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बजट: विकसित भारत की नींव

बजट: विकसित भारत की नींव

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग
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बजट से पूर्व प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण ने सरकार की सोच और नीति-दृष्टि के कई संकेत दिए हैं। इसमें विकास को केवल आंकड़ों की वृद्धि तक सीमित न रखकर अवसरों के विस्तार, समावेशी विकास और दीर्घकालिक स्थिरता पर जोर दिया गया है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद के पटल पर प्रस्तुत किया जाने वाला बजट केवल आय-व्यय का वार्षिक लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि वह देश की आर्थिक दिशा, सामाजिक प्राथमिकताओं और भविष्य की संभावनाओं का दर्पण होता है।

आज जब भारत एक ओर तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में विश्व मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है और दूसरी ओर वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों, जलवायु संकट और तकनीकी परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब यह बजट और भी अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।

व्यक्तिगत नागरिक से लेकर व्यापारी, उद्योगपति, किसान, श्रमिक, युवा और मध्यम वर्ग- सभी की निगाहें इस बजट पर टिकी हैं, क्योंकि इससे न केवल वर्तमान वर्ष की आर्थिक तस्वीर, बल्कि “भविष्य के भारत” की झलक भी मिलती है।

बजट से पूर्व प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण ने सरकार की सोच और नीति-दृष्टि के कई संकेत दिए हैं। इसमें विकास को केवल आंकड़ों की वृद्धि तक सीमित न रखकर अवसरों के विस्तार, समावेशी विकास और दीर्घकालिक स्थिरता पर जोर दिया गया है।

यह स्वीकार किया गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां अवश्य हैं, किंतु उनसे अधिक संभावनाएं हैं। यही दृष्टिकोण इस बजट का मूल स्वर होना चाहिए- चुनौतियों को अवसरों में बदलने का साहसिक प्रयास।

सबसे पहली और महत्वपूर्ण अपेक्षा निम्न वर्ग की क्रय-शक्ति बढ़ाने को लेकर है। किसी भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती तभी आती है जब उसके सबसे निचले पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी सम्मानजनक जीवन जी सके और उपभोग में भागीदार बने।

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यदि निम्न आय वर्ग की आय बढ़ती है, उसे सस्ती और सुलभ सुविधाएं मिलती हैं, तो उसका सीधा प्रभाव मांग पर पड़ता है और मांग बढ़ने से उत्पादन, निवेश और रोजगार-तीनों को गति मिलती है। इसलिए इस बजट में प्रत्यक्ष नकद अंतरण, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च के साथ-साथ रोजगार सृजन के ठोस उपाय अपेक्षित हैं।

मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का सुदृढ़ीकरण, शहरी गरीबों के लिए भी समान प्रकृति की योजनाएं और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

शहरी विकास इस बजट का एक और प्रमुख केंद्र होना चाहिए। भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है और शहरों पर जनसंख्या, आवास, परिवहन, जल, स्वच्छता और पर्यावरण का दबाव लगातार बढ़ रहा है। केवल बड़े महानगरों पर निर्भरता अब व्यावहारिक नहीं रही।

विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा द्वारा सुझाया गया शहरी विकेंद्रीकरण का विचार आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। छोटे और मध्यम शहरों को आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाना, उद्योगों और सेवाओं को वहां प्रोत्साहित करना, न केवल महानगरों पर बोझ कम करेगा बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन को भी घटाएगा।

बजट में यदि टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए विशेष शहरी अवसंरचना पैकेज, परिवहन नेटवर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी और कौशल विकास योजनाएं लाई जाती हैं, तो यह दूरगामी परिवर्तन का आधार बन सकता है।

वैश्विक स्तर पर टैरिफ, व्यापार अवरोध और संरक्षणवाद की प्रवृत्तियां भारत के लिए चुनौती भी हैं और अवसर भी। अजय बंगा का यह कथन कि टैरिफ पर अधिक चिंता करने के बजाय व्यापारिक अवसरों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, भारत की वर्तमान स्थिति के लिए उपयुक्त दृष्टि प्रदान करता है।

भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या, डिजिटल क्षमताएं और उद्यमशीलता की प्रबल ऊर्जा है। यदि यह बजट निर्यात-उन्मुख उद्योगों, स्टार्ट-अप्स, मैन्युफैक्चरिंग और वैल्यू-एडेड सेक्टर को प्रोत्साहन देता है, तो भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में और मजबूत स्थान बना सकता है।

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‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को केवल नारों से आगे ले जाकर व्यावहारिक नीति समर्थन की आवश्यकता है- सरल कर संरचना, आसान ऋण, अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश और व्यापार करने में सुगमता के माध्यम से।
इस संदर्भ में मध्यम वर्ग की भूमिका को नजरअंदाज करना आर्थिक दृष्टि से आत्मघाती होगा।

मध्यम वर्ग किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है-वह सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है और सबसे बड़ा करदाता भी। विडंबना यह है कि बजट चर्चाओं में अक्सर यही वर्ग अपेक्षाकृत उपेक्षित रह जाता है।

बढ़ती महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च, आवास ऋण और करों का बोझ मध्यम वर्ग की बचत और उपभोग दोनों को प्रभावित करता है। यदि इस बजट में आयकर स्लैब में तर्कसंगत सुधार, शिक्षा-स्वास्थ्य पर कर राहत और आवास को प्रोत्साहन जैसे कदम उठाए जाते हैं, तो इससे न केवल मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी बल्कि मांग-आधारित विकास को भी बल मिलेगा।

उद्योगों और व्यापार जगत के लिए बजट से अपेक्षा है कि वह स्थिर और पूर्वानुमेय नीति वातावरण प्रदान करे। निवेशक अनिश्चितता से डरते हैं। कर नीति में बार-बार बदलाव, अनुपालन की जटिलता और नियामक अस्पष्टता निवेश को बाधित करती है।

इस बजट में यदि दीर्घकालिक कर-नीति का स्पष्ट संकेत, एमएसएमई सेक्टर के लिए सस्ता ऋण, तकनीकी उन्नयन के लिए प्रोत्साहन और हरित उद्योगों के लिए विशेष पैकेज दिए जाते हैं, तो यह उद्योगों के आत्मविश्वास को बढ़ाएगा। विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र, जो रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है, उसे आर्थिक पुनरुत्थान का केंद्र बनाया जाना चाहिए।

भविष्य के भारत की कल्पना केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं हो सकती। इसमें पर्यावरणीय स्थिरता, सामाजिक न्याय और मानवीय विकास समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हरित ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन और टिकाऊ कृषि को बजट में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि नए उद्योगों और रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा। शिक्षा और कौशल विकास में निवेश भविष्य की कार्यशक्ति को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा, जबकि स्वास्थ्य पर खर्च एक स्वस्थ और उत्पादक समाज की नींव रखेगा।

अंततः यह बजट एक संतुलन की परीक्षा है- राजकोषीय अनुशासन और विकासात्मक खर्च के बीच, अल्पकालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों के बीच, तथा विभिन्न वर्गों की अपेक्षाओं के बीच।

यदि यह बजट निम्न वर्ग की क्रय-शक्ति बढ़ाने, मध्यम वर्ग को राहत देने, शहरी विकेंद्रीकरण को गति देने और वैश्विक चुनौतियों को अवसरों में बदलने की स्पष्ट दिशा देता है, तो यह केवल एक वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि “विकसित भारत” की ओर बढ़ते कदम का घोषणापत्र बन सकता है।

देश को आज ऐसे ही बजट की आवश्यकता है- जो आशा जगाए, विश्वास पैदा करे और भविष्य के प्रति एक सकारात्मक, साहसिक दृष्टि प्रस्तुत करे।

– ललित गर्ग

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Tags: #Budget2026 #FinancialPlanning #SmartSpending #FutureFinance #WealthManagement #SavingsGoals #InvestInYourself #EconomicGrowth #FiscalResponsibility #MoneyMatters

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