन कर यह शब्द वहां घुसाया गया। नेहरू का समाजवाद पैदा हुआ, नौकरशाही, भ्रष्टाचार एवं गरीबी का समान वितरण हुआ, फिर भी गरीबी कम नहीं हुई; परंतु गरीब दूर फेंका गया। उसे फिर से मुख्य धारा में लाने के लिए गत दो वर्षों में नरेन्द्र मोदी सरकार ने जनधन योजना, एलपीजी सब्सिडी में सुधार, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, किसान विकास पत्र, सुकन्या समृद्धि योजना, अटल पेंशन योजना, जननी सुरक्षा योजना, सुरक्षा बीमा योजना, सुवर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, डिजिटल इंडिया, इस प्रकार एक से एक योजनाएं बना कर ‘‘हमारी सरकार गरीबों के लिए समर्पित है’’ यह वाक्य नरेन्द्र मोदी जी ने प्रत्यक्ष व्यवहार में लाकर दिखाया है। इस अंक के अन्य लेखों में इन विविध योजनाओं की जानकारी होने के कारण यहां उनका केवल नामोल्लेख किया है। प. दीनदयाल उपाध्याय ने मंत्र दिया है कि हमें आखिरी पंक्ति के आखिरी व्यक्ति का विचार करना है। महात्मा गांधीजी ने भी यही बताया। ६० वर्षों में पहली बार गरीब को केंद्र स्थान में रख कर शासन की विविध योजनाएं बनाई जा रही हैं और उनका काम भी हो रहा है, उन्हें लागू किया जा रहा है। यह पूरी तरह नई ‘‘सोच’’ होने के कारण मार्ग भी नए हैं।
पूर्ववर्ती सरकारों के समय में अनुदान की खैरात बांटी जाती थी। उसे खाने के लिए जो उसमें फिट नहीं होते ऐसे लाखों लोग भी उसका फायदा उठाते थे। इस कारण जिनके लिए ये योजनाएं थीं उनकी थाली में बहुत कुछ नहीं आता था। फिर वह सस्ते अनाज की योजना हो, मनरेगा की योजना हो या गैस सब्सिडी की योजना हो। इन योजनाओं में जो रिसाव लगा था उसे मोदी सरकार ने बंद कर दिया। एलपीजी गैस का गलत फायदा लेने वाले साढ़े तीन करोड़ लोगों की पहचान की गई एवं उनकी सब्सिडी बंद की गई। इस कारण १४१२ करोड़ रुपयों की बचत की गई। दूसरी भाषा में यह लूट रोकी गई एवं तीसरी भाषा में गरीबों का हक उन्हें दिया गया। मनरेगा में भी फोकट खाने वाले लोगों की सब्सिडी बंद की गई। उसमें ३ हजार करोड़ की बचत की गई। एक करोड़ छह लाख गलत राशन कार्डों का पता लगा कर उन्हें सस्ते अनाज की योजना से दूर कर १० हजार करोड़ रुपये बचाए ्रगए। गरीबी रेखा के नीचे के ५ करोड़ लोगों को आगामी तीन वर्षों में अनुदानित सिलेंडर मिलने वाला है। इस साल का १.५ करोड़ लोगों को मिला है। इस प्रकार विविध योजनाओं के आंकड़े दिए जा सकते हैं। इस कारण इस देश के गरीबों को उसका सही अर्थों में लाभ मिल रहा है एवं आगे भी मिलने वाला है। यह परिवर्तन विचारों में हुए बदलाव का परिणाम है यह ध्यान में रखना चाहिए।
प्रधान मंत्री पद की शपथ लेते समय नरेन्द्र मोदी ने सारे पड़ोसी देशों के प्रमुखों को शपथविधि के कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान इ. देशों के प्रतिनिधि समारोह में उपस्थित थे। अपने पड़ोसी देशों की ओर पहली बार ध्यान दिया गया। भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में ‘‘हमारे पड़ोसी देशों की ओर पहले ध्यान दिया जाएगा’’ यह कहा था। इसका आरंभ शपथविधि कार्यक्रम से हुआ। प्रधान मंत्री मोदी ने पहला विदेश दौरा भूटान का किया। इसके बाद नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश इन देशों का दौरा किया। बांग्लादेश से सीमा समझौता किया। विदेश नीति में यह पहला अत्यंत महत्व का समझौता माना जाता है। इसके बाद चीन, अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, ब्राजील इन देशों को प्रधान मंत्री ने भेंट दी। