फिल्म सिंघम का एक संवाद है, “जयकांत शिकरे, यह गांव मेरा है और मैं इस गांव का! लगता है- महाराष्ट्र चुनाव में भी जनता सिंघम बन कर प्रांतवाद और भाषावाद की राजनीति कर रहे ठाकरे बंधओं को ऐसा की कुछ कहना चाह रही है… आता माझी सटकली!
मुंबई सहित महाराष्ट्र के मतदाता ने यह अच्छे से बता दिया है कि अब कोई उसे बरगला और बहका नही सकता कि महाराष्ट्र में कौन रहे और कौन नहीं। उसी तरह यह मुंबई सबकी है और यहां रहने वाले सभी लोग मुंबईकर है।
महाराष्ट्र निकाय चुनाव सहित बीएमसी चुनाव पर आए नतीजे साफ संकेत दे रहे हैं कि ठाकरे बंधुओं का यूपी-बिहार वालों को गाली देना, मतदाता को पसंद नहीं आया। न तो उन्हें पूरा मराठी वोट मिला और ना ही उन्हें उत्तर भारतीयों का साथ, इसका पूरा फायदा बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ले गई। एकनाथ शिंदे पहले ही मूल शिवसेना कब्जा चुके हैं और अब दोनों ने मिलकर ठाकरे बंधुओं का गढ “मुंबई और ठाणे” भी कब्जा लिए हैं।
देश सबका है, इसी तरह मुंबई भी सबकी है। मुंबई किसी की निजी जागीर नहीं है! ऐसा लगता है कि चुनाव नतीजों से यह बात मुंबई के लोगों ने ठाकरे बंधुओं को अच्छे से समझा दी है।
मुंबई महानगर पालिका चुनाव के नतीजो के आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि बीजेपी-शिंदे गुट का अलायंस जबरदस्त जीत दर्ज कर चुका है और जो विपक्ष को बची खुची सीट मिली है, वह जबरदस्ती की है। ठाकरे बंधुओं के सबसे भरोसेमंद माने जानेवाले मराठी वोटरों ने भाजपा को भी वोट दिया है और इस वजह से भाषावाद और प्रांतवाद की राजनीति में यूपी-बिहार वालों को बाहरी बताकर निशाना लगाने वाले ठाकरे बंधुओं को घर में ही करारी शिकस्त मिल गई है। न तो उन्हें मराठियों ने पूरा प्यार दिया और ना ही बाहरी लोगों का वोट मिला।
ऐसा लग रहा है उत्तर भारतीयों और अन्य राज्यों के मतदाताओं ने एकतरफा होकर बीजेपी के पक्ष में वोटिंग की है। चुनाव के पहले राज ठाकरे ने दक्षिण भारत के भाजपा नेता अन्नामलाई पर निशाना साधते हुए अपशब्द और रसमलाई जैसी भद्दी भाषा का प्रयोग किया था, जिसका खामियाज़ा भी ठाकरे बंधुओं की जोडी को उठाना पड़ा है। अन्नामलाई तेजतर्रार पर बिल्कुल साफ सुथरी छवि के नेता है। दक्षिण भारत के लोगों ने इस बात को भी अपनी अस्मिता का सवाल समझ भाजपा की तरफ मुड़ गये।
चुनावी आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की उत्तर भारतीय विरोध की राजनीति उन पर भारी पड़ गई है। चुनाव नतीजों के मुताबिक 68% उत्तर भारतीयों ने बीजेपी-शिवसेना (शिंदे) की लीडरशिप वाले महायुति को वोट दिया है, उन पर अपना भरोसा जताया है।
वहीं उद्धव और राज ठाकरे वाले अलायंस को उत्तर भारतीयों के सिर्फ 19% वोट मिले। यह आंकड़ा साफ दिखा रहा कि किस तरह उत्तर भारतीयों का ध्रुवीकरण बीजेपी के पक्ष में हो गया और थोड़ा बहुत ही सही दक्षिण भारतीय भी भाजपा के पक्ष में रहे। यूपी-बिहार के लोगों ने एकजुट होकर उस पार्टी को चुना जिसने उन्हें सुरक्षा और सम्मान का वादा दिया। ‘गाली’ और ‘बाहरी’ (परप्रांतीय) का ठप्पा लगाने की राजनीति ने इस वोट बैंक को पूरी तरह से बीजेपी की गोद में डाल दिया है। शिवसेना का जन्म ही मराठी मानुस के नाम पर हुआ था, लेकिन एकनाथ शिंदे की बगावत और बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग ने इस किले को भी भेद दिया है।
उद्धव ठाकरे गुट को सिर्फ 49% मराठियों ने वोट किया, बीजेपी ने भी 30% की बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर ली है। 50% से कम मराठी वोट मिलना ‘मातोश्री’ के लिए चिंता का विषय है। इस चिंता का मूल राज ठाकरे के साथ पार्टी का जुड़ना रहा है। इस चुनाव में राज ठाकरे के हाथ से कुछ जाना नहीं था, उनका कुछ दांव नही लगा था, महाराष्ट्र की राजनीति में वो पहले से ही हाशिये पर है।
मनसे के सासंद, विधायक तो दूर की बात है, उनका एक नगरसेवक (पार्षद) तक नहीं है। विधानसभा चुनाव में वो अपने बेटे तक को जीता नही पाये थे। इस चुनाव में राज ठाकरे बस बैताल की तरह उद्धव ठाकरे की पीठ पर बस लदे थे, उनका कोई नुकसान नही होना था, पीठ पर लदे-लदे अगर कोई सीट मिल जाती तो सीधा-सीधा उनको फायदा ही होना था। असली हानि तो उद्धव ठाकरे की हुई है। वोटर उनके गये हैं, मनसे के वोटर तो सिर्फ नाममात्र के है।
मैं अपनी व्यक्तिगत बात करू तो कोरोना काल में प्रवासी मज़दूरों को रोकने के लिए टेलीविजन पर उद्धव ठाकरे का भावुक करने वाला भाषण और संदेश मुझे आज भी याद है, जब उन्होंने कहा था, “आप लोग मुंबई छोड़कर मत जाओ, यह मुंबई आप की भी है, हम सब इस आपदा से मिलकर लड़ेंगे, आप को किसी बात की फिक्र नही करनी चाहिए… मैं हूँ ना! यह सन्देश सुनकर मैं भी भावुक हो गया था।
महाराष्ट्र के चुनाव में शिवसेना (उबाठा) के लिए हिंदुत्व की राजनीति से मुंह मोड़ना नुकसानदायक साबित हुआ है। शिवसेना कभी हिन्दू हृदय सम्राट स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे की विचारधारा की वाहक थी, लेकिन आज उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गलबहिया करने के लिए सेक्युलर राजनीति का चोला पहन लिया, जो उसके लिए कफन साबित हो गया है।
उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी की छवि बदलने और सेक्युलर वोटरों को लुभाने की जो कोशिश की, उसका फायदा उन्हें मिला तो लेकिन वह जीत दिलाने के लिए नाकाफी था। चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि मुस्लिम वोटों का सबसे बड़ा हिस्सा (41%) कांग्रेस अलायंस के पास गया, उसके बाद उद्धव गुट (28%) को मिला, मुस्लिम वोटों का यह बंटवारा बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। उद्धव ठाकरे को मुस्लिम वोट मिले जरूर, लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपने ‘कोर हिंदुत्ववादी’ मराठी वोटर (जो बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गया) को खोकर चुकानी पड़ी। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के नेतृत्व में जिस तरह भाजपा ने प्रचंड जीत के साथ एक तरफा अपने विरोधियों का सूपड़ा साफ कर दिया, यह अभिनंदन के काबिल है।
मेरी बात करू तो इस चुनाव में भाजपा का जीत हासिल करना और शिवसेना (उबाठा) के हाथ से मुंबई की सत्ता का जाना अच्छा ही हुआ है क्योंकि इस वजह से आज नहीं तो कल देर-सबेरे अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए शिवसेना (उबाठा) को फिर से हिंदुत्व की राजनीतिक राह पर लौटना ही होगा। राजनीति में कोई अस्थाई दुश्मन, अस्थाई दोस्त नही होता। विरोधी विचारधारा के बावजूद कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के अलावा 20 साल बाद ठाकरे बंधुओं का साथ आना मेरी बात का सबसे बड़ा सुबूत है, क्या पता भाजपा और शिवसेना (उबाठा) भी फिर साथ आ जाये! मैं इस विषय पर बिल्कुल सकारात्मक हूँ।
एक बात तो तय है कि राज ठाकरे के पुराने ढर्रे की भेद-भावपूर्ण आक्रामक सड़क छाप राजनीति ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना का सबसे ज्यादा नुकसान करवाया है और हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा पर अंगद के पैर की तरह अडीग रहना भाजपा के लिए सबसे फायदेमंद रहा है। साथ ही साथ महाराष्ट्र के चुनाव ने बता दिया है कि मराठी वोटर अब सिर्फ भावनात्मक मुद्दों पर नहीं, बल्कि विकास और हिंदुत्व के नाम पर बंट गया है, जो ठाकरे बंधुओं की हार का मूल कारण है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि मुंबई अब आदरणीय बाला साहब ठाकरे के दौर वाली मुंबई नहीं रही, जहाँ केवल भावनात्मक मुद्दों पर चुनाव लड़े और जीते जाते थे। उत्तर भारतीय मतदाता अब ‘किंगमेकर’ की भूमिका में है और उन्होंने बीजेपी का राजतिलक करने का फैसला कर दिया है।
मराठी वोटों का (30%) बीजेपी के पास जाना यह बताता है कि ‘ठाकरे ब्रांड’ अब मराठी मानुस का एकमात्र ठेकेदार नहीं रहा, इस चुनाव के नतीजों ने यह बता दिया कि मुंबई में ठाकरे युग का अंत और बीजेपी के ‘अभेद्य दुर्ग’ के उदय की शुरुआत हो चुकी है।
– डॉ. धीरज फूलमती सिंह

