| अपनी जान बचाने के लिए नक्सली समर्पण तो कर रहे हैं, किंतु उन्होंने मन से समर्पण नहीं किया है। मुख्यधारा में आने के बाद भी उन पर विशेष दृष्टि रखनी आवश्यक है क्योंकि अर्बन नक्सली उन्हें पुन: अपनी गतिविधियों में शामिल कर सकते हैं। अत: वैचारिक हिंसा फैलाने वाले अर्बन नक्सलियों पर भी नकेल कसनी आवश्यक है। |
मार्च 2026 तक हिंसक नक्सली आंदोलन को आमूल नष्ट करने की घोषणा देश के गृह मंत्री अमित शाह ने की थी, उन्होंने कहा था कि यदि नक्सली आत्मसमर्पण करते हैं तो उन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए सरकार तैयार है। भारत सरकार ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के जीविकोपार्जन के लिए कई प्रकार की योजनाओं की घोषणा की है जिसे क्रियान्वित भी किया जा रहा है।
देश के गृहमंत्री की इस घोषणा पर राजनीतिक विपक्षियों, नक्सली समर्थकों और कहा जाए तो शहरी नक्सलियों ने एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास किया, जिससे आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों में यह संदेह उत्पन्न हो जाए कि उनके आत्मसमर्पण के बाद सरकार अपने वादे को पूरा नहीं करेगी। शहरी नक्सलियों को लगा कि उनकी अफवाह पर नक्सली आंदोलनकारी विश्वास कर लेंगे और आत्मसमर्पण नहीं करेंगे तो भारत सरकार खासकर भाजपा सरकार की सार्वजनिक रूप से जगहंसाई होगी, परंतु ऐसा नहीं हो सका। सरकार की घोषणा का सीधा असर यह देखा गया कि लाखों रुपए के ईनामी नक्सली आतंकवादियों ने केवल खुद ही आत्मसमर्पण नहीं किया बल्कि अपने दर्जनों साथियों को भी हथियार डालकर आत्मसमर्पण करवाया। इससे मार्च 2026 तक नक्सली विहीन किए जाने की घोषणा नवम्बर में ही पूरी होती दिखाई दी। भारत सरकार ने कहा कि देश नक्सली हिंसा से मुक्त हो चुका है। मार्च 2026 तक पूरा किया जाने वाला लक्ष्य नवम्बर में ही प्राप्त कर लिया गया।
गृह मंत्री ने कहा था, 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने का एक तय लक्ष्य है। सुरक्षा बल नक्सल प्रभाव को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध हैं। सीनियर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यदि वे समर्पण नहीं करते हैं तो उन्हें समाप्त कर दिया जाएगा। नक्सलियों के सरेंडर में बहुत बढ़ोतरी हुई है, अकेले 2025 में 1,200 से अधिक नक्सलियों ने समर्पण किया। यह मु्ख्यधारा में शामिल होने और सरकार के हिंसक नक्सलियों के विरुद्ध लगातार की जा रही कार्रवाई से सम्भव हुआ। समर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास के लिए तुरंत आर्थिक सहयोग राशि के साथ ही मासिक आय, व्यावहारिक प्रशिक्षण और हथियार सौंपने पर विशेष राशि शामिल की जा रही है। अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में प्रमुख हिंसक नक्सलियों ने हथियार डाले, जिससे सरकार की हिंसक नक्सली गतिविधियों को आमूल नष्ट करने के संकल्प को मजबूती मिली। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जो समर्पण नहीं करेगा उसके विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई की जाएगी।