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा था,‘‘भारत को विश्व के देशों के समूह में एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसके हक का स्थान मिलना चाहिए।’’ इस दृष्टि से भारत सरकार की विदेश नीति बहुत तेजी से कार्य कर रही है।
विदेश नीति के संबंध में ऐसा कहा जाता है कि देश की वित्तीय नीति यदि खराब हो तो देश दिवालिया होने की कगार पर पहुंचता है और देश की विदेश नीति यदि खराब हो तो देश संकट में फंस सकता है। नेहरू की विदेश नीति पर टिप्पणी करते हुए सन १९५१ में बाबासाहब आंबेडकर ने कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सम्पूर्ण विश्व हमारा मित्र होता है, परंतु हमारी विदेश नीति के कारण तीन वर्षों में हमारे पड़ोसी ही हमारे शत्रु हो गए। पं. नेहरू ने चीन को विश्व की मान्यता दिलाने एवं राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में उसे जगह दिलाने में भरपूर प्रयत्न किए। चीन ने हमारे इस उपकार के बदले हम पर १९६२ में आक्रमण किया। विदेश नीति की इससे अधिक भीषण शोकांतिका और कोई नहीं हो सकती। नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति विश्व में भीख का कटोरा लेकर घूमने की नहीं है। जिन पर विश्वास न किया जा सके ऐसों से दोस्ती करने की भी नहीं है। हाल ही में उनका अमेरिका के दोनों सदनों के सदस्यों के सम्मुख भाषण हुआ। इस भाषण में उन्होंने स्वतंत्र, सार्वभौम, विश्व में महत्व की भूमिका के इच्छुक भारत का दर्शन कराया। उन्होंने पार्टनरशिप की बात की। अमेरिका की विदेश नीति अन्य देशों को अपना सहयोगी बनाने की होती है। सहयोगी देशों की भूमिका अमेरिका की हां में हां मिलाने वाली होती है। भारत इस भूमिका में नहीं रहना चाहता, यह नरेन्द्र मोदी ने साफ शब्दों में बताया। समानता एवं बराबरी के आधार पर भारत अमेरिका से सहयोग कर सकता है। अमेरिका से दोस्ती याने दुर्बल की बलवान से दोस्ती ऐसा नहीं है। अमेरिका यदि बलवान है तो हम भी अपने क्षेत्र में बलवान हैं ऐसा आत्मविश्वास इस भाषण से प्रकट हुआ।
विश्व आज अलग-अलग समस्याओं से ग्रस्त है। भूख, गरीबी, पानी, पर्यावरण, आतंकवाद ऐसी अनेक समस्याएं हैं। ये समस्याएं देखने पर ऐसा लगता है कि यह अलग- अलग देशों की भी समस्याएं हैं। परंतु वैश्विक विचार करें तो यह सारे विश्व की समस्या है। विश्व आज एक गांव है। विश्व का कोई भाग दूसरे भागों से अलग एवं विभक्त नहीं रह सकता। परस्पर संलग्नता एवं एक दूसरे पर निर्भरता यह आज के युग का मंत्र बन चुका है। इस कारण प्रत्येक समस्या का वैश्विक रूप है। पर्यावरण की समस्या यह विश्व की समस्या है, यह किसी एक देश की समस्या नहीं है। वैसे ही आतंकवाद की समस्या कुछ देशों तक सीमित नहीं है। वह भी वैश्विक हो गई है। अमेरिका एवं उसके मित्र राष्ट्र अभी तक यह समस्या वैश्विक है यह मानने को राजी नहीं थे। परंतु अब वह परिस्थिति नहीं रही। इन समस्याओं से हमें परस्पर पूरक बन कर लड़ना होगा। यह मोदी जी ने बताया। याने हमारे साथ पार्टनरशिप किए बिना इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता इस ओर उन्होंने इशारा किया।
