स्टाइल का विज्ञान फैशन साइकोलॉजी

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फैशन शब्द पढ़ने या सुनने में जितना आसान प्रतीत हो रहा है, वास्तव में यह उतना आसान है नहीं। ’फैशन साइकोलॉजी’ का दायरा कपड़े और मेकअप से ज्यादा विस्तृत है।

फैशन का गृहप्रवेश, माध्यम फिल्में

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फिल्में, यद्यपि आती जाती रहती हैं फिर भी समाज से फैशन का रिश्ता कायम रहता है। समाज उसमें भी कुछ नया ढूंढ़ने की कोशिश करता है। फैशन को बढ़ाने में फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है।

रुपहले परदे पर बरकरार फैशन की चमक

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गुजरे ज़माने की फिल्मों में फैशनेबल कपड़ों का चलन काफी कम था और कलाकारों की ड्रेस कम बजट और स्थिति को देखते हुए तय की जाती थी, लेकिन आज ब्राण्ड का दौर है, कंपनियों की लाइन लगी हुई है और हर शुक्रवार यहां फैशन बदलता है।

फैशन उद्योग

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भारतीय फैशन उद्योग का देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में 14 प्रतिशत हिस्सा है और सकल घरेलू उत्पाद का 8 प्रतिशत इसी उद्योग से प्राप्त होता है। इतना ही नहीं भारतीय फैशन उद्योग लगभग 38 मिलियन लोगों को स्वरोजगार एवं रोजगार प्रदान करता है। इस उद्योग में एक बार पहचान बन जाए तो अपार संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।

कामकाजी महिलाओं की फैशन

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महिलाएं जॉब क्या करने लगीं, कई वर्गों में बंट गईं। गरीब, अर्ध-मध्यम और मध्यम वर्ग के अपने-अपने पैमाने बन गए। उनके फैशन के भी मानक बदल गए। माना कि हर सिक्के के दो पहलू हैं- नकारात्मक और सकारात्मक। जरा देखें कहां पहुंचना चाहते हैं हम-

मेंहदी लगा के रखना…

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मेंहदी केवल श्रृंगार की ही वस्तु नहीं है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर है। मेंहदी शादी-ब्याह में रस्म का हिस्सा है। मेंहदी से मनपसंद टैटू भी आजकल बनाए जाते हैं। भारत समेत पूर्वी देशों में मेंहदी जीवन का अभिन्न अंग है।

फैशन की मारी दुनिया बेचारी

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“मुझे पहली बार पता चला कि आजकल कम कपड़ों में, नंगे या फटे कपड़ों में घूमना ही बड़े होने और फैशन की निशानी है। और वास्तव में यह शर्म का नहीं बल्कि गर्व का विषय है।”

मुस्लिम महिलाओं के पेहराव और फैशन

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इस्लामी संस्कृति में परिधानों के कई प्रकार हैं। उन पर भी तरह-तरह की कारीगरी से चार चांद लग जाते हैं। गत कुछ वर्षों से ब्यूटी कांटेस्ट- सौंदर्य स्पर्धाओं- में इस्लामी लिबास में महिला स्पर्धक भाग लेती दिखाई देती हैं। इस्लामी फैशन डिझाइनें भी बदलते समय के अनुसार बदल रही हैं।

फैशनेबल बचपन

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बच्चे भी फैशन के दीवाने हैं। रैम्प पर चलने वाले ये नन्हें कदम इतने आत्मविश्वास से भरे होते हैं कि इनके सामने हर फैशन फीकी दिखाई देती है।

अति से विकृति

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फैशन अगर व्यक्त्वि को आकर्षक बनाती है, आत्म-विश्वास देती है, तो उसकी अति अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक विकृतियों को भी जन्म देती हैं। फैशन के प्रति स्वीकृती तो हो, लेकिन वह विकृति की सीमा तक नहीं पहुंचनी चाहिए।

ऊटपटांग कपडे पहनना फैशन नहीं

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राजनीतिक नेताओं और फिल्मी सितारों के लिए परिधान डिजाइन करने वालेे फिल्म उद्योग के मशहूर डिजाइनर पिता-पुत्र माधव एवं राहुल अगस्ती ने एक विशेष साक्षात्कार में भारतीय फैशन की दुनिया की एक से एक खासियतें उजागर की हैं। दोनों ने माना है कि फैशन ऊटपटांग नहीं होनी चाहिए, स्थान, माहौल, क्षेत्र और समय के अनुरूप होनी चाहिए।

आधुनिक फैशन फूहड़ता का फ्यूजन

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आप फैशन के नाम पर कटे-फटे और अंग प्रदर्शित करने वाले कपड़े पहन कर सभ्य बन रहे हैं या फिर अपनी फूहड़ता का परिचय दे रहे हैं? आपकी पहचान फूहड़ता है या आपकी पहचान भारतीयता है, या फिर अंधानुकरण करने वाले नकलची की? कहीं आप फैशन और फूहड़ता में घालमेल तो नहीं कर रहे हैं?

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