| आज की वैश्विक राजनीति में एक विचित्र, लेकिन भयावह दृश्य उभर रहा है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को “शांति का मसीहा” घोषित करवाने की मुहिम में नोबेल शांति पुरस्कार की मांग करता दिखाई देता है। दूसरी तरफ उसी दौर में दुनिया के चारों ओर युद्ध, प्रतिबंध, सत्ता परिवर्तन और आर्थिक घेराबंदी की आग पहले से कहीं ज्यादा तेज़ हो चुकी है। |
इक्कीसवीं सदी का वैश्विक तंत्र एक ऐसे मंच में बदल चुका है जहाँ ‘लोकतंत्र’, ‘मानवाधिकार’ और ‘शांति’ जैसे शब्द अमेरिका के लिए केवल मुखौटे बनकर रह गए हैं। व्यवहार में वही अमेरिका आज सबसे बड़ा युद्ध-उद्योग, सबसे आक्रामक हस्तक्षेपकर्ता और सबसे बड़ा संसाधन-लुटेरा बन चुका है।
प्रश्न यह नहीं कि अमेरिका क्या करता है।
प्रश्न यह है कि पूरी दुनिया उसे करने क्यों देती है।
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोः विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
यूक्रेन युद्ध : रूस को फँसाने की रणनीतिक साज़िश
यूक्रेन युद्ध को केवल “रूस का आक्रमण” बताकर प्रस्तुत करना आधा सच है। वास्तविकता यह है कि NATO का विस्तार, यूक्रेन को रूस की सीमा तक हथियारों से भरना और वहाँ अमेरिका समर्थित सत्ता परिवर्तन की राजनीति, यह सब वर्षों से एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था।
उद्देश्य स्पष्ट था रूस को एक लंबे, महंगे और थकाने वाले युद्ध में उलझाकर कमजोर करना, यूरोप को ऊर्जा संकट में डालकर अमेरिका पर निर्भर बनाना,
और वैश्विक हथियार उद्योग को अरबों डॉलर का बाजार देना। यूक्रेन को “बलिदान की भूमि” बना दिया गया।
ऑपरेशन सिंदूर : भारत के साथ छल और पाकिस्तान का खुला संरक्षण
भारत जब आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाता है, तब अमेरिका की असली मानसिकता सामने आती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान :-
* अमेरिका ने भारत के पक्ष में खड़े होने की बजाय “संयम” का उपदेश दिया
* पाकिस्तान को “शांति भागीदार” के रूप में प्रस्तुत किया
* और परोक्ष रूप से भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास किया
यह स्पष्ट संकेत था कि अमेरिका भारत को सहयोगी नहीं, नियंत्रित अधीनस्थ बनाकर देखना चाहता है।
इराक और अफगानिस्तान : तेल, हथियार और विनाश की राजनीति
इराक पर हमला “विनाशकारी हथियारों” के झूठे आरोप पर किया गया। बाद में अमेरिका स्वयं स्वीकार करता है कि ऐसे हथियार थे ही नहीं। पर तब तक :-
* लाखों निर्दोष नागरिक मारे जा चुके थे
* पूरा देश खंडहर बन चुका था
* और इराक का तेल पश्चिमी कंपनियों के कब्जे में जा चुका था
अफगानिस्तान में 20 साल का युद्ध न लोकतंत्र दे सका, न स्थिरता, लेकिन हथियार उद्योग को ट्रिलियन डॉलर का मुनाफा दे गया।
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वेनेजुएला : तेल के लिए सत्ता परिवर्तन की खुली कोशिश
वेनेजुएला का अपराध यह था कि उसने अपने तेल संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण रखा। परिणाम :-
* आर्थिक प्रतिबंध
* सरकार गिराने की खुली साजिश
* राष्ट्रपति को अपदस्थ करने के प्रयास
* और राजनीतिक अस्थिरता का निरंतर निर्माण
यह लोकतंत्र नहीं, यह ऊर्जा-उपनिवेशवाद है। कारण बेहद स्पष्ट है कि दुनिया चुप क्यों है?
* डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था
* IMF, World Bank जैसे अमेरिकी नियंत्रित संस्थान
* NATO का सैन्य दबदबा
* पश्चिमी मीडिया द्वारा बनाई गई नैरेटिव फैक्ट्री
* और कई देशों की आर्थिक-सैन्य निर्भरता
इसलिए अमेरिका की आक्रामकता को “नीति” कहा जाता है और अन्य देशों के आत्मरक्षा को “आतंक”। आज की विश्व व्यवस्था में सबसे बड़ा खतरा कोई एक देश नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो खुद को कानून से ऊपर मानती है।
जब तक दुनिया बहुध्रुवीय, आत्मनिर्भर और साहसी नहीं बनेगी, तब तक ‘लोकतंत्र’ शब्द बमों के साथ गिरेगा और ‘मानवाधिकार’ ड्रोन हमलों के साथ जलेगा।

नोबेल की भूख और युद्ध का उद्योग
जब ‘शांति पुरस्कार’ हथियारों की दलाली का आवरण बन जाए
आज की वैश्विक राजनीति में एक विचित्र, लेकिन भयावह दृश्य उभर रहा है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को “शांति का मसीहा” घोषित करवाने की मुहिम में नोबेल शांति पुरस्कार की मांग करता दिखाई देता है। दूसरी तरफ उसी दौर में दुनिया के चारों ओर युद्ध, प्रतिबंध, सत्ता परिवर्तन और आर्थिक घेराबंदी की आग पहले से कहीं ज्यादा तेज़ हो चुकी है। यह कोई संयोग नहीं है। यह अमेरिका की नई साम्राज्यवादी रणनीति का नया मुखौटा है।
ट्रंप का “शांति मॉडल” : युद्ध को आउटसोर्स करना
ट्रंप के दौर में अमेरिका ने प्रत्यक्ष युद्ध कम लड़े, लेकिन प्रॉक्सी युद्ध, हथियार बिक्री, और रणनीतिक उकसावे को कई गुना बढ़ा दिया।
यूक्रेन, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया में अमेरिका सीधे नहीं लड़ता, वह देशों को लड़वाता है। और हथियार बेचकर शांति का भाषण देता है। यही मॉडल ट्रंप का असली “नोबेल फॉर्मूला” है।
युद्ध को व्यापार बना देने वाली सभ्यता
आज दुनिया में जितने बड़े युद्ध हैं, उनके पीछे एक ही उद्योग सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है अमेरिकी हथियार उद्योग।
:Lockheed Martin, Raytheon, Boeing, Northrop Grumman: इन कंपनियों की कमाई युद्ध के साथ बढ़ती है, और यही कंपनियाँ अमेरिकी चुनावों में सबसे बड़ी फंडिंग करती हैं। यानी, युद्ध केवल नीति नहीं, यह अमेरिका का सबसे बड़ा व्यवसाय है।
शांति का पुरस्कार और खून का कारोबार
नोबेल शांति पुरस्कार का उद्देश्य था मानवता की रक्षा करने वालों को सम्मानित करना। लेकिन आज यह सत्ता की वैधता का प्रमाणपत्र बनता जा रहा है। जो सबसे ज्यादा युद्ध करवाता है, जो सबसे ज्यादा प्रतिबंध लगाता है, जो सबसे ज्यादा देशों की अर्थव्यवस्था तोड़ता है वही “शांति के दावेदार” बनते हैं। यह नैतिक पतन नहीं, यह सभ्यतागत संकट है।

भारत के लिए चेतावनी
भारत को समझना होगा कि अमेरिका का मित्र बनना और अमेरिका की नीति का उपकरण बनना इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जो देश अपनी सभ्यता, सेना, अर्थव्यवस्था और नीति को स्वतंत्र नहीं रखता, वह “साझेदार” नहीं, बल्कि “मोहरा” बन जाता है।
दुनिया को अब मौन तोड़ना होगा
आज की सबसे बड़ी लड़ाई सीमाओं की नहीं, सभ्यताओं की आत्मा की है। या तो दुनिया बहुध्रुवीय, आत्मसम्मानी और स्वतंत्र बनेगी या फिर नोबेल पुरस्कारों की चमक में युद्ध का अंधकार फैलता रहेगा।