भारत की सुरक्षा का विचार करते समय चीन-भारत संबंध और चीन- पाकिस्तान संबंध बहुत महत्व के हैं। हमारा पड़ोसी देश अफगानिस्तान हमारी सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्व का है। इतिहास में हम पर जितने भी आक्रमण हुए वह इसी मार्ग से हुए। अफगानिस्तान स्थिर रहे, वहां कट्टरपंथियों का राज न हो और पाकिस्तान तथा चीन को अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करने का अवसर न मिले यह हमारी विदेश नीति का सूत्र है। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत ने बहुत बड़ी मात्रा में पैसा लगाया है। इस संदर्भ में ईरान में चाबहार बंदरगाह के निर्माण का जो समझौता हुआ है उसका बहुत महत्व है। इस बंदरगाह के कारण अफगानिस्तान और ईरान से एवं आगे मध्य एशिया से सीधा व्यापार हो सकता है। नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति की यह बहुत बड़ी सफलता माननी चाहिए। भाजपा सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान युद्ध प्रारंभ कर देगा ऐसा वामपंथियों को लगता था। पर वैसा नहीं हुआ, उलटे नवाज शरीफ के साथ अच्छा संवाद साधने में मोदी सफल रहे। रूस से आते समय अचानक नवाज शरीफ से मुलाकात की। इस मुलाकात की खूब चर्चा हुई। इस मुलाकात का बहुत महत्व है। पाकिस्तान की सत्ता तीन के हाथ में रहती है। सेना, चुनी हुई सरकार एवं आतंकवादी। इसमें से चुनी गई सरकार से सरकारी स्तर पर बात होती है। सत्ता के अन्य दो भागीदार गैरकानूनी होने के कारण उनसे बात नहीं हो सकती। भारत में जो आतंकवादी हमले होते हैं वे सेना एवं आतंकवादी संगठन की मिलीभगत से होते हैं। यदि इन दोनों का नकाब उतारना है तो चुनी गई सरकार को महत्व देने की आवश्यकता है। मोदी जी ने यह काम किया है।
कल-परसों तक अर्थात कांग्रेस के शासनकाल में विदेश में रहने वाले हिन्दुओं का कोई माई-बाप नहीं था। आज वह स्थिति नहीं रही। मोदी जिस भी देश में जाते हैं उन देशों के भारतीय, जिसमें बहुसंख्य हिन्दू ही होते हैं उनका प्रचंड स्वागत करते हैं। भारत अपना देश है, भारत का प्रधान मंत्री अपना प्रधान मंत्री है, अपने हितों की चिंता करने वाला है, यह संदेश उन तक पहुंच गया है। यमन एवं इराक में फंसे भारतीयों को वहां से निकलने का काम भारतीय वायुसेना एवं नौसेना ने किया। अबू धाबी में हिंदू मंदिर के लिए जमीन प्राप्त करने का काम भी अपनी सरकार ने किया। आज जिस-जिस देश में हिन्दू हैं उन-उन देशों के हिन्दुओं को यह लगने लगा है कि हमारी ओर ध्यान देने वाला प्रधान मंत्री हैै। स्वतंत्रता के बाद यह पहली बार हो रहा है। सोच याने विचारों में परिवर्तन के बाद क्या होता है यह इसका दृश्य रूप दर्शन यह है।
