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संसद की गरिमा और संवाद की संवैधानिक अनिवार्यता

संसद की गरिमा और संवाद की संवैधानिक अनिवार्यता

by हिंदी विवेक
in विशेष
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भारतीय संसदीय लोकतंत्र की शक्ति संसद से निकलती है। संसद केवल विधायी संस्था नहीं है, बल्कि वह प्रमुख मंच है जहाँ सत्ता से प्रश्न पूछे जाते हैं, नीतियों की समीक्षा की जाती है तथा सरकार जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाती है। लोकसभा, जिसे ‘जनता का सदन’ कहा जाता है, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आत्मा मानी जाती है। संसद की गरिमा तभी अक्षुण्ण रहती है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों संवाद, संयम तथा संवैधानिक मर्यादाओं का पूर्ण सम्मान करें। हाल के वर्षों में संसद के कामकाज को लेकर उठ रहे प्रश्न इसी मूल भावना से जुड़े हुए हैं।

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, संसद राष्ट्रपति, लोकसभा तथा राज्यसभा से मिलकर गठित होती है। अनुच्छेद 75(3) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। वहीं अनुच्छेद 105 संसद सदस्यों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विशेषाधिकार प्रदान करता है, ताकि वे निर्भय होकर जनहित के मुद्दे उठा सकें। इस संवैधानिक व्यवस्था का मूल आशय यह है कि कार्यपालिका संसद के प्रति जवाबदेह बनी रहे तथा संसद के भीतर सरकार अपनी नीतियों एवं निर्णयों का औचित्य प्रस्तुत करे। यही व्यवस्था लोकतंत्र तथा बहुमत-आधारित शासन के बीच आवश्यक संतुलन स्थापित करती है।

2026 के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा में वक्तव्य न हो पाना संसदीय परंपराओं की दृष्टि से असामान्य एवं विचारणीय घटना रही। लोकसभा अध्यक्ष ने सुरक्षा कारणों तथा संभावित अप्रिय स्थिति की आशंका का हवाला देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री को सदन में उपस्थित न होने की सलाह दी गई थी। संसदीय इतिहास में पिछले दो दशकों से अधिक समय में यह पहली बार हुआ जब धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री का उत्तर लोकसभा की कार्यवाही में दर्ज नहीं हो सका (हालाँकि प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अपना विस्तृत वक्तव्य दिया)।

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राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस संसद की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक मानी जाती है। यह वह अवसर होता है जब सरकार अपने कार्यकाल के मूल्यांकन को प्रस्तुत करती है तथा भविष्य की नीतिगत दिशा पर संसद का विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करती है। इस बहस में प्रधानमंत्री की भूमिका केंद्रीय होती है। उनका वक्तव्य केवल औपचारिक उत्तर नहीं, अपितु सरकार की राजनीतिक एवं नीतिगत सोच का आधिकारिक प्रतिबिंब माना जाता है। ऐसे में प्रधानमंत्री का वक्तव्य न हो पाना संसद के भीतर संवाद की प्रक्रिया में एक स्पष्ट रिक्तता पैदा करता है, भले ही इसके पीछे परिस्थितिजन्य कारण ही क्यों न रहे हों।

बजट सत्र के दौरान लोकसभा में बार-बार व्यवधान, नारेबाजी तथा हंगामे के कारण कार्यवाही को बार-बार स्थगित करना पड़ा। यह स्थिति किसी एक सत्र या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि हाल के वर्षों में संसद की कार्यशैली से जुड़ी एक व्यापक समस्या को उजागर करती है। संविधान का अनुच्छेद 118 संसद को अपनी कार्यप्रणाली स्वयं निर्धारित करने का अधिकार प्रदान करता है, किंतु इसका उद्देश्य कार्यवाही को सुचारु बनाना है, न कि संवाद को अवरुद्ध करना। विरोध एवं असहमति लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं, परंतु जब वे लगातार व्यवधान में परिवर्तित हो जाते हैं, तो संसद की मूल भूमिका प्रभावित होने लगती है।

यह समस्या केवल विपक्ष के आचरण तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष की भी यह जिम्मेदारी है कि वह संसद को संवाद का सार्थक मंच बनाए रखने हेतु सक्रिय पहल करे। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों जैसे महँगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, सामाजिक असमानता, संघीय ढाँचा तथा विदेश नीति पर संसद में गहन एवं गंभीर चर्चा की अपेक्षा की जाती है। इन विषयों पर सार्थक विमर्श न केवल नीतिगत स्पष्टता प्रदान करता है, बल्कि जनता में यह विश्वास भी उत्पन्न करता है कि संसद उनके मुद्दों को पूर्ण गंभीरता से संबोधित कर रही है।

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प्रधानमंत्री की सक्रिय संसदीय भागीदारी इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। उनकी उपस्थिति एवं वक्तव्य सदन की बहसों को दिशा प्रदान करते हैं तथा सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हैं। यह भी स्मरणीय है कि लोकसभा केवल विपक्ष का मंच नहीं है; सत्तापक्ष के सांसदों के लिए भी यह अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं को उठाने तथा सरकार के समक्ष सुझाव प्रस्तुत करने का संवैधानिक अवसर है। प्रधानमंत्री की उपस्थिति सदन की बहसों को दिशा देती है और सरकार की मंशा को स्पष्ट करने में सहायक होती है। इसलिए धन्यवाद प्रस्ताव जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर उनका वक्तव्य न हो पाना एक अपवाद के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि किसी स्थायी प्रवृत्ति के संकेत के रूप में।

भारतीय संसदीय इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्रियों ने कठिन राजनीतिक परिस्थितियों एवं तीक्ष्ण आलोचनाओं के बावजूद संसद में संवाद की परंपरा को अक्षुण्ण रखा। संसद का सामना करना, प्रश्नों का उत्तर देना तथा आलोचना को सुनना लोकतांत्रिक नेतृत्व की मूल पहचान रही है। यही परंपरा सत्ता को निरंकुशता से बचाती है तथा लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है।

2026 के बजट सत्र की घटनाएँ—जिनमें कार्यवाही के घंटों का अपव्यय, बार-बार स्थगन तथा संवाद का अभाव शामिल है—यह संकेत देती हैं कि संसद की गरिमा एवं प्रभावशीलता को बनाए रखने हेतु गहन आत्ममंथन की आवश्यकता है। सुरक्षा एवं व्यवस्था निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, किंतु उन्हें संसदीय संवाद के विकल्प के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। संसद का ठहराव, निरंतर स्थगन तथा संवाद का अभाव अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही क्षीण करता है।

लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार संचालन का नाम नहीं है, अपितु यह संवाद, असहमति तथा जवाबदेही की निरंतर प्रक्रिया है। संसद इस प्रक्रिया का सर्वोच्च मंच है। सत्ता पक्ष एवं विपक्ष—दोनों—की यह साझा जिम्मेदारी है कि संसद को टकराव के बजाय विमर्श का केंद्र बनाया जाए। भविष्य में यह अपेक्षा की जाती है कि सभी राजनीतिक दल संसदीय मर्यादाओं का पूर्ण सम्मान करते हुए संसद की गरिमा को सुदृढ़ करेंगे, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास और अधिक गहन हो सके।

–डॉ. संतोष झा.

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