| जब कोई हिंदू अपना धर्म छोड़कर विदेशी मजहब ग्रहण करता है तब वह ए. आर. रहमान जैसा असहिष्णु और कट्टर बन जाता है। उसे हिंदू समाज कितने भी सर आंखों पर बिठा ले, किंतु आस्तीन के सांप की तरह वह अवश्य डंसता है। बॉलीवुड में कला की आड़ में ‘वैचारिक कट्टरता’ कोई नई बात नहीं है। |
भारतीय संगीत जगत में ए.आर. रहमान को एक ’सूफी’ संगीतकार और सहिष्णु कलाकार की छवि दी गई। उन्हें धर्म की सीमाएं तोड़ने वाले सूफीवाद के अनुयायी के रूप में पेश किया गया, किंतु हिंदू जन्म, तिलक का अपमान, बुर्का का समर्थन, पक्षपातपूर्ण बहिष्कार और बीबीसी पर साम्प्रदायिक रोना- यह सब उनके असली चेहरे को उजागर करता है। अभिनेत्री कंगना रनौत के आरोपों से लेकर जावेद अख्तर और शान का खंडन तक, एक पैटर्न साफ दिखता है। ’कला’ की आड़ में ’वैचारिक कट्टरता’।
तिलक का अपमान : अपनी हिंदू जड़ों से कटाव
ए.आर. रहमान (अल्ला रक्खा रहमान) का जन्मनाम दिलीप कुमार राजगोपाला दीक्षितमुलु था। हिंदू परिवार में पैदा हुए रहमान के पिता आर.के. शेखर तमिल सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। 1980 के दशक में माता के प्रभाव से उन्होंने इस्लाम अपनाया और सूफीवाद की ओर झुके। फिर भी 2019 में जब प्रसिद्ध तमिल गीतकार पिरैसूदन को उन्होंने अपने घर आमंत्रित किया, तो वहां उपस्थित रहमान के परिवार ने सख्त शर्त रखी- यदि घर के अंदर आना है, तो माथे से विभूति और कुमकुम का तिलक मिटाना होगा। पिरैसूदन ने स्वयं ’द हिंदू’ को दिए साक्षात्कार में इस अपमान का विवरण दिया। रहमान ने इस घटना पर आज तक चुप्पी साधी हुई है।
विभूति शिवभक्ति का प्रतीक है, जिसे शिव पुराण में भस्म रूप में वर्णित किया गया है। कुमकुम शक्ति आराधना का चिन्ह है, जो देवी महात्म्य से जुड़ा है। हिंदू जड़ों वाला कलाकार सनातन प्रतीकों को क्यों ठुकराए? जिस भारत ने हिंदू दिलीप को ’मुस्लिम रहमान’ बनाया और विश्वविख्यात संगीतकार का दर्जा दिया, उसी के मूल प्रतीकों से रहमान को इतनी घृणा क्यों है? पिरैसूदन ने उस अपमान के बाद रहमान के साथ कभी सहयोग न किया। यह घटना रहमान की कथित सहिष्णुता पर पहला करारा प्रहार थी।
प्रगतिशीलता का ढोंग : बुर्का पसंद, तिलक से घृणा
रहमान आधुनिकता, तकनीक और वैश्विक नागरिकता का दावा करते हैं, किंतु उनकी यह प्रगतिशीलता उनके अपने घर की महिलाओं पर लागू नहीं होती। रहमान की उच्च शिक्षित बेटी खतीजा (हार्वर्ड ग्रेजुएट) जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सर से पांव तक भारी बुर्के और नकाब में दिखाई देती हैं तो दुनिया दंग रह जाती है। 2023 के दुबई कॉन्सर्ट में खतीजा का यह रूप देखकर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने प्रश्न उठाया था कि शिक्षित महिला को पर्दे में रखना रूढ़िवादी है। रहमान का उत्तर था- यह व्यक्तिगत पसंद है।
यहीं प्रश्न स्वाभाविक है- छोटा सा तिलक मिटाने की शर्त रखने वाले रहमान को पूरा शरीर ढकने वाला बुर्का ’पसंद’ कैसे लगता है? क्या प्रगतिशीलता का अर्थ केवल सनातन प्रतीकों का विरोध करना है? एक ओर हिंदू कलाकार की धार्मिक पहचान मिटाने की मांग और दूसरी ओर अपनी बेटी का कट्टर मजहबी पहचान में लिपटे रहना- यह दोहरा मापदंड उनकी आधुनिकता को खोखला सिद्ध करता है।
’छावा’ और ’इमरजेंसी’: वैचारिक पक्षपात का प्रमाण
हाल ही में एक साक्षात्कार में रहमान ने छत्रपति सम्भाजी महाराज के जीवन पर आधारित फिल्म छावा को ’विवादास्पद’ कहा। सम्भाजी महाराज, जिन्होंने औरंगजेब की क्रूर यातनाएं सहीं, पर अपना धर्म नहीं बदला। ऐसे महानायक का गौरवशाली इतिहास रहमान को विवादास्पद क्यों लगा?
वहीं दूसरी ओर कंगना रनौत ने गम्भीर आरोप लगाया है कि जब उन्होंने अपनी फिल्म इमरजेंसी के लिए रहमान से सम्पर्क किया तो उन्होंने न केवल संगीत देने से मना किया बल्कि मिलने तक का शिष्टाचार नहीं दिखाया। कंगना ने जनवरी 2025 की एक पोस्ट में बताया कि रहमान ने उनका फोन तक नहीं उठाया। यह चयनात्मक पक्षपात सिद्ध करता है कि रहमान उन प्रोजेक्ट्स से कतराते हैं जो प्रखर राष्ट्रवादी हिंदू गौरव की विचारधारा से जुड़े हों।
’विक्टिम कार्ड’ और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का अपमान
बीबीसी को दिए 2024 के एक साक्षात्कार में रहमान ने कहा कि पिछले 8 वर्षों में सत्ता का संतुलन बदला है और ’साम्प्रदायिक’ कारणों से उन्हें बॉलीवुड में कम काम मिल रहा है। यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा है।
तथ्य यह है कि मोदी सरकार के दौरान ही रहमान को 7 में से 3 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं और 2019 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
बॉलीवुड में काम न मिलना उनकी घटती लोकप्रियता या व्यावसायिक विवादों का परिणाम हो सकता है, धर्म का नहीं। विदेशी मीडिया में भारत को ’असहिष्णु’ दिखाने का यह प्रयास केवल एक ’विक्टिम नैरेटिव’ सेट करने का प्रयास है।
रहमान हों या ’खान बंधु’ (शाहरुख, सलमान, आमिर) या अन्य मुस्लिम कलाकार इनकी वैश्विक सफलता के पीछे भी 80 प्रतिशत हिंदू दर्शकों का ही योगदान है। हिंदू समाज ने कभी कलाकार का मजहब नहीं देखा। यदि देखा होता तो आज रहमान या खान बंधु इस शिखर पर न होते। जब तक रहमान ’दिलीप’ थे तब भी और जब वे ’रहमान’ बने तब भी, हिंदुओं ने उन्हें वही प्यार दिया। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को ’असहिष्णु’ बताना केवल एक ’विक्टिम नैरेटिव’ सेट करने का प्रयास है।
अपनों का खंडन : संगीतकारों ने दिखाया दर्पण
रहमान के ’साम्प्रदायिकता’ वाले दावों की हवा तब निकल गई जब उन्हीं के क्षेत्र के दिग्गजों ने उन्हें आईना दिखाया।
जावेद अख्तर : मुंबई इंडस्ट्री में कभी साम्प्रदायिक माहौल महसूस नहीं हुआ। रहमान का कद इतना बड़ा है कि लोग उनसे सम्पर्क करने से डरते हैं।