भारत सरकार की ओर से यह कहा गया है कि समर्पण करने वाले नक्सली से राज्य सरकार द्वारा तय की गई अथॉरिटी को यह पक्का करना चाहिए कि सरेंडर करने वाला असली नक्सली है और नक्सली को अपने द्वारा किए गए सभी आपराधिक कार्यों की पूरी जानकारी और स्वीकारोक्ति देनी चाहिए, जिसमें योजना को बनाने वाले और दूसरे सहयोगियों के नाम, आर्थिक सहयोग करनेवालों के नाम, पनाह देने वाले, कूरियर के नाम, नक्सल संगठन की पूरी जानकारी, हथियार/गोला-बारूद और नक्सली जिस संगठन से जुड़े हैं, उसके द्वारा लूटी/बांटी/बेची गई प्रॉपर्टी शामिल है, की जानकारी हो।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 (2014) से घटकर मात्र 11 (2025) रह गई है और सबसे अधिक प्रभावित जिले 36 से घटकर केवल 3 रह गए हैं, रेड कॉरिडोर समाप्त हो गए हैं। केंद्र सरकार और नक्सल पीड़ित राज्य सरकारों ने सामूहिक रूप से 12,000 किमी से अधिक सड़कें, 586 मजबूत पुलिस स्टेशन, 361 नए कैंप, 8,500 से अधिक मोबाइल टावर चालू किए हैं और 92 करोड़ की सम्पत्ति अधिग्रहण की है, जिससे मुख्य क्षेत्र में माओवादियों का भौगोलिक और वित्तीय दबदबा समाप्त हो गया है।

2025 में 317 नक्सलियों को समाप्त किया गया (जिसमें टॉप लीडरशिप भी शामिल है)। 800 से अधिक हिरासत में लिए गए और लगभग 2,000 ने समर्पण किया, जिससे नक्सल-मुक्त भारत बन सका है।
वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध केंद्र सरकार द्वारा निर्णायक रक्षा रणनीति अपनाने के कारण देश भर में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को कम करने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। सरकार ने नक्सलवाद के विरुद्ध एक एकीकृत, बहुआयामी और निर्णायक रणनीति अपनाई है, जो पिछली सरकारों के बिखरे हुए दृष्टिकोण की जगह लेती है। बातचीत, सुरक्षा, समन्वय के स्पष्ट सिद्धांतों पर काम करने के कारण ही नक्सल प्रभावित क्षेत्र सम्पूर्ण रूप से नक्सल-मुक्त करने में सफलता मिली है।
देश की जनता विशेषतः उन नक्सली हिंसा से पीड़ित राज्यों के नागरिकों के लिए यह एक बहुत बड़ी राहत की बात है, परंतु हथियार से सत्ता परिवर्तन की भावनाओं को जहां से खाद पानी मिलता है या कहा जाए जो इस हिंसक विचारधारा के मूल में हैं अथवा जो इस हिंसक विचारधारा का समर्थन करते हैं, इस हिंसक विचारधारा को जीवित रखने के लिए येन-केन-प्रकारेण धन और अपप्रचार कर लोगों को वनवासी क्षेत्रों में हथियार से सत्ता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं, क्या सरकार उनके विरुद्ध भी कोई अभियान चलाएगी? क्या दशकों से जिस विचारधारा से प्रेरित होकर हिंसक रास्ते को ही अपना मूल अधिकार मानने वाले नक्सलियों का मन परिवर्तन इतनी आसानी से हो सकता है?

हिंसक नक्सलियों के आत्मसमर्पण और सरकार की मानवीय योजना को संदेह की दृष्टि से देखने या प्रश्नचिन्ह लगाने की हमारी मंशा नहीं है, परंतु क्या समर्पण करने वाले नक्सली अपनी हिंसक विचारधारा को इतनी आसानी से छोड़ पाएंगे? क्या उन्हें पार्श्व से मिलने वाली ऊर्जा फिर से उसी हिंसक रास्ते पर धकेलने का काम नहीं करेगी? इस देश में कुछ तत्व ऐसे भी हैं जो हिंसक नक्सलियों के समर्पण को पचा नहीं पा रहे हैं। ऐसे ही लोगों ने पिछले माह ही दिल्ली के इंडिया गेट के पास पर्यावरण बचाने के नाम पर प्रदर्शन किया था। जघन्य हिंसक नक्सली हिडमा को जब सुरक्षा बलों ने मार गिराया तो उसको शहीद बताते हुए उसके पोस्टर के साथ यह नारा लगाया जाने लगा, हिडमा हम शर्मिंदा है, हर घर में हिडमा पैदा होगा…।
जब तक हिंसक नक्सली पैदा करनेवाले राक्षसी वृत्ति के रक्तबीज रूपी अर्बन नक्सलियों का सफाया नहीं होगा तब तक विषैले वामपंथ का वैचारिक आतंकवाद समाप्त नहीं होगा। इसलिए इनके विरुद्ध भी निणार्यक कार्रवाई की पहल की जाए ताकि लाल आतंक की काली छाया से भी भारत जल्द मुक्त हो जाए।

