| आज का महानगरीय मतदाता भावनात्मक नारों से ज्यादा सेवा, सुविधाएं और स्थिरता देख रहा था। सड़कें, पानी, यातायात, भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन और दीर्घकालीन विकास की योजना, इन पर ठोस जवाब चाहिए थे। जिस पार्टी ने ये जवाब दिए, उसी को आधुनिक और बदले हुए दृष्टिकोण वाले मुंबईकरों का समर्थन मिला। |
महाराष्ट्र की नगर निगमों के चुनावी परिणाम में भाजपा का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ताजा रुझानों के अनुसार महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में से 23 नगर निगमों में भाजपा बढ़त बनाए हुए हैं। खासकर मुंबई महानगरपालिका में मिली भाजपा को बढ़त देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
मुंबई महानगरपालिका तथा महाराष्ट्र की अन्य महानगरपालिकाओं के चुनाव केवल स्थानीय स्वराज संस्थाओं की राजनीति तक सीमित नहीं रहे बल्कि वे शहरी महाराष्ट्र की राजनीतिक दिशा तय करने वाले चुनाव बन गए थे। प्रचार के रण में आरोप-प्रत्यारोप, भावनात्मक अपील, विकास के दावे और पहचान की राजनीति इन सबका मिश्रण देखने को मिला। इस पृष्ठभूमि में भारतीय जनता पार्टी एवं महायुति को विजय प्राप्त हुआ है, यह केवल संयोग नहीं बल्कि एक सुसंगत और सुनियोजित रणनीति का परिणाम है। भाजपा और शिवसेना (शिंदे गट) की जीत के ठोस कारण सामने आते हैं, वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गट) और मनसे की हार के भी कुछ स्पष्ट कारण दिखाई देते हैं।
भाजपा की जीत में कौन-सी रणनीति निर्णायक रही? इस पर विचार करें तो “ट्रिपल इंजन सरकार” का प्रभावी प्रचार प्रमुख रूप से सामने आता है। मुंबई के विकास के लिए केंद्र, राज्य और महानगरपालिका इन तीनों स्तरों पर एक ही विचारधारा की सत्ता होने से होने वाले फायदों को भाजपा ने मतदाताओं के सामने स्पष्ट रूप से रखा। “एक विचारधारा की सत्ता का मतलब… निधि, निर्णय और क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं का अंत” यह संदेश शहरी मध्यम वर्ग, व्यावसायिक वर्ग और नए मतदाताओं तक पहुंचाने में भाजपा सफल रही। बुनियादी ढांचे पर आधारित मुद्दे पर प्रचार भी भाजपा की जीत का एक महत्वपूर्ण कारण रहा।
मुंबई में मेट्रो, कोस्टल रोड, क्लस्टर डेवलपमेंट, झुग्गी पुनर्वसन जैसे प्रोजेक्ट्स को भाजपा ने भविष्य के शहर के सपने से जोड़ा। भ्रम पैदा करने वाली या केवल भावनात्मक घोषणाओं की बजाय भाजपा ने यह बताने की कोशिश की कि महानगरपालिका पर भाजपा की सत्ता आने के बाद “आपके रोजमर्रा के जीवन में क्या बदलाव आएगा?” इस प्रश्न का सीधा और सरल उत्तर देने का प्रयास मुंबई और अन्य महानगरों के मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचा।
मुंबई और महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों की महानगरपालिका चुनावों में भाजपा और महायुति को मिली जीत का श्रेय किसे दिया जाए? अब इसमें कोई भ्रम नहीं है। यह जीत दिल्ली की रणनीति का परिणाम नहीं बल्कि मुंबई और महाराष्ट्र के रणक्षेत्र में लगातार भ्रमण करते रहे देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व पर जनता की स्पष्ट मुहर है।