डॉलर साम्राज्यवाद : बिना गोली चलाए देश गुलाम बनाने की प्रणाली
आज अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार उसकी सेना नहीं, उसकी डॉलर आधारित वैश्विक मुद्रा व्यवस्था है। जिस देश की नीति अमेरिका के अनुकूल नहीं होती, उस पर बम नहीं, पहले डॉलर छोड़ा जाता है।
* SWIFT से बाहर करना
* डॉलर ट्रांजैक्शन पर प्रतिबंध
* विदेशी भंडार फ्रीज़ करना
* अंतरराष्ट्रीय निवेश रोकना
लीबिया, ईरान, रूस, वेनेजुएला, सीरिया इन सबको पहले आर्थिक रूप से पंगु किया गया, फिर राजनीतिक अस्थिरता फैलाई गई। यह आर्थिक उपनिवेशवाद है।

डिजिटल उपनिवेशवाद : विचारों पर कब्ज़ा
आज युद्ध केवल ज़मीन पर नहीं लड़े जाते, युद्ध दिमाग पर लड़े जाते हैं।
Google, Meta, X, YouTube, Wikipedia ये सब केवल कंपनियाँ नहीं, ये आधुनिक साम्राज्य के मनोवैज्ञानिक हथियार हैं।
* कौन सा सच दिखेगा
* कौन सा झूठ दबेगा
* किस नेता की छवि बनेगी
* किस राष्ट्र को “खलनायक” घोषित किया जाएगा
यह सब सिलिकॉन वैली तय करती है। देश स्वतंत्र हो सकता है, पर उसकी चेतना गुलाम बना दी जाती है।
संयुक्त राष्ट्र : जहाँ न्याय नहीं, राजनीति होती है
UN को “विश्व की अंतरात्मा” कहा गया था। आज वह अमेरिका का वैचारिक विस्तार बन चुका है। जहाँ अमेरिका शामिल होता है वहाँ जांच धीमी होती है। जहाँ अमेरिका विरोधी होते हैं वहाँ “मानवाधिकार” अचानक जाग जाता है। यमन, फिलिस्तीन, सीरिया ये सब इसके सबसे ज्वलंत प्रमाण हैं।
रेटिंग एजेंसियां : सॉफ्ट पावर के नाम पर वैचारिक प्रहार
अमेरिका केवल बमों से नहीं, बल्कि ‘इंडेक्स’ और ‘रेटिंग’ से भी युद्ध लड़ता है। वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और पश्चिमी थिंक-टैंक (जैसे हंगर इंडेक्स, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, डेमोक्रेसी इंडेक्स) अक्सर उन देशों की रैंकिंग गिरा देते हैं जो अमेरिका के हितों के सामने नहीं झुकते। यह एक प्रकार का “बौद्धिक आतंकवाद” है, जिसका उद्देश्य किसी राष्ट्र के भीतर हीन भावना पैदा करना और अंतरराष्ट्रीय निवेश को प्रभावित करना है। जब सेना काम नहीं आती, तब ये कागजी आंकड़े किसी देश की अर्थव्यवस्था और छवि को ध्वस्त करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
मीडिया : युद्ध से पहले भ्रम, युद्ध के बाद मौन
हर अमेरिकी युद्ध से पहले एक ही प्रक्रिया दोहराई जाती है
* दुश्मन को राक्षस बनाओ
* भावनात्मक चित्र दिखाओ
* आधा सच दो
* पूरा झूठ छुपाओ
* और फिर बम गिराओ
जब विनाश हो जाता है तब मीडिया खामोश हो जाता है।
फिलिस्तीन : सबसे बड़ा नैतिक प्रमाण
अगर दुनिया न्यायप्रिय होती तो फिलिस्तीन आज स्वतंत्र होता। पर क्योंकि आक्रांता अमेरिकी छत्रछाया में है इसलिए मानवाधिकार वहीं मर जाते हैं। यह साबित करता है कि आज न्याय नहीं, शक्ति ही सत्य है।
आज अमेरिका केवल एक देश नहीं, वह एक वैश्विक नियंत्रण प्रणाली बन चुका है
जो राष्ट्र इसके बाहर सोचता है उसे
* आर्थिक रूप से तोड़ा जाता है
* मानसिक रूप से बदनाम किया जाता है
* राजनीतिक रूप से अस्थिर किया जाता है
* और अंत में युद्ध में धकेला जाता है
यह 21वीं सदी का नया उपनिवेशवाद है।
