भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष का धर्म सरकार की नीतियों की आलोचना करना है, न कि राष्ट्र के अस्तित्व, उसकी सुरक्षा और सांस्कृतिक आधार को ही कठघरे में खड़ा करना। आलोचना नीति की होती है, पहचान की नहीं; सत्ता की होती है, सेना और सभ्यता की नहीं। किन्तु कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पिछले एक दशक के वक्तव्यों का क्रम देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि वे निरंतर एक ऐसी दिशा में बढ़ रहे हैं जो राष्ट्रनिंदा और आन्तरिक अस्थिरता की ओर जाती है। उनके बयानों के तार अधिकांश उन विदेशी शक्तियों, ‘डीप-स्टेट’ और भारत-विरोधी लॉबियों से जुड़ते दिखते हैं, जिनका लक्ष्य एक उभरते हुए शक्तिशाली भारत को भीतर से खोखला करना है।
1. सेना का अपमान : शौर्य पर संदेह और मनोबल तोड़ने की राजनीति
सेना किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता का अन्तिम कवच होती है। राहुल गांधी ने बार-बार इस कवच पर प्रहार कर शत्रु देशों के नैरेटिव को बल दिया है:
* “पिटाई” और “खून की दलाली” : डोकलाम विवाद (2017) से लेकर गलवान घाटी (2020) की झड़प तक, उन्होंने भारतीय सेना की क्षमता पर सवाल उठाए। चीन के साथ सीमा विवाद पर भारतीय जवानों के लिए “पिटाई” जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना और पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद प्रधानमंत्री पर “खून की दलाली” का आरोप लगाना, सेना के बलिदान का घोर अपमान था। यह भाषा किसी भारतीय नेता की नहीं, बल्कि सीमा पार बैठे दुश्मनों के एजेण्डे को सबल बनाती है।
* सेना का जातिकरण और ‘अग्निवीर’ पर भ्रम : उन्होंने सार्वजनिक मंचों से दावा किया कि “भारत की सेना पर केवल 10% आबादी का नियंत्रण है” जबकि 2024 – MoD डेटा के अनुसार 75% भर्तियाँ OBC/SC/ST का…। सेना जैसे अनुशासित संस्थान में जातिवाद का जहर घोलना और ‘अग्निवीर’ योजना के बहाने युवाओं को सेना के विरुद्ध भड़काना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है।
2. ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ : राष्ट्र के अस्तित्व को नकारने का बौद्धिक षड्यंत्र
संसद के भीतर राहुल गांधी का यह कहना कि “भारत एक राष्ट्र नहीं, बल्कि राज्यों का एक संघ है”, उनके सबसे खतरनाक वैचारिक एजेण्डे को उजागर करता है।
* सभ्यतागत पहचान का निषेध : भारत केवल 1947 में बना एक प्रशासनिक समझौता नहीं है। यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक निरंतरता वाला एक ‘सभ्यतागत राष्ट्र’ है। इसे केवल ‘राज्यों का संघ’ बताकर वे उन अलगाववादी ताकतों को बौद्धिक आधार प्रदान करते हैं जो भारत को खंडित करने का सपना देखती हैं। यह वही ‘डीप-स्टेट’ नैरेटिव है जो भारत की पहचान को मिटाकर उसे टुकड़ों में देखना चाहता है।
3. सनातन और सांस्कृतिक जड़ों पर निरन्तर प्रहार
राहुल गांधी की राजनीति में ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुत्व’ के बीच एक कृत्रिम विभाजन पैदा करने की कोशिश निरंतर दिखाई देती है, जो दरअसल सनातन को कमजोर करने की एक बड़ी योजना है।
* ‘शक्ति’ से लड़ने का आह्वान : चुनाव के समय “शक्ति से लड़ने” की बात करना केवल राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि भारतीय मानस की आध्यात्मिक चेतना पर प्रहार था।
* मन्दिरों पर संकीर्ण टिप्पणी : विदेशी मंचों पर यह कहना कि “लोग मंदिरों में लड़कियों को छेड़ने जाते हैं”, सम्पूर्ण हिन्दू समाज और हमारी पवित्र परंपराओं को वैश्विक स्तर पर कलंकित करने का प्रयास था।
4. विदेशी धरती पर ‘भारत की चुगली’ और बाहरी हस्तक्षेप की गुहार
राहुल गांधी का एक स्थायी पैटर्न बन चुका है— देश के बाहर जाना और वहाँ के मंचों से भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को गाली देना।
