| पश्चिम में समुदाय-आधारित जीवन का उभार और भारत की कुटुम्ब व्यवस्था एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं- मनुष्य अकेले फल-फूल नहीं सकता। भारत यदि इस सत्य को आधुनिक भाषा में दुनिया के सामने रख सके तो वह केवल अपने समाज का नहीं बल्कि वैश्विक भविष्य का मार्गदर्शन कर सकता है। |
समुदाय-आधारित जीवन या कम्युनिटी लिविंग आज पश्चिमी दुनिया में एक नई खोज की तरह उभर रहा है, जबकि भारत के सामाजिक इतिहास में यह जीवन का स्वाभाविक ढांचा रही है। मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है- उसका मानसिक संतुलन, भावनात्मक सुरक्षा और जीवन की सार्थकता सम्बंधों से बनती है। फिर भी आधुनिक पश्चिमी समाज एक ऐसे दौर से गुजरा जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी स्पेस और आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च मूल्य मान लिया गया।
परिणामस्वरूप पारम्परिक समुदाय कमजोर होते गए और व्यक्ति भीतर ही भीतर अकेला पड़ता चला गया। आज जब उसी समाज में अकेलापन, अवसाद, वृद्धावस्था की असुरक्षा और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याएं गम्भीर रूप ले चुकी हैं तब कम्युनिटी लिविंग को भविष्य की आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है।
औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिमी देशों में तीव्र शहरीकरण हुआ। रोजगार और अवसरों ने लोगों को छोटे समुदायों से महानगरों की ओर खींचा। संयुक्त परिवार टूटे, पीढ़ियां अलग-अलग घरों में बसने लगीं और न्युक्लियर फैमिली आधुनिक जीवन का प्रतीक बन गई।
शुरुआत में यह मॉडल सफल भी रहा- लोगों को स्वतंत्रता मिली, महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिले, किंतु समय के साथ इसके सामाजिक और मानसिक दुष्परिणाम सामने आए।
आज विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में लगभग 16% लोग अकेलेपन का अनुभव करते हैं और अकेलापन अब एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में पहचाना जा रहा है। अकेलापन केवल भावनात्मक समस्या नहीं है; यह अवसाद, हृदय रोग और जीवन-संतोष में कमी से जुड़ा पाया गया है। पश्चिमी समाज में युवा डिजिटल रूप से जुड़े हैं, पर भावनात्मक रूप से अलग-थलग। बुजुर्ग लम्बी आयु तो जी रहे हैं, पर सामाजिक सहभागिता के बिना।
इसी पृष्ठभूमि में पश्चिम में co-livingspaces, multi generartional housing and community homes जैसी अवधारणाएं उभर रही हैं। इनका उद्देश्य संसाधनों को साझा करना, भावनात्मक सहयोग बढ़ाना और सामाजिक अकेलेपन को कम करना है। यह वास्तव में उस सामुदायिक जीवन को नए ढंग से पुनर्स्थापित करने का प्रयास है, जो कभी मानव समाज का मूल था। यहीं भारत की कुटुम्ब व्यवस्था की प्रासंगिकता सामने आती है। भारतीय संयुक्त परिवार केवल एक साथ रहने की व्यवस्था नहीं थे बल्कि एक जीवन-दर्शन थे। कुटुम्ब का भाव केवल रक्त-सम्बंधों तक सीमित नहीं था बल्कि उसमें उत्तरदायित्व, त्याग और सामूहिक कल्याण निहित था। भारतीय दृष्टि को एक श्लोक अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है-
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
– महाउपनिषद्
अर्थात् यह मेरा है, वह पराया है- ऐसी गणना संकीर्ण बुद्धि वालों की होती है; उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है। यही भाव भारतीय कुटुम्ब व्यवस्था की आत्मा रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में कुटुम्ब की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। संयुक्त परिवार भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करते थे-जहां व्यक्ति अपनी असफलताओं, तनाव और उलझनों को साझा कर सकता था। आधुनिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मजबूत पारिवारिक समर्थन प्रणाली अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं के संकट को कम करती है। भारत में किए गए अध्ययनों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में लगभग 43% लोग अकेलापन महसूस करते हैं, जबकि संयुक्त या विस्तृत परिवारों में रहने वाले लोगों में यह प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से कम पाया गया है।
शराब-सेवन और घरेलू हिंसा जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी कुटुम्ब व्यवस्था का सकारात्मक प्रभाव देखा गया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़े बताते हैं कि जहां सामाजिक निगरानी और पारिवारिक सहभागिता मजबूत है, वहां अत्यधिक शराब-सेवन और उससे जुड़ी घरेलू हिंसा की घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं। संयुक्त परिवारों में सामाजिक नियंत्रण और नैतिक दबाव के कारण नशे की लत एवं हिंसक व्यवहार को सहज स्वीकृति नहीं मिलती। इसके विपरीत एकल या सामाजिक रूप से अलग-थलग जीवनशैली में आत्म-नियंत्रण कमजोर पड़ता है, जिससे शराब-सेवन और घरेलू तनाव बढ़ने की सम्भावना अधिक होती है।
बुजुर्गों के संदर्भ में कुटुम्ब व्यवस्था मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की मजबूत आधारशिला रही है। विश्व स्तर पर आज लगभग 25-28% बुजुर्ग (60+ आयु) अकेलेपन या सामाजिक अलगाव का सामना कर रहे हैं- अर्थात हर चार में से एक बुजुर्ग इस संकट से जूझ रहा है।
डब्ल्यूएचओ चेतावनी देता है कि 2030 तक दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति 60 वर्ष से अधिक आयु का होगा, जिससे अकेलापन और सामाजिक अलगाव एक गम्भीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकता है। इसके विपरीत भारत की कुटुम्ब व्यवस्था ने बुजुर्गों को केवल सुरक्षित ही नहीं रखा बल्कि उन्हें परिवार की निर्णय-प्रक्रिया और बच्चों के संस्कार व मार्गदर्शन में सक्रिय भूमिका देकर जीवन का उद्देश्य और सम्मान भी प्रदान किया है।
नैतिक शिक्षा के क्रम में कुटुम्ब व्यवस्था का प्रभाव केवल व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह नागरिक चेतना और राष्ट्र-निर्माण की नींव रखता है। परिवार ही वह पहली पाठशाला है जहां व्यक्ति अनुशासन, सह-अस्तित्व, कर्तव्यबोध और उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को व्यवहार में सीखता है। यही संस्कार आगे चलकर उसे एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं, जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझता और निभाता है।
संयुक्त परिवारों में संसाधनों का साझा उपयोग, बुजुर्गों का सम्मान और कमजोर सदस्यों की देखभाल- ये सभी गुण नागरिक चेतना और सामाजिक संवेदनशीलता को मजबूत करते हैं। पश्चिम में आज जिस कम्युनिटी लिविंग को सामाजिक पुनर्निर्माण के साधन के रूप में देखा जा रहा है, वही सिद्धांत भारत की कुटुम्ब व्यवस्था में अंतर्निहित रहा है। अंतर केवल इतना है कि भारत में यह स्वाभाविक था, जबकि पश्चिम में इसे योजनाबद्ध मॉडल के रूप में अपनाया जा रहा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी कुटुम्ब व्यवस्था को अतीत की स्मृति न बनाकर, आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करे। इसमें महिलाओं का सशक्तिकरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खुला संवाद और आपसी सम्मान अनिवार्य हैं। यदि संयुक्त परिवार की मूल भावना-साझा जिम्मेदारी, भावनात्मक जुड़ाव और सांस्कृतिक निरंतरता को आधुनिक जीवनशैली के साथ जोड़ा जाए तो यह न केवल मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्थिरता और नैतिक नागरिकता को मजबूत करेगा बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को भी सुदृढ़ करेगा।
–डॉ. शिवानी कटारा