“रंग-क्रांति” नहीं, “रिमोट-कंट्रोल तख़्तापलट” की वैश्विक प्रयोगशाला
आज की साम्राज्यवादी रणनीति टैंकों से नहीं, भीड़, अफवाह, डिजिटल उकसावे और आर्थिक अराजकता से सरकारें गिराने की है। यह वह युद्ध है जिसमें बम नहीं गिरते, पर देश गिर जाते हैं।
वेनेजुएला में राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के साथ हुआ अपहरण कोई “आंतरिक असंतोष” नहीं था। यह उसी पैटर्न की अगली कड़ी है, जिसमें पहले
* मुद्रा को गिराया जाता है
* आवश्यक वस्तुओं की कृत्रिम कमी बनाई जाती है
* सोशल मीडिया पर आक्रोश की आँधी छोड़ी जाती है
* और फिर “लोकतंत्र बचाओ” के नारे में सत्ता बदल दी जाती है
यही मॉडल ईरान में “भीड़तंत्र” के रूप में सड़कों पर उतारा गया, जहाँ असंतोष को योजनाबद्ध रूप से विस्फोट में बदला गया। यही स्क्रिप्ट पहले इन देशों में लागू हो चुकी है :-
* श्रीलंका
* बांग्लादेश
* नेपाल
* पाकिस्तान
इन सभी जगहों पर सत्ता परिवर्तन से पहले आर्थिक संकट, विदेशी कर्ज़, IMF दबाव, सोशल मीडिया आंदोलन और अचानक उग्र भीड़ यह संयोग नहीं, यह “डिज़ाइन” है।
इसे रंग-क्रांति कहा जाता है, पर वास्तविक नाम है “डॉलर-ड्रिवन डेस्टेबिलाइज़ेशन प्रोग्राम” जिसका उद्देश्य है स्वतंत्र सोच रखने वाले देशों को बिना युद्ध गुलाम बनाना।
यह नया साम्राज्यवाद है जहाँ बंदूक नहीं, बैंक; और बम नहीं, भीड़ हथियार है।
आंतरिक मोर्चा : जब विदेशी षड्यंत्र को देश के भीतर “स्थानीय ठेकेदार” मिल जाएँ।
हर साम्राज्यवादी रणनीति को बाहरी शक्ति के साथ-साथ देश के भीतर एक ‘लोकल नेटवर्क’ की आवश्यकता होती है। यही नेटवर्क विदेशी षड्यंत्र को “जन आंदोलन”, “लोकतांत्रिक असंतोष” और “संवैधानिक चिंता” का रूप देता है। भारत में भी यही मॉडल लागू करने के प्रयास लगातार दिखाई देते हैं। इस नेटवर्क का कार्य स्पष्ट होता है :-
* भारतीय सेना और सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना
* न्यायपालिका, चुनाव आयोग, प्रशासन, और वैज्ञानिक संस्थानों पर अविश्वास पैदा करना
* हर राष्ट्रहितकारी निर्णय को “तानाशाही”, “अधिनायकवाद” और “लोकतंत्र पर हमला” बताकर प्रस्तुत करना
* सोशल मीडिया और विदेशी मंचों के माध्यम से भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को तोड़ना
* जाति, भाषा, पंथ, क्षेत्र और विचारधारा के नाम पर समाज को खंडित करना
यह सब केवल “राजनीतिक असहमति” नहीं है। यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक युद्ध है।
जब किसी देश के अपने ही कुछ समूह विदेशी फंडिंग, विदेशी नैरेटिव और विदेशी एजेंडा के साथ खड़े हो जाते हैं, तब वह केवल विपक्ष नहीं रहता वह हाइब्रिड वॉर का आंतरिक मोर्चा बन जाता है। लक्ष्य स्पष्ट है :-
– भारत को युद्ध से नहीं, अविश्वास से तोड़ना।
– सीमा से नहीं, चेतना से हराना।
जब जनता अपने ही सैनिकों, वैज्ञानिकों, न्यायाधीशों और संस्थाओं पर भरोसा खो देती है, तब किसी बाहरी आक्रमण की ज़रूरत नहीं रहती।
यह वही मॉडल है जो पहले अन्य देशों में आज़माया गया और अब भारत पर आज़माने की कोशिश की जा रही है। इसलिए यह संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, भारत की आत्मा की रक्षा का संघर्ष है।
