| जब Gen-Z तकनीक को जीवन का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक बनाना सीख लेता है, तब संतुलन उसकी ताकत बन जाता है। यह महत्वाकांक्षा को कम करने की नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी गढ़ने की बात है जो ऊर्जावान, मानसिक रूप से स्थिर और डिजिटल व वास्तविक— दोनों भारत में पूरी तरह उपस्थित हो। |
ईमानदारी से सोचिए आज आपने कितनी बार बिना किसी ठोस कारण के फोन अनलॉक किया? एक रील पाँच बन गई, एक नोटिफिकेशन ने 20 मिनट खा लिए और दिन के अंत में मन थका-सा, भारी-सा महसूस हुआ। यह Gen-Z की अनुशासनहीनता नहीं है और न ही तकनीक स्वयं में बुरी है। सच्चाई यह है कि मानव शरीर और मस्तिष्क निरंतर डिजिटल उत्तेजना के लिए बने ही नहीं हैं। भारत का युवा वर्ग, जो दुनिया के सबसे तेज़ डिजिटल विस्तार के बीच बड़ा हो रहा है, इस असंतुलन को सबसे अधिक महसूस कर रहा है।
भारत विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है और साथ ही स्मार्टफोन उपयोग में भी अग्रणी है। स्क्रीन ने शिक्षा, रचनात्मकता, अभिव्यक्ति और अवसरों के द्वार खोले हैं। परंतु जब स्क्रीन समय धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधि, नींद और वास्तविक सामाजिक संपर्क का स्थान ले लेता है, तब यही सुविधा थकान और तनाव का कारण बन जाती है। अच्छी बात यह है कि Gen-Z सबसे अधिक जागरूक और अनुकूलनशील पीढ़ी भी है— जो तकनीक को नकारे बिना संतुलन स्थापित कर सकती है।
स्क्रीन का शरीर और मन पर प्रभाव
हाल के भारतीय अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि किशोरों और युवाओं में स्क्रीन समय लगातार बढ़ रहा है और इसका सीधा संबंध नींद की खराब गुणवत्ता, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव से है। विशेषकर रात में देर तक मोबाइल या सोशल मीडिया का उपयोग शरीर की जैविक घड़ी को बिगाड़ देता है, जिससे युवा थके होने के बावजूद बेचैन रहते हैं। मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर भी संकेत चिंताजनक हैं। चिंता, अवसाद, ध्यान की समस्या और शरीर को लेकर असंतोष की भावना युवाओं में बढ़ रही है। लगातार तुलना, “हमेशा उपलब्ध रहने” का दबाव और ऑनलाइन मान्यता की चाह इसका बड़ा कारण बन रही है। यह सब अक्सर “सामान्य” लगने लगता है, क्योंकि लगभग हर कोई इसी स्थिति में है।
शरीर भी इस तनाव को साफ दिखाता है
आँखों में जलन, सिरदर्द, गर्दन-कंधे का दर्द, झुकी हुई मुद्रा और धीरे-धीरे बढ़ता वजन। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग और बैठे रहने की जीवनशैली मोटापा, चयापचय असंतुलन और बढ़ती निकट-दृष्टि (मायोपिया) से जुड़ी हुई है। सरल शब्दों में, जब दैनिक जीवन से गति और गतिविधि गायब हो जाती है, तो शरीर तनावपूर्ण और ऊर्जा-हीन अवस्था में चला जाता है।
यह इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि जैविक प्रतिक्रिया है।
आयुर्वेद, गतिविधि और जीवन की लय
आयुर्वेद ने सदियों पहले ही बताया है कि स्वास्थ्य का मूल आधार संतुलन और लय है। दिनचर्या (दिनचर्या) के अनुसार नियमित नींद, दैनिक शारीरिक गतिविधि, उचित आहार और विश्राम से ही मन-शरीर स्वस्थ रहता है। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग वात दोष को बढ़ाता है, जो तंत्रिका तंत्र, गति, ध्यान और भावनाओं से जुड़ा है। जब वात असंतुलित होता है, तो बेचैनी, चिंता, अनिद्रा, आँखों में सूखापन और मानसिक थकान जैसे लक्षण प्रकट होते हैं।
आयुर्वेद आधुनिक जीवन से दूर जाने को नहीं कहता, बल्कि उसे ज़मीन से जोड़ने की बात करता है।
सबसे प्रभावी बदलाव है
प्रतिबंध नहीं, प्रतिस्थापन। लंबे स्क्रीन समय के बीच छोटे-छोटे गतिविधि अंतराल चलना, स्ट्रेचिंग, योग, नृत्य या घरेलू काम तंत्रिका तंत्र को स्थिर करते हैं। शारीरिक गतिविधि मूड को संतुलित करती है, ध्यान बढ़ाती है और भीतर जमी हुई थकान को बाहर निकालती है।
आँखों और मन के लिए छोटे अभ्यास अत्यंत उपयोगी हैं। 20-20-20 नियम आँखों और मस्तिष्क को विश्राम देता है। गर्दन घुमाना, गहरी श्वास-प्रश्वास और आँखों पर हथेलियाँ रखना संवेदी थकान कम करता है। रात में पाँच मिनट का तैल अभ्यंग (तेल मालिश) शरीर को विश्राम का संकेत देता है। अच्छी नींद अनुशासन से नहीं, बल्कि तैयारी से आती है कम रोशनी, सोने से पहले स्क्रीन दूरी और शांत दिनचर्या से।
आयुर्वेद सिखाता है कि निरंतरता तीव्रता से अधिक प्रभावशाली होती है। रोज़ का 20 मिनट का टहलना, कभी-कभार के कठोर प्रयासों से कहीं अधिक लाभकारी है।
इसी संतुलन में बाहरी खेलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आउटडोर खेल युवाओं के समग्र विकास में सहायक होते हैं। ये केवल शारीरिक फिटनेस ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी सुदृढ़ करते हैंतनाव घटाते हैं, एकाग्रता बढ़ाते हैं और भावनात्मक संतुलन लाते हैं। टीम खेल सहयोग, नेतृत्व, अनुशासन, सहानुभूति और आत्मविश्वास जैसे गुणों को विकसित करते हैं, जिससे युवा सामाजिक रूप से जुड़ाव महसूस करते हैं और मानसिक रूप से अधिक सशक्त बनते हैं।
आज के भारतीय Gen-Z के लिए स्क्रीन केवल उपकरण नहीं हैं
वे कक्षा हैं, मंच हैं, डायरी हैं और सामाजिक संसार भी। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब आत्म-मूल्य केवल लाइक्स से तय होने लगे, तुलना आत्म-विश्वास को निगलने लगे और बिना स्क्रीन के शांति असहज लगने लगे। भारत में युवाओं की भावनात्मक पीड़ा अक्सर इसलिए अनदेखी रह जाती है क्योंकि वह “डिजिटल सामान्य” लगती है। पर मन धीरे-धीरे ज़मीन, गति और वास्तविक मानवीय संपर्क की माँग करता है।
रीसेट का अर्थ पूर्णता नहीं है। यह छोटे, सचेत कदमों से शुरू होता है। सुबह उठकर 10 मिनट शरीर को हिलाना, पढ़ाई के बीच छोटे गतिविधि विराम, शाम को बाहर निकलना और रात में मन को शांत होने देना ये छोटे बदलाव बड़े परिणाम लाते हैं। प्रतिदिन एक घंटा सचेत ऑफ़लाइन समय मूड, नींद, एकाग्रता और आत्मविश्वास में स्पष्ट सुधार ला सकता है।
जब Gen-Z तकनीक को जीवन का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक बनाना सीख लेता है, तब संतुलन उसकी ताकत बन जाता है। यह महत्वाकांक्षा को कम करने की नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी गढ़ने की बात है जो ऊर्जावान, मानसिक रूप से स्थिर और डिजिटल व वास्तविक— दोनों भारत में पूरी तरह उपस्थित हो।
– डॉ. शिवानी कटारा

