| सनातन काल से भारतीय अर्थव्यवस्था का चक्र विविध भव्य-दिव्य मेलों के माध्यम से चलता आ रहा है। कुम्भ मेले के बाद भारत भर में प्रयागराज का माघ मेला और हरियाणा का सूरजकुंड मेला सांस्कृतिक रूप से बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय है, जो कि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। |
भारतीय संस्कृति अनेक रंगों से भरी हुई है, यह रंग उत्सवों-मेलों और परम्पराओं के मिश्रण से एक सुंदर चित्र की भांति प्रतीत होती है। ऐसा चित्र जो संवाद करता है, जो विविधता का उत्सव मनाता है। दूर से देखने पर यह चित्र अलग-अलग प्रतीकों, चिन्हों, परम्पराओं से अलग दिखता है, परंतु विश्लेषण और सूक्ष्म दृष्टि से यह अलग रंग, अलग-अलग न होकर एक ही है। यह रंगों, विषयों की एकात्मता ही भारत को विशेष बनाती है।
माघ मेला और सूरजकुंड मेला प्रथम दृष्टया अपने स्वरूप और उद्देश्य में भिन्न प्रतीत होते हैं- एक माना जाता है धार्मिक-आध्यात्मिक मेला, तो दूसरा सांस्कृतिक-शिल्प मेला, परंतु गहराई से देखने पर दोनों ही भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और भू-सांस्कृतिक पहचान के अत्यंत सशक्त प्रतीक हैं।
माघ मेला और सूरजकुंड मेला भारत की सांस्कृतिक विरासत के दो प्रमुख उत्सव हैं। माघ मेला सबसे प्राचीनतम मेलों में से एक है जिसका आयोजन सरस्वती, गंगा और यमुना के संगम प्रयागराज पर होता है। दूसरी ओर सूरजकुंड मेला माघ मेले के अपेक्षाकृत आधुनिक समय का है। सूरजकुंड का निर्माण 10वीं शताब्दी के तोमर वंश के राजा सूरजपाल ने करवाया था, पर इस ऐतिहासिक स्थान पर अंतरराष्ट्रीय मेले की शुरुआत 1987 ई. में हुई थी। मेले का उद्देश्य भारत की लोक कला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ाना था।
ये मेले पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस्कृतिक हस्तांतरण के माध्यम हैं, जहां परम्पराएं जीवित रहती हैं और परिवर्तित होती हैं। साथ ही, ये आयोजन व्यक्ति को भारतीय संस्कृति और भूगोल से जोड़ते हुए स्थानीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान में परिवर्तित करते हैं। प्राचीन परम्पराओं और आधुनिक व्यवस्थाओं का यह सुंदर संगम भारत की जीवंत और गतिशील सभ्यता को प्रतिबिम्बित करता है।
भारतीय संस्कृति या यूं कहा जाए विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य का एक प्रमुख महत्व था। वर्तमान विश्व की प्राचीन संस्कृतियां और सभ्यताएं समाप्त हो चुकी हैं, परंतु भारत अभी भी प्राचीनता के शीर्ष पर अपने रंग को बनाए हुए हैं। प्रयाग का माघ मेला उसी प्राचीनता का प्रतीक है और हरियाणा का सूरजकुंड मेला उस प्राचीनता के कणों को भविष्य में ले जानेवाला महत्वपूर्ण स्तम्भ है।
सूर्य को केंद्र में रखते हुए दोनो मेलों के पीछे वैज्ञानिकता का आधार भी दिखाई देता है। माघ मेला मकर संक्रांति के समय होता है- जब सूर्य उत्तरायण होता है। इस काल में ऋतु का शीत से बसंत की ओर संक्रमण होता है।
दूसरी ओर सूरजकुंड एक प्राचीन जल-संग्रह प्रणाली है, जो वर्षा जल संचयन का उत्कृष्ट उदाहरण है। सूरजकुंड की बनावट में सूर्य की गति और प्रकाश को ध्यान में रखा गया है। हालांकि इससे भी महत्वपूर्ण इन मेलों का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव है।
समाज में विविधता और रंगों से भरे ये मेले सकारात्मता को सक्रिय करते हैं, जिससे न केवल मानसिक प्रसन्नता बढ़ती है बल्कि सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है। ये मेले भारतीय संस्कृति में आस्था और विज्ञान के सुंदर समन्वय का प्रतीक हैं। यह मेले समाजिक समरसता के अनुपम प्रतीक हैं, जो न केवल लोकनृत्य, लोक संगीत, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों और पारम्परिक वस्तुओं को बढ़ावा देते हैं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को भी प्रोत्साहित करते हैं।
ये मेले ऐतिहासिक या सांस्कृतिक आयोजन मात्र नहीं हैं अपितु ये भारत की स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भी एक ब़ड़ी भूमिका निभाते हैं। इन मेलों के दिनों के दौरान अस्थाई रूप से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है। पारम्परिक उद्योग और शिल्पों में मेले जान फूंकते हैं और इस दौरान सेवा क्षेत्र को भी एक बड़ा प्रोत्साहन मिलता है।
इन मेलों के कारण आसपास के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश और अवसंरचना विकास भी होता है, जो मेला समाप्त होने के पश्चात क्षेत्रीय विकास में भी सहायक होता है। ये मेले कारीगरों को सीधे उपभोक्ता से जोड़कर मध्यस्थों की भूमिका कम करते हैं।
साथ ही अंतराष्ट्रीय सहभागिता से भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान और निर्यात के अवसर देते हैं। इन मेलों के माध्यम से बड़ी संख्या में महिला कारीगर और स्वयं सहायता समूह आर्थिक रूप से सशक्त होते हैं। ये मेले सांस्कृतिक पूंजी का आर्थिक पूंजी में रूपांतरण करके संस्कृति आधारित आर्थिक विकास के वैश्विक मंच की तरह उभर रहे हैं। मेला काल में प्राकृतिक ऋतु-चक्र के अनुसार जीवन-पद्धति, सीमित उपभोग, सादा भोजन और संयम पर्यावरणीय संतुलन की भारतीय सोच को दर्शाते हैं।
दोनों मेले यह संदेश देते हैं कि मानव जीवन प्रकृति से अलग नहीं है। नदियां, सूर्य, जल, भूमि और ऋतु-सभी के साथ सामंजस्य स्थापित कर ही समाज का विकास सम्भव है। इस प्रकार माघ मेला और सूरजकुंड मेला भारतीय संस्कृति में निहित पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति-आधारित जीवन दृष्टि के सशक्त प्रतीक हैं।

खुले प्राकृतिक वातावरण में मेले का आयोजन, स्थानीय सामग्री का प्रयोग और पारम्परिक हस्तशिल्प का प्रदर्शन सतत विकास की अवधारणा को बढ़ावा देता है। साथ ही दोनों मेले पर्यावरणीय सह-अस्तित्व की भारतीय सोच को दर्शाते हैं। ये मेले भारत के समग्र, सतत और मानवीय विकास मॉडल के सजीव उदाहरण हैं। माघ मेला और सूरजकुंड मेला ऐसे समावेशी मंच हैं जहां संस्कृति पहचान देती है, अर्थव्यवस्था सम्बल देती है, समरसता समाज को जोड़ती है और पर्यावरण संतुलन सिखाता है।
- शिवा पंचकरण