बहुध्रुवीय विश्व : दादागिरी के अंत की शुरुआत
दुनिया अब अमेरिका की एकध्रुवीय व्यवस्था से ऊब चुकी है। BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और अन्य नए सदस्य) जैसे संगठन आज उस ‘डॉलर साम्राज्यवाद’ को चुनौती दे रहे हैं। अपनी मुद्राओं में व्यापार करना और पश्चिमी नियंत्रण वाले IMF-वर्ल्ड बैंक के समानांतर ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ जैसे संस्थान बनाना यह संकेत हैं कि दुनिया अब खामोश नहीं है। भारत इस नई व्यवस्था में एक ‘विश्व-मित्र’ की भूमिका निभा रहा है, जो बिना किसी की गुलामी किए एक न्यायपूर्ण और संतुलित वैश्विक मंच की वकालत करता है।
समाधान : सनातन संस्कृति और अध्यात्म से मार्गदर्शन
भारत के सामने चुनौती केवल भू-राजनीतिक नहीं, सभ्यतागत है। यह संघर्ष केवल सीमाओं, बाजारों और सत्ता का नहीं, बल्कि चेतना, मूल्य और दृष्टि का है। सनातन संस्कृति ने सदियों से भारत को यह सिखाया है कि राष्ट्र की रक्षा केवल शस्त्रों से नहीं होती, बल्कि धर्म-नीति, आत्मबोध और समाज के नैतिक आधार से होती है।
1. आध्यात्मिक और नैतिक मजबूती
सनातन परंपरा का मूल संदेश है कर्तव्य, सत्य और विवेक है। जब समाज के भीतर यह तीनों सुदृढ़ होते हैं, तब भ्रम, भय और विभाजन फैलाने वाली शक्तियाँ स्वतः कमजोर पड़ती हैं। यह आंतरिक मजबूती ही बाहरी दबावों के सामने सबसे बड़ा कवच है।
2. संस्कृति का आत्मविश्वास
लोककथाएँ, उपनिषदों का चिंतन, गीता का कर्मयोग, और भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराएँ हमें यह सिखाती हैं कि संकट काल में आत्मविश्वास ही दिशा देता है। संस्कृति का आत्मविश्वास केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा है।
3. स्वायत्त नीति और आत्मनिर्भरता
राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी स्वायत्तता किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता का आधार है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल उत्पादन नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान, तकनीक और नीति में आत्मबोध है ताकि निर्णय बाहर के दबाव से नहीं, अपने विवेक से हों।
4. सामूहिक चेतना का सशक्तिकरण
अध्यात्म केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक विवेक का प्रशिक्षण है।
सहिष्णुता, संवाद और नैतिक साहस यह तीनों समाज को विभाजनकारी प्रवृत्तियों से बचाते हैं और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हैं।
5. युवा और शिक्षा
भविष्य की सबसे बड़ी रक्षा-रेखा हमारी युवा पीढ़ी है। शिक्षा का लक्ष्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, डिजिटल विवेक और राष्ट्र-चेतना होना चाहिए ताकि युवा तथ्य, भावनात्मक उकसावे और प्रचार के बीच अंतर पहचान सकें।
संघर्ष केवल शक्ति का नहीं, चेतना और संस्कृति का है। जब तक भारत अपने सनातन मूल्यों, आध्यात्मिक समझ और नैतिक साहस के आधार पर सुदृढ़ रहेगा, तब तक कोई भी बाहरी दबाव उसकी दिशा तय नहीं कर पाएगा।
साम्राज्यवाद का मुकाबला केवल शक्ति से नहीं- चेतना और संस्कार से होता है।
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
✍️ अखिलेश चौधरी