दो वर्ष के कालखंड का विचार करते समय अपरिहार्य रूप से हिन्दुत्व का विचार करना पड़ता है। कांग्रेस विचारधारा ने गत ६० वर्षों में हिन्दुत्व के विरोध में बहुत जहरीला प्रचार किया है। हिन्दुत्व धार्मिक है, अल्पसंख्यक विरोधी है, देश की अनेकता के लिए घातक है, लोकतंत्र विरोधी है, बहुसंख्यवाद का समर्थक है, दलित विरोधी है, आधुनिकता विरोधी है इ.। हिन्दू मुद्दों को लेकर भाजपाविरोधी सतत लेखन करते रहते हैं। इन लोगों ने हिन्दुत्व की विषयसूची निश्चित की है। ‘‘भाजपा को भारत हिंदू राष्ट्र बनाना है, मुसलमानों को दूसरी श्रेणी की नागरिकता देनी है, दलितों को पुन: अस्पृश्यता की रूढ़ी में जकड़ना है, स्त्रियों का स्वातंत्र्य छीन लेना है।’’ यह विषयसूची वामपंथी एवं सेक्यूलर विचारकों ने बनाई है। परंतु हिन्दुव याने विकास, आधुनिकता, सामाजिक समरसता, पर्यावरण रक्षण, स्त्री समानता, गरीबी उन्मूलन, विश्व शांति, मानव सम्मान इस बारे में भूल कर भी ये लोग नहीं बोलते हैं। नरेन्द्र मोदी ने ये सारे विषय अपनी नीतियों एवं कार्यक्रम में शामिल किए हैं।
केवल आधुनिकता का विचार करें तो आधुनिक जानकारी विषयक तंत्रज्ञान नैनो-तंत्रज्ञान, डिजिटल तंत्रज्ञान इन सब का उपयोग नरेन्द्र मोदी अपने कामकाज में कर रहे हैं। भारत को विश्व में यदि सिर ऊंचा करके खड़े रहना है तो अपनी आर्थिक प्रगति तीव्र गति से होनी चाहिए। आधुनिक तंत्रज्ञान अलग-अलग प्रकार की कुशलता मांगता है, इसीलिए कौशल विकास पर नरेन्द्र मोदी ने बहुत जोर दिया है। उनका स्वच्छता अभियान व्यक्ति और देश को निरोगी बनाने के लिए तो है ही परंतु उसी समय वह पूर्ण आधुनिक है। संचार के साधनों के विकास हेतु शासन ने जो योजनाएं घोषित की हैं एवं जो विनियोग किया है उससे देश तेजी से आधुनिकता की दिशा में जाएगा। स्मार्ट सिटी की संकल्पना इसी में समाहित है। दलितों के उत्थान हेतु विविध प्रकार की योजनाएं कार्यरत हैं। यह सब याने आधुनिक हिंदुत्व है। मुसलमान इस देश के नागरिक हैं एवं उनके साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता। उनका प्रश्न उनके इस आधुनिकता के प्रवाह में शामिल होने का है। आज तीन बार तलाक की गूंज है और इसीलिए समान नागरिक संहिता का विषय इसमें आया है। देश ने आधुनिक बनने का लक्ष्य रखा है, मुसलमानों को क्या करना है यह उनका प्रश्न है।
गार्डीयन ने ‘‘अंग्रेजी राज समाप्त हुआ और भारतीयों का राज आया’’ ऐसा जो कहा है उसका संक्षेप में अर्थ यह है। आज देश मोदी के मार्ग से जा रहा है। यहां व्यक्ति का उल्लेख किया है उसे व्यक्तिवाचक न लेकर विचारवाचक लेना चाहिए। मोदी यह व्यक्ति नहीं, मोदी यह विचार है। यह विचार भाजपा का है। यह विचार श्यामाप्रसाद मुखर्जी एवं पंडित दीनदयाल जी का है। इस विचार के मूल में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ है। यह सनातन राष्ट्र है और अनादिकाल से हिंदू राष्ट्र है। उसे न नए से बनाना है न नया निर्माण करना है। राष्ट्र को अपनी पहचान कराना, अपने जीवनमूल्यों से परिचित कराना और अपने वैश्विक लक्ष्य की पहचान कराना, यही प्रमुख काम है। राजनीतिक क्षेत्र में नरेन्द्र मोदी याने भाजपा याने भाजपा की विचारधारा यह काम कर रही है और उसमें वर्तमान पीढ़ी एवं उभरती पीढ़ी बड़े उत्साह से सहभागी हो रही है। नवयुग का उषःकाल हो रहा है।

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