* लोकतंत्र की मृत्यु का स्वांग : लंदन और अमेरिका में जाकर यह कहना कि “भारत में लोकतंत्र मर चुका है” और “संस्थानों पर कब्जा हो चुका है”, विदेशी शक्तियों को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का खुला निमंत्रण है।
* डीप-स्टेट और विदेशी षड्यंत्र : उनके दौरों के आयोजक अक्सर वे होते हैं जिनका जुड़ाव उन वैश्विक चेहरों (जैसे जॉर्ज सोरोस लॉबी) से है जो राष्ट्रों को अस्थिर करने के लिए जाने जाते हैं। यह संयोग नहीं है कि जब भी कोई विदेशी रिपोर्ट (जैसे हिंडनबर्ग) भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करती है, राहुल गांधी उसके मुख्य प्रचारक बन जाते हैं।

5. अराजकता का आह्वान : जेन-जी (Gen-Z) और सड़क पर ‘गृहयुद्ध’ की पटकथा
लोकतांत्रिक हार को न पचा पाने के कारण अब वे सीधे तौर पर अस्थिरता और अराजकता का आह्वान कर रहे हैं।
* युवाओं को भड़काना : वह निरन्तर नई पीढ़ी (Gen-Z) को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि व्यवस्था उनके खिलाफ है। उनका लक्ष्य युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण के बजाय ‘सड़क पर विद्रोह’ की ओर मोड़ना है।
* विदेशी तख्तापलट का मॉडल : उनके बयानों में अक्सर “पूरा देश जल जाएगा” या “सड़कों पर आग लग जाएगी” जैसी धमकियां सुनाई देती हैं। ऐसा लगता है मानो वे भारत में भी पड़ोसी देशों जैसी अराजकता और तख्तापलट की स्थिति पैदा करने के वैश्विक षड्यंत्र के स्थानीय मोहरे बन गए हैं।
6. नया ‘डिवाइड एंड रूल’ : जातिवाद और सामाजिक विखण्डन
‘भारत जोड़ो’ के नाम पर यात्रा निकालने वाले नेता की राजनीति अब केवल ‘जातिगत नफरत’ पर केन्द्रित हो गई है।
* विभाजनकारी एजेण्डा : हर संस्थान में जाति खोजना और ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों से समाज को आपस में लड़ाना, अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति का आधुनिक संस्करण है। यह मेधा की हत्या और देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने का षड्यंत्र है।

7. आर्थिक विध्वंस का प्रयास
देश के बड़े औद्योगिक घरानों को बिना किसी प्रमाण के निशाना बनाना सीधे तौर पर भारत के आर्थिक आत्मविश्वास पर प्रहार है। वे जानते हैं कि यदि देश के बड़े उद्योगों की वैश्विक साख गिरेगी, तो विदेशी निवेश रुकेगा और अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।
8. ताजा परिप्रेक्ष्य : संसद की गरिमा का चीरहरण
हाल ही में संसद के भीतर राहुल गांधी का आचरण इस बात का प्रमाण है कि वे अब लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमा लांघ चुके हैं। विपक्ष के नेता जैसे जिम्मेदार पद पर रहते हुए भी उनका व्यवहार एक गंभीर राजनेता के बजाय एक ‘अराजकतावादी’ जैसा प्रतीत होता है। संसद को उन्होंने केवल शोर-शराबे और देश के विरुद्ध नकारात्मक नैरेटिव सेट करने का माध्यम बना लिया है।
सत्ता की चाह या राष्ट्रद्रोही मानसिकता?
राहुल गांधी के इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि इसके पीछे एक गहरी और षड्यंत्रकारी मानसिकता है जो :
* सेना के आत्मविश्वास को तोड़ना चाहती है।
* सनातन संस्कृति को हीन सिद्ध करना चाहती है।
* समाज को जातियों में बांटकर उसे लहूलुहान करना चाहती है।
* विदेशी शक्तियों और ‘डीप-स्टेट’ को भारत के ऊपर शासक के रूप में बैठाना चाहती है।
राहुल गांधी जिस भारत की बात करते हैं, वह उनके शब्दों में केवल एक ‘प्रशासनिक समझौता’ है। उनके लिए राष्ट्र स्थायी नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्ति का एक जरिया है। यदि वे सत्ता में नहीं हैं, तो वे पूरे देश को जलते हुए देखने की मंशा रखते हैं। यह राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्र के विरुद्ध वैचारिक युद्ध है।
अब समय आ गया है कि भारत का जनमानस यह तय करे कि क्या वे ऐसे व्यक्ति को नेतृत्व सौंपेंगे जो भारत को जोड़ने के नाम पर उसे अंदर से विखण्डित करने और विदेशी आकाओं को खुश करने के वैश्विक षड्यंत्र का मुख्य चेहरा बना हुआ है।
-अखिलेश चौधरी

