| इतिहास का सबक स्पष्ट है, जो राष्ट्र अपनी संस्थाओं को बिकाऊ नहीं बनने देते, वही संप्रभु रहते हैं। जो समाज नैरेटिव से पहले प्रमाण, शोर से पहले सत्य और भावनाओं से पहले विवेक को चुनता है, वही डीप स्टेट के जाल से बच पाता है। |
इतिहास की सबसे खतरनाक साजिशें हमेशा खुले युद्ध से नहीं, अदृश्य तंत्रों से जन्म लेती हैं। वे तलवारों की टकराहट में नहीं, बल्कि संस्थाओं के भीतर, भरोसे के क्षरण में और निष्ठाओं की खरीद-फरोख़्त में आकार लेती हैं।
वेनेज़ुएला की घटना को यदि केवल एक तख़्तापलट कहा जाए, तो हम उसके असली अर्थ को खो देंगे। यह केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भीतर से निष्क्रिय कर देने की प्रक्रिया थी। इसके केंद्र में वह अवधारणा है जिसे आज की राजनीति में ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है। एक ऐसा छिपा हुआ शक्ति-जाल, जो चुनी हुई सरकारों से परे जाकर निर्णयों, नीतियों और परिणामों को नियंत्रित करता है।
डीप स्टेट कोई संस्था नहीं, बल्कि हितों का अदृश्य गठजोड़ है। खुफिया एजेंसियां, बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट, वित्तीय लॉबी, मीडिया नैरेटिव और तथाकथित मानवाधिकार मंच ये सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें किसी राष्ट्र की संप्रभुता बाहर से नहीं, भीतर से गलने लगती है।
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वेनेज़ुएला में भी यही हुआ। यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि अमेरिकी कमांडो राष्ट्रपति भवन तक पहुंचे, बल्कि यह थी कि सेना और पुलिस की ओर से एक भी गोली नहीं चली। राष्ट्रपति अपने सुरक्षाबलों को देखते रहे। वे बल, जिन पर राष्ट्र की संप्रभुता टिकी होती है, मौन खड़े रहे। यह किसी सशस्त्र विद्रोह का दृश्य नहीं था, यह राजनीतिक शक्ति के भीतर से निष्क्रिय कर दिए जाने का क्षण था। सत्ता का पतन बंदूक से नहीं, विश्वास के विघटन से हुआ। यही डीप स्टेट की सबसे भयावह सफलता होती है, जब प्रतिरोध बाहर नहीं दिखता, क्योंकि वह भीतर पहले ही मर चुका होता है। सेना टूटती नहीं, ठहर जाती है। सुरक्षा बल विद्रोह नहीं करते, बस मौन हो जाते हैं और सत्ता, बिना लड़े, अकेली पड़ जाती है।
यह एक रूपकात्मक युद्ध था, जहां बंदूकें नहीं चलीं, बयान चले। जहां गोलियां नहीं बरसीं, ग्रांट्स और फंडिंग चलीं। अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति का यह नया चेहरा है प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं, प्रबंधित पतन।
पहले आर्थिक प्रतिबंधों से जनजीवन को थकाओ, फिर उसी थकान को सरकार-विरोध में ढालो। मीडिया से नैरेटिव गढ़ो, संस्थाओं में अविश्वास भरो और अंततः ‘लोकतंत्र की बहाली’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को वैध ठहराओ। यह लोकतंत्र नहीं, लोकतंत्र का मुखौटा है। लक्ष्य है नियंत्रण, जहां प्रतिबंध से पीड़ा, प्रचार से प्रतिरोध और परिणाम में पराजय सुनिश्चित की जाती है।
यह पैटर्न नया नहीं है। महाभारत से लेकर आधुनिक काल तक सत्ता के भीतर से सत्ता को गिराने की कहानियां लिखी गईं। महाभारत में युद्ध भले कुरुक्षेत्र में हुआ, पर पराजय की पटकथा सभा में लिखी गई थी। युधिष्ठिर को हराने के लिए तलवार नहीं उठी, पासा फेंका गया। द्रौपदी का अपमान किसी शस्त्रबल से नहीं, बल्कि संस्थागत मौन और सामूहिक कायरता से संभव हुआ। वही सभा, जो न्याय की रक्षक होनी चाहिए थी, अन्याय की साक्षी बन गई। यही डीप स्टेट का शास्त्रीय रूप था, जहां निर्णायक क्षण रणभूमि में नहीं, सत्ता-सभाओं में तय होते हैं और युद्ध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

इसी परंपरा की आधुनिक कड़ी प्लासी थी, जहां मीर जाफ़र ने चांदी के सिक्कों में आत्मा गिरवी रख दी। आज वही भूमिका डॉलर, फंडिंग और फेलोशिप निभा रही हैं। तब कंपनी थी, आज बहुराष्ट्रीय तंत्र है। फर्क बस इतना है कि अब साम्राज्य झंडे नहीं गाड़ते, नैरेटिव थोपते हैं, गवर्नर नहीं बैठाते, नीतियां लिखवाते हैं और यह चेतावनी केवल लैटिन अमेरिका के लिए नहीं है।
भारत में भी ऐसे संकेत दिखते हैं संस्थाओं पर अविश्वास, सेना-पुलिस की छवि पर प्रहार, न्यायिक प्रक्रियाओं पर संदेह, अर्थव्यवस्था को बदनाम करने की मुहिम और सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाला सतत प्रचार। उद्देश्य वही है लोकतंत्र को बचाने के नाम पर लोकतंत्र को अस्थिर करना।
भारत का सौभाग्य है कि उसकी सभ्यतागत स्मृति गहरी है और उसकी संस्थागत रीढ़ अभी मज़बूत है। पर सावधानी आवश्यक है, क्योंकि डीप स्टेट का हमला शोर नहीं करता, वह धीरे-धीरे भरोसे को खाता है। वह सेना नहीं तोड़ता, निष्ठाएं खरीदता है। वह चुनाव नहीं रोकता, परिणामों को संदिग्ध बनाता है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि वेनेज़ुएला क्यों टूटा। प्रश्न यह है कि कौन-सी शक्तियां दुनिया को प्रयोगशाला समझकर राष्ट्रों पर प्रयोग कर रही हैं और उससे भी बड़ा प्रश्न यह कि कोई भी देश कब तक इस जाल से स्वयं को बचाए रख सकता है।
इतिहास का सबक स्पष्ट है, जो राष्ट्र अपनी संस्थाओं को बिकाऊ नहीं बनने देते, वही संप्रभु रहते हैं। जो समाज नैरेटिव से पहले प्रमाण, शोर से पहले सत्य और भावनाओं से पहले विवेक को चुनता है, वही डीप स्टेट के जाल से बच पाता है।
अंततः यही इतिहास का अटल सत्य है, साम्राज्य अब बाहर से हमला नहीं करते, वे भीतर से रास्ता बनाते हैं और जो राष्ट्र अपने भीतर की दीवारें मजबूत नहीं रखते, वे एक दिन बिना युद्ध के हारे हुए पाए जाते हैं।
– प्रणय विक्रम सिंह

