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भारतीय सौंदर्य किसी प्रदर्शन का मोहताज नहीं है यह हमारे भीतर से ही उत्पन्न होता है, हमारी संस्कृति योग, ध्यान और अध्यात्म की है जिसका प्रभाव एक सच्चे भारतीय के चेहरे पर स्पष्ट झलकता है।

विश्व के लगभग सभी देश भारतीय सौंदर्य के आकर्षण में बंधे हैं ,यहां के जर्रे -जर्रे में खूबसूरती बिखरी पड़ी है। खासकर यहां के रंगबिरंगे परिधान सभी को आकर्षित करते हैं। पंजाब का सलवार कमीज, सिखों की पगड़ी, राजस्थान का घाघरा – चोली, पुरुषों का साफा, गुजरात का अंगरखा, चनिया चोली, महाराष्ट्र की नववारी साड़ी, असम का पारंपरिक वस्त्र मेखेल सदोर, बंगाल का कुर्ता-पायजामा और खास तरीके से महिलाओं द्वारा पहनी साड़ी, दक्षिण भारत का मुन्दुम नेरियथूम व लुंगी, उत्तर भारत का अनारकली और पुरुषों की शेरवानी भारतीय सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये सारे वस्त्र आज भी प्रासंगिक हैं और आधुनिक भारतीय फैशन में कई डिजाइनरों द्वारा उनको कभी मूल रूप में या कभी कुछ बदलाव के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। ये वस्त्र भारतीय सौंदर्य के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी प्रदर्शित करते हैं। भारतीय संस्कृति जीवंत संस्कृति है जो सभी देशवासियों में उत्साह, लगन और प्रेम उत्पन्न करती है। हम भारतीय उत्सव परम्परा से जुड़े हुए हैं; अत: पाश्चात्य वेशभूषा को कितना भी अपना लें परंतु भारतीय पहनावा और शृंगार कभी छोड़ नहीं सकते। चित्रकारों ने भारतीय सौंदर्य को अपने चित्रों में बखूबी उकेरा है और कवियों ने तो इस भारतीय शृंगार पर कविताएं लिख डालीं । कवि केशवदास, भूषण, बिहारी, रसखान आदि के काव्य में इस भारतीय सौंदर्य के दर्शन होते हैं। रीतिकालीन कवि बिहारी भारतीय नारी के सौंदर्य का बखान इन शब्दों में करते हैं-

चित्रोपमता चमचमात चंचल नयन

बिच घूँघट पट झीन,

मानहु सुरसरिता विमल

छल उछरत जुगु मीन

नाद -सौन्दर्य रस शृंगार।

कवि भूषण कहते हैं –

अंगशुची, मंजन, वसन

मांग ,महावर,केश

तिलक भाल, तिल चिबुक में

भूषण मेहंदी वेश

मिस्सी, काजल, अरगजा

वीरी और सुगंध

इन रचनाओं से ज्ञात होता है कि भारतीय स्त्री अपने सौंदर्य-शृंगार के प्रति प्राचीन काल से ही सचेत थी। प्राचीन संस्कृत साहित्य में सोलह शृंगार की कल्पना की गई है।

भारतीय वेशभूषा और शृंगार का अपना इतिहास है। भारत की जलवायु के अनुसार कपास से निर्मित कपड़े आदिकाल से पसंद किए जाते हैं। सिंधु सभ्यता में सूती और ऊनी वस्त्र पहने जाते थे। प्राचीन वस्त्र परम्परा, वस्त्रकला भारतीयों के लिए प्रारम्भ से ही रूचि का विषय रहा है।

इन वस्त्रों के नमूने मौर्य कालीन, गुप्त कालीन, मुग़ल कालीन सभ्यता के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं। मौर्य और गुप्त काल में बिना सिले कपड़े के तीन टुकड़ों को विशेष तरीके से शरीर पर लपेटा जाता था। मुग़ल काल में भारी वस्त्रों का प्रयोग होता था जिस पर जरदोजी काम हुआ करता था। पाणिनि के पहले यजुर्वेद में कौशं वास: परिधापयति का उल्लेख है। हिन्दू धर्म विधि में कौषेय परिधानों को शुभ माना गया है। यज्ञ में सहभागी होते समय स्त्रियां ‘चंदातक’ और पुरूष ‘तर्प्य’ इन रेशमी वस्त्रों को धारण करते थे। रामायण और महाभारत में भी कौषेय वस्त्रों का उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में जनक राजा अपनी पुत्री को कौषेय, क्षौमा और सूती वस्त्र दहेज़ में देते हैं।

सर्वप्रथम रेशम की उत्पत्ति चीन में हुई थी। इस सम्बन्ध में एक कथा मशहूर है। एक चीनी रानी जिनका नाम झी लिंग शी था शहतूत के पेड़ के नीचे बैठ कर चाय पी रही थी तभी उनकी गर्म चाय के कप में एक कोकून (कौषेय) गिर पड़ा क्योंकि चाय गर्म थी शीघ्र ही कोकून जल्दी ही पिघल कर मुलायम धागों में विभाजित हो गया तब रानी के द्वारा सभी इस धागे से परिचित हुए और रेशम उद्योग चीन में प्रारंभ हो गया। उस समय भारत में रेशम चीन द्वारा सिल्क रोड से निर्यात किया जाता था जिसे चीनांशुक कहा जाता था। बौद्धकथा दिव्यावदान तथा कालिदास के कुमारसंभव में चीनांशुक का उल्लेख है। चीन का  रेशम पर से एकाधिकार उस समय समाप्त हो गया जब एक अन्य चीनी राजकुमारी का विवाह खोतान के राजा से हुआ, राजकुमारी अपने सिर की पोशाक में कोकून छिपा कर ले आई थीं। इस तरह से रेशम ईरान और फिर हिंदुस्तान में आया।

कहते हैं, सृष्टि का चक्र गोल घूमता है जो पुराना है वह वापस लौट कर आता है। आज फैशन इंडस्ट्री में पारंपरिक वस्त्रों की धूम मची हुई है। लिनेन, खादी, मलमल, पश्मीना इत्यादि कपड़ों द्वारा सुन्दर डिजाइन की पोशाक बनाई जाती है। बंगाल की जम्दानी, कर्नाटक की इल्कल, मध्यप्रदेश की चंदेरी, आंध्र प्रदेश की पोचमपल्ली, नारायणपेठ, महाराष्ट्र की पैठनी, बनारस की बनारसी, तन्छुई, छत्तीसगढ़ का कोसा सिल्क आदि फेब्रिक से निर्मित परिधान आज भी पसंद किए जा रहे हैं।

फैशन के क्षेत्र में बाटिक, टाई एंड डाई, ब्लाक प्रिंट आदि का प्रयोग किया जा रहा है। कलमकारी, फुलकारी को पसंद किया जा रहा है। फैब इंडिया, कॉटन कॉटेज, क्रियेटिव हैंडी क्राफ्ट, बीबा, कोरा जैसी दुकानें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी बिक्री कर रही हैं। पश्चिम के प्रभाव के साथ जो इंडो वेस्टर्न की कल्पना फैशन जगत में आई है उसे भी सराहा गया है। इसमें भारतीय वस्त्रों को विदेशी डिजाइन के साथ जोड़ा जाता है जो आज के युवाओं में काफी प्रचलित है। जैकेट, शरारा, गरारा, लहंगा, चूड़ीदार, अनारकली, जोधपुरी, अचकन, बंदगला, पायजामा, धोती इनके मूल रूप में या कुछ परिवर्तन के साथ फैशन जगत द्वारा फैशनेबल सुन्दर परिधान बनाए जा रहे हैं। इधर फ्लोरल प्रिंट और पेस्टल कलर में पारम्परिक पोशाकों में कुछ प्रयोग हो रहे हैं जो सराहे भी जा रहे हैं। इन सब डिजाइनों ने साबित कर दिया है कि भारतीय वस्त्रों की पारंपरिक शैली का अपना अलग ही महत्व है।

साज-शृंगार की जब बात आती है तब हम पारंपरिक गहनों को कैसे भूल सकते हैं? मोती, माणिक, कुंदन, पोल्की, सिल्वर, ऑक्सीडाइज सिल्वर, हीरा एवं स्टोन ज्वेलरी विशेषकर महिलाओं के सौन्दर्य में चार चांद लगा देती है। झुमके, नथनी, हार, मांगटीका, बाजूबंद, कंगन, अंगूठी, करधनी पायल, बिछुए कई आधुनिक डिजाइनों में उपलब्ध हैं। कुछ युवा लडकियां एक ही पांव में पायल पहनना पसंद करती हैं जो आकर्षित भी करती है। गांव में पहने जाने वाले चांदी के आभूषण अपने नए रूप के साथ आज भी भारतीय सौंदर्य को द्विगुणित कर रहे हैं। पुरुषों के लिए खास अवसरों में पहनने के लिए मोतियों की माला, ब्रेसलेट उपलब्ध हैं। दैनिक जीवन में वे सोने की चेन, हीरे या सोने की अंगूठी पसंद करते हैं। एक और धातु प्लेटिनम में भी नए फैशन के जेवर गढ़े जा रहे हैं। विवाह अवसरों के लिए जड़ाऊ गहनों का प्रयोग दुल्हन और उनकी सखी सहेलियों में अद्भुत आकर्षण निर्माण करता है। लाल या गुलाबी जोड़े में सजी दुल्हन और शेरवानी में ठाठ से आता हुआ दूल्हा सभी का मन मोह लेता है।

फैशन की बात अधूरी ही रहेगी जब तक हम केश विन्यास की बात नहीं करेंगे। भारत में हड़प्पा सभ्यता से ही केश सज्जा में कलात्मकता और कल्पनाशीलता दिखाई देती थी। प्राचीन काल में उत्तर भारत में सारनाथ, मथुरा में अलकावली, मयूरपंखी आदि प्रकार के केशविन्यास प्रचलित थे। अलकावली में बालों को घुंघराला करके गर्दन और माथे पर छोड़ देते थे। मयूरपंखी में बालों को सिर के पीछे केवड़े आदि के पत्तों से सजाकर स्त्रियां इस प्रकार से बांधती थीं कि मयूरपंख का आभास होता था। बालों में फीता, गोटा, परांधा बांधा जाता था, आभूषण और मोती की लड़ियों से सजाने का रिवाज था जो आज भी प्रयोग में लाया जाता है । दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में बालों को गजरे और फूलों से सजाया जाता है। सिंगारपट्टी और झूमर को बालों के शृंगार के लिए प्रयोग में लाया जाता है। मांग भी विभिन्न तरीके से निकालकर केश विन्यास को स्टाइलिश बना सकते हैं। जूडा, सागर चोटी, बालों के कर्ल आदि भारतीय पद्धति के कुछ मूल और कुछ परिवर्तित रूपों के साथ ललनाओं का सौंदर्य बढ़ा रहे हैं।

तीज-त्यौहारों में पारंपरिक वस्त्रों को ही पसंद किया जाता है। दुर्गापूजा, दशहरा, गणेश उत्सव, दीवाली, गणगौर, करवाँ चौथ, ईद आदि त्यौहारों में पारंपरिक वस्त्र ही पहने जाते हैं इसलिए उनकी हमेशा मांग रहती हैं। फैशन सिर्फ शरीर का सौंदर्य नहीं बढ़ाता वह हमारे व्यक्तित्व में भी कमाल का परिवर्तन लाता है। फैशन वही है जिसमें आप अपने आप को सही ढंग से प्रस्तुत कर सकें, जो बनावटी न लगे और आपके भीतर आत्मविश्वास जगा सके, आपके रूप को प्रभावशाली बना सके। आपकी सुरुचि और शिष्टता निश्चित ही समाज में आपका स्थान बनाएगी और आपकी संस्कृति के परिष्कृत रूप को प्रस्तुत करेगी।

भारतीय सौंदर्य किसी प्रदर्शन का मोहताज नहीं है यह हमारे भीतर से ही उत्पन्न होता है, हमारी संस्कृति योग, ध्यान और अध्यात्म की है जिसका प्रभाव एक सच्चे भारतीय के चेहरे पर स्पष्ट झलकता है। प्रकृति के हर रूप चाहे वह वसंत हो या पतझर अपने आप में सुंदर होते हैं। प्रकृति हो या मनुष्य यह सभी ईश्वर द्वारा बनाई हुई चित्रकारियां हैं। तभी तो हिंदी साहित्य के छायावादी कवि सुमित्रानंदन पन्त कहते हैं-

सुंदर हैं विहग,सुमन सुंदर

पर मानव तुम सबसे सुंदरतम!

 फैशन हमेशा से प्राचीन शैलियों का दोहराव है पर इसे नया रूप         तभी मिल पाता है जब आप नई सोच के साथ इसे प्रस्तुत करें।

– केरोलिना हेरेरा

वेनेंजुएला की प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर

 

 

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