गायक शान : संगीत में साम्प्रदायिकता नहीं है। यदि होती तो खान तिकड़ी सुपरस्टार न होती। रहमान को ऐसा नहीं सोचना चाहिए।

शंकर महादेवन : संगीत में निर्णय हुनर और मार्केटिंग के आधार पर होते हैं, धर्म के आधार पर नहीं। अपनों का यह पलटवार रहमान के झूठे नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त करता है।

गहरे षड्यंत्र का उपकरण?
तिलक का अपमान, हिंदू नायकों को विवादास्पद बताना, विक्टिम कार्ड खेलना और संदिग्ध संगठनों की जांच में नाम आना। यह सब एक गहरी वैचारिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। रहमान ’फकीर’ होने का दावा करते हैं, किंतु पिरैसूदन का तिलक उन्हें चुभता है। हिंदू जड़ें भूलकर सनातन का विरोध करना उनकी नई पहचान बन गई है। तिलक भारत की आत्मा है, ऋग्वेद से लेकर सिंदूर तक इसका वर्णन है, इसका अपमान पूरे राष्ट्र का अपमान है।
अब जागने का समय है!
कला और कलाकार का सम्मान तब तक होना चाहिए जब तक वह राष्ट्र और संस्कृति का सम्मान करे। ए.आर. रहमान ने अपनी धुनों से दुनिया को मंत्रमुग्ध किया होगा, पर उनके विचार और उनका आचरण विभाजनकारी है। तिलक और बुर्के के बीच का उनका दोहरा मापदंड यह सिद्ध करता है कि वे ’सर्वधर्म समभाव’ के नहीं बल्कि ’चयनात्मक कट्टरता’ के पैरोकार हैं। भारत की जनता को अब पहचानना होगा कि वास्तविक कलाकार कौन है।
–दिव्या शिखा