पूरे प्रचार काल में भाजपा का चेहरा, आवाज, आक्रामकता और विश्वसनीयता, इन चारों पहलुओं में देवेंद्र फडणवीस केंद्र में रहे। इसलिए यह परिणाम केवल पार्टी की जीत नहीं बल्कि नेतृत्व पर दिए गए जनविश्वास के रूप में दर्ज किया जाएगा। इस चुनाव में एक बात विशेष रूप से महसूस हुई, दिल्ली का कोई भी वरिष्ठ राष्ट्रीय नेतृत्व मुंबई या महाराष्ट्र में सीधे प्रचार में नहीं उतरा। इसके बावजूद भाजपा का प्रचार कमजोर नहीं पड़ा। उल्टे, मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में हर मुद्दे और हर संघर्ष में देवेंद्र फडणवीस की आवाज निर्णायक साबित हुई। यह आवाज सत्ता पाने की नहीं बल्कि प्रशासनिक समझ, विकास की दिशा और निर्णायक नेतृत्व की थी।
मुंबई में सत्ता होने के बावजूद उबाठा शिवसेना पर से भरोसा क्यों डगमगाया? यह प्रश्न अभी कोई प्रश्न नहीं रहा है कारण शिवसेना कभी मुंबई की राजनीतिक पहचान हुआ करती थी। “मुंबई हमारी है” का नारा केवल घोषणा नहीं बल्कि सत्ता और प्रभाव की अनुभूति था। लेकिन आज वही उबाठा शिवसेना मुंबई में अपनी पहचान खोती हुई नजर आती है।

मौजूदा उबाठा शिवसेना की हार को देखते हुए यही कहना पड़ेगा कि अपनी प्रखर हिंदुत्व की पहचान खो चुकी शिवसेना को मतदाताओं ने दूर कर दिया। पहले की आक्रामक, सड़कों पर उतरने वाली और “मुंबई व मुंबईकरों की आवाज” बनने वाली शिवसेना की छवि कमजोर पड़ी। सत्ता में रहते हुए भी महानगरपालिका में किए गए ठोस कार्यों का प्रभावी लेखा-जोखा मतदाताओं के सामने रखने में पार्टी असफल रही। आंतरिक मतभेद और नेतृत्व को लेकर भ्रम मतदाताओं को रास नहीं आया। पार्टी विभाजन के बाद शिवसेना के दोनों गुटों के कारण मतदाता भ्रमित हुआ। “असली शिवसेना कौन-सी?” यह सवाल आज भी शिव सैनिक और आम मतदाता के लिए स्पष्ट नहीं है और इसी भ्रमित राजनीति का परिणाम यह हुआ कि मतदाताओं ने ऐसे भ्रमित नेतृत्व को नकार दिया।
मनसे के संदर्भ में भी महाराष्ट्र की जनता के सामने एक बात स्पष्ट रही, भावनात्मक और आक्रामक प्रचार के बावजूद विकास का ठोस रोडमैप सामने नहीं था। मराठी अस्मिता, परंपरा और भावनात्मक मुद्दे पूरे प्रचार में उठाए गए, लेकिन शहरी समस्याओं के लिए भविष्यदर्शी समाधान कम नजर आए। मुद्दों की तीव्रता के बावजूद संगठनात्मक कमजोरी मनसे की पुरानी समस्या रही है। राज ठाकरे के भाषण आज भी प्रभावशाली हैं, लेकिन संगठन का विस्तार और निरंतर जमीनी काम मनसे नहीं कर पाई। चुनाव कोई आंदोलन नहीं होता, लेकिन मनसे का प्रचार कई बार आंदोलन की भाषा में ही अटका दिखा। कई सवाल उठाए गए, लेकिन “कल सत्ता मिली तो क्या करेंगे?” इसका स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया।

मुंबई जैसे महानगर में मतदाता जोखिम नहीं लेना चाहता था; उसे स्थिरता चाहिए थी। चुनाव विकल्पों का खेल होता है और जब विकल्प स्पष्ट न हो तो मतदाता सुरक्षित लगने वाले पक्ष की ओर झुकता है।
आज का महानगरीय मतदाता भावनात्मक नारों से ज्यादा सेवा, सुविधाएं और स्थिरता देख रहा था। सड़कें, पानी, यातायात, भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन और दीर्घकालीन विकास की योजना, इन पर ठोस जवाब चाहिए थे। जिस पार्टी ने ये जवाब दिए, उसी को आधुनिक और बदले हुए दृष्टिकोण वाले मुंबईकरों का समर्थन मिला। इस बदले हुए मानस को भाजपा ने सही समय पर पहचाना और उसका लाभ उठाया और उसे अपने विजय में परावर्तित किया है।
मुंबई केवल एक महानगरपालिका नहीं, बल्कि सत्ता, संपत्ति और अवसरों का केंद्र है। देश की आर्थिक राजधानी के रूप में पहचानी जाने वाली मुंबई जिस राजनीतिक शक्ति के हाथ में जाती है, उसे केवल प्रशासनिक अधिकार ही नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की मौन स्वीकृति भी मिलती है।
मुंबईकर बदल चुका है। अब वह केवल भावनात्मक नारों से प्रभावित होने वाला मतदाता नहीं रहा। घर से दफ्तर तक पहुंचने में लगने वाला समय, यातायात की परेशानी, पानी की अनियमितता, अटके हुए पुनर्विकास प्रोजेक्ट और महंगी जीवनशैली, इन सबका सामना करने वाला मतदाता एक ही सवाल पूछ रहा था… “मेरे रोजमर्रा के जीवन में वास्तविक बदलाव कौन लाएगा?” इस सवाल का ठोस उत्तर देने में शिवसेना और मनसे असफल रहीं और मुंबईकरों ने उन्हें माफ नहीं किया।
महायुति की जीत में एकनाथ शिंदे और उनकी शिवसेना की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में मतदाताओं ने भरोसे के साथ शिंदे के नेतृत्व को स्वीकार किया है। एकनाथ शिंदे की छवि शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं के बीच विशेष रूप से प्रभावी रही। ठाणे और मुंबई महानगर क्षेत्र में उनकी पकड़, स्थानीय प्रश्नों की समझ और जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद इन विशेषताओं ने उनकी शिवसेना को विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। महायुति सरकार में एकनाथ शिंदे की भूमिका सहयोगी के साथ संतुलन साधने वाले नेतृत्व की भी रही है।

भाजपा की विकास केंद्रित दृष्टिकोण और शिंदे शिवसेना की स्थानीय भावनिक पकड़ इस संयोजन ने मतदाताओं के सामने स्थिरता और कार्यक्षमता का विश्वास पैदा किया। मुंबई और ठाणे में शिवसेना (शिंदे गुट) को मिला समर्थन यह दर्शाता है कि मतदाताओं ने केवल नाम या विरासत नहीं, बल्कि निर्णयक्षमता और प्रशासनिक व्यवहार को महत्व दिया। इस विजय में एकनाथ शिंदे की भूमिका इसलिए निर्णायक मानी जाएगी क्योंकि उन्होंने महायुति को केवल संख्याबल नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और स्थानीय स्वीकार्यता प्रदान की।
भाजपा की संभावित जीत संगठनात्मक ताकत, विकास की स्पष्ट सोच और राज्य व स्थानीय नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय का परिणाम है। मुंबई महानगरपालिका चुनाव में भाजपा की संभावित जीत देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व का राजनीतिक मूल्यांकन है। यह उनके परिश्रम, नेतृत्व क्षमता और विकासोन्मुख दृष्टिकोण पर जनता की स्वीकृति है। लेकिन साथ ही यह जीत एक चेतावनी भी है, मुंबई और अन्य महानगरपालिका का आम नागरिक अब केवल आश्वासनों पर नहीं, बल्कि परिणामों पर विश्वास करेगा।
देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने मुंबई और अन्य जगहों पर जीत हासिल की है, लेकिन अब मुंबई सहित उन सभी शहरों को गढ़ने की जिम्मेदारी और चुनौती पहले से कहीं अधिक मजबूती से उनके और पार्टी के कंधों पर आ गई है। देवेंद्र फडणवीस और भाजपा सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं का अभिनंदन, नव निर्माण के लिए शुभकामनाएं।
#BMCElectionResults


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Perfect sir
चुनाव के सभी विषय लेख में सामील हैं।