| शब्दोत्सव भारत अभ्युदय का प्रतीक बनकर उभरा है- एक ऐसा मंच जो विभाजनकारी स्वरों के बीच एकता और राष्ट्रप्रेम का नैरेटिव स्थापित कर रहा है। आने वाले समय में यह अन्य साहित्यिक उत्सवों के लिए आदर्श उदाहरण बनेगा और राष्ट्रीय विचारधारा को अटल बनाएगा। |
शब्दोत्सव की जड़ें दिल्ली पुस्तक मेले में एक छोटे से लेखक मंच से जुड़ी हुई हैं। प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले या दिल्ली बुक फेयर के दौरान वहां एक मामूली सा मंच होता था, जहां ’शब्दोत्सव’ के नाम से वैचारिक विमर्श और साहित्यिक चर्चाएं होती थीं। यह छोटी सी जगह इतनी प्रभावशाली थी कि पुस्तक मेले के दौरान सैकड़ों पुस्तक प्रेमी केवल शब्दोत्सव में शामिल होने के लिए ही मेले में आते थे।
राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व की भावना से ओत-प्रोत ये चर्चाएं लोगों के मन में गहराई तक उतरती थीं। यह मंच सुरुचि प्रकाशन के प्रयासों से संचालित होता था और धीरे-धीरे यह पुस्तक प्रेमियों के बीच एक विशेष पहचान बन गया। जहां मुख्यधारा के साहित्यिक मंचों पर प्राय: एक विशेष विचारधारा का एकाधिकार रहता था, वहां शब्दोत्सव ने राष्ट्रवादी और सनातन मूल्यों पर आधारित संवाद को जगह दी। कुंदन जैसे कई पुस्तक प्रेमी इस छोटे मंच के दीवाने थे।
कुंदन पिछले तीन-चार वर्षों से पुस्तक मेले में शब्दोत्सव न देखकर निराश रहते थे, परंतु जब 2 से 4 जनवरी 2026 तक मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में दिल्ली शब्दोत्सव 2026 का आयोजन हुआ, तो कुंदन से भेंट हुई। उन्होंने कहा कि पहली बार देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यह शब्दोत्सव वही है, जिसके लिए वे पुस्तक मेले में जाते थे। फिर आयोजकों और संयोजकों के नाम पढ़े- दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन – तो उन्हें अपार खुशी हुई कि उनका प्यारा शब्दोत्सव लौट आया है, वह भी इतने भव्य और विशाल आकार में। यह व्यक्तिगत अनुभव ही शब्दोत्सव की लोकप्रियता और उसके वैचारिक प्रभाव का प्रमाण है।

यह छोटी शुरुआत से भव्यता तक की यात्रा राष्ट्रीय विचारधारा के नैरेटिव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। जहां दशकों से साहित्यिक मंचों पर एक विशेष विचारधारा का वर्चस्व रहा, वहां शब्दोत्सव ने राष्ट्रवादी दृष्टि को मुख्यधारा में लाने का कार्य किया। शब्दोत्सव 2026 की थीम ’भारत अभ्युदय’ थी, जो वैदिक काल से डिजिटल युग तक भारत की यात्रा का प्रतीक बनी। यह थीम भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान को रेखांकित करती है।
दिल्ली की मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता ने उद्घाटन में कहा कि यह भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है। संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने इसे ’वैचारिक आतंकवाद पर सर्जिकल स्ट्राइक’ बताया। तीन दिनों में 100 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया, 40 से ज्यादा पुस्तकों का विमोचन हुआ और हजारों दर्शकों की उपस्थिति ने सिद्ध किया कि राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित आयोजन भी व्यापक स्वीकार्यता पा सकता है।

इस आयोजन की सबसे बड़ी शक्ति थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहां कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूंजा। मंच से देशप्रेम, हिंदुत्व और एकता की बातें हुईं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने ’संघे शक्ति कलियुगे’ सत्र में हिंदुत्व को भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाला बताया। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ’धर्मरक्षक धामी’ सत्र में समान नागरिक संहिता और लैंड जिहाद के विरुद्ध कार्रवाइयों का उल्लेख किया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के ’ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’ सत्र में संविधान के भारतीयकरण और न्याय प्रक्रिया पर चर्चा हुई। ये सभी सत्र राष्ट्रीय विचारधारा के नैरेटिव को मजबूत कर रहे थे। जहां मुख्यधारा के साहित्यिक उत्सवों में प्राय: विभाजनकारी या औपनिवेशिक मानसिकता के स्वर प्रमुख रहते हैं, वहां शब्दोत्सव ने सकारात्मक राष्ट्रवाद को केंद्र में रखा। यह नैरेटिव युवाओं तक पहुंच रहा है, जो सोशल मीडिया के युग में भ्रमित विचारधाराओं से घिरे हैं।
शब्दोत्सव में सांस्कृतिक मंच ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया। पांडवाज बैंड, साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी की भक्ति प्रस्तुतियों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। बच्चे और युवा श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर नाचे। लोकनृत्य और लोकगीतों ने युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ा। ओपन माइक ने उन्हें अपनी अभिव्यक्ति का मंच दिया। दिल्ली-एनसीआर के 40 विश्वविद्यालयों के छात्रों की भागीदारी ने आयोजन को युवा ऊर्जा से भर दिया। ’जनरेशन जी: विकसित भारत के सारथी’ सत्र में चंद्रप्रकाश द्विवेदी, अभिलिप्सा पांडा जैