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बंगाल में सत्ता परिवर्तन सम्भव 

बंगाल में सत्ता परिवर्तन सम्भव 

by हिंदी विवेक
in फरवरी 2026, राजनीति, विषय
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भाजपा धार्मिक ध्रुवीकरण, हिंदू एकता, महिला अस्मिता एवं सुरक्षा और राष्ट्रवाद पर दांव लगा रही है, जबकि टीएमसी सॉफ्ट हिंदुत्व और मुस्लिम तुष्टीकरण, डर-धमकी सहित विकास योजनाओं से मुकाबला कर रही है। ममता की जमीनी पकड़ और भाजपा का संगठनात्मक विस्तार चुनाव को रोचक बनाएंगे।

पश्चिम बंगाल की राजनीति भारतीय लोकतंत्र की सबसे जीवंत और जटिल प्रयोगशालाओं में से एक रही है। यहां विचारधाराएं, सामाजिक संरचनाएं और सांस्कृतिक पहचान हमेशा से राजनीतिक संघर्ष का केंद्र रही हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीनों दूर हैं और राज्य का राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।

मुख्य प्रश्न यही है कि क्या धार्मिक ध्रुवीकरण निर्णायक सिद्ध होगा या जागरूक मतदाता सुरक्षा, विकास, अर्थव्यवस्था और शासन जैसे मुद्दों पर फोकस करके समीकरण बदल देंगे? जनवरी 2026 की शुरुआत में जारी विभिन्न ओपिनियन पोल और राजनीतिक विश्लेषणों से संकेत मिलता है कि चुनाव बहुआयामी होगा, जहां पहचान की राजनीति और व्यावहारिक मुद्दे दोनों ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

बंगाल की राजनीति लम्बे समय तक वामपंथी विचारधारा और वर्ग संघर्ष पर आधारित रही। 1977 से 2011 तक 34 वर्षों का वाम मोर्चा शासन भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार और सामाजिक समानता पर केंद्रित था। उस दौर में धार्मिक पहचान राजनीति के हाशिए पर थी। 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सत्ता प्राप्त की और राजनीति का स्वरूप बदलने लगा। मुस्लिम तुष्टीकरण के अंतर्गत अल्पसंख्यक कल्याण, पहचान-आधारित योजनाएं और लोकलुभावन नीतियां मुख्यधारा में आईं।

2021 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की आक्रामक राजनीति अपनाई, जिससे राज्य में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण तेज हुआ। भाजपा ने 41% वोट और 77 सीटें जीतीं, पर सत्ता से दूर रही। यह चुनाव बंगाल में ध्रुवीकरण की शुरुआत थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घटकर 12 रह गईं, पर वोट शेयर 38-39% के आसपास रहा, जो दर्शाता है कि उसका जनाधार स्थिर है। अब 2026 में यह ध्रुवीकरण और गहरा होता दिख रहा है, खासकर बांग्लादेश की घटनाओं के प्रभाव से।

2026 के चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण मुख्य हथियार बन सकता है। भाजपा के नेता खुलकर हिंदू एकता की अपील कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने कहा है कि हिंदुओं को एकजुट होकर भाजपा को वोट देना चाहिए, वरना बंगाल बांग्लादेश बन जाएगा। रा. स्व. संघ की संगठनात्मक सक्रियता बढ़ी है, सोशल मीडिया पर हिंदू एकता के नारे वायरल हो रहे हैं। राज्य की जनसंख्या संरचना इस रणनीति को मजबूत बनाती है- 70% हिंदू, जबकि मुस्लिम 27%। मतुआ समुदाय जैसे हिंदू दलित ग्रुप 30-40 सीटों पर निर्णायक हैं और नागरिकता संशोधन कानून के जरिए भाजपा ने उन्हें साधने का प्रयास किया है।

Leader of Opposition Suvendu Adhikari Files Contempt Petition Against WB Speaker Over CM's Security Entry | DD News On Air

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हिंसा के समाचार बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे मुर्शिदाबाद में तनाव बढ़ा रहे हैं। भाजपा इसे घुसपैठ और डेमोग्राफी बदलाव से जोड़कर प्रचारित कर रही है। गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा कि टीएमसी वोटबैंक के लिए घुसपैठ को बढ़ावा दे रही है और भाजपा सत्ता में आई तो बॉर्डर सुरक्षित करेगी। भाजपा ने राज्य को 6 जोन में बांटकर संगठन मजबूत किया है और सभी 294 सीटों पर लड़ने की तैयारी है।

हालांकि अब ओपिनियन पोल दिखाते हैं कि 18.5% वोटर अनिर्णित हैं और वे असमंजस की स्थिति में हैं।

एक समय बंगाल कांग्रेस की जन्मभूमि था, किंतु अब वह अप्रासंगिक हो चुकी है। 2021 में वाम मोर्चा ने एक भी सीट नहीं जीती। 2024 लोकसभा में भी उनका प्रदर्शन कमजोर रहा। भाजपा अब मुख्य विपक्ष है और वाम-कांग्रेस का पतन ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहा है। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि बंगाल टीएमसी और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय हो रहा है। हालांकि हुमायूं कबीर जैसे नेता वाइल्डकार्ड बन सकते हैं, जो मुस्लिम वोट बांट सकते हैं। भाजपा की चुनौती के उत्तर में ममता बनर्जी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर बढ़ रही हैं। महाकाल मंदिर निर्माण, गंगासागर पुल, कालीघाट दौरे और राम नवमी में भागीदारी जैसे कदम हिंदू वोटरों को साधने के प्रयास हैं। 2021 में चंडीपाठ ने उन्हें लाभ दिया था। अब ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी योजनाओं को हिंदू महिलाओं से जोड़ा जा रहा है।

West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee May Visit Delhi In February To Protest Against Special Intensive Revision SIR: Sources

टीएमसी की जमीनी पकड़ मजबूत है और वह मुस्लिम तुष्टीकरण के साथ विकास पर फोकस कर रही है। ओपिनियन पोल में टीएमसी को 39.6% वोट मिलने का अनुमान है, जबकि भाजपा को 30.5%। ममता का काम (29%) वोटिंग का मुख्य फैक्टर है, खासकर मुस्लिम और सामान्य वर्ग में। हालांकि वोटर फटिग और राजनीतिक हिंसा के आरोप चुनौती हैं। चुनाव आयोग की विशेष मतदाता सूची संशोधन (सीआईआर) पर टीएमसी और भाजपा में विवाद है, जहां तृणमूल कांग्रेस इसे अपने लाभ में बदल सकती है।

बांग्लादेश की अस्थिरता बंगाल की राजनीति को प्रभावित कर रही है। हिंदू हिंसा के समाचार हिंदू वोटरों को ध्रुवीकृत कर रही हैं। भाजपा इसे ‘बंगाल को बांग्लादेश बनने से बचाने’ का नारा दे रही है। सीमावर्ती जिलों में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा है, जो चुनावी मनोविज्ञान को बदल सकता है।

बंगाल का मतदाता शिक्षित और राजनीतिक रूप से सजग रहा है। युवा (30% वोटर) डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं और फेक न्यूज पहचानते हैं। ओपिनियन पोल में विकास/मुद्दे (13%) और लीडरशिप (18%) मुख्य फैक्टर हैं। युवा लीडरशिप पर फोकस करते हैं, जबकि वरिष्ठ नागरिक सरकार के काम पर। यदि ध्रुवीकरण उग्र हुआ तो बैकलैश हो सकता है। 2021 में स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था ने ध्रुवीकरण को पीछे धकेला था। अब रोजगार, शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था मुख्य मुद्दे हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं, जो टीएमसी के विरुद्ध जा सकता है।

वोट वाइब सर्वे में ममता आगे हैं, पर अनिर्णित वोटर समीकरण बदल सकते हैं। सी-वोटर अनुमान में तृणमूल कांग्रेस 46% वोट के साथ आगे है और भारतीय जनता पार्टी 40% पर मजबूत।

यह चुनाव न केवल बंगाल की दिशा तय करेगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करेगा। यदि भाजपा के 2/3 बहुमत का दावा साकार हुआ तो सत्ता परिवर्तन सम्भव है अन्यथा अप्रत्याशित परिणाम आएंगे। बंगाल भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है, जहां मतदाता का निर्णय सर्वोपरि है।

 

– डॉ. संतोष झा

 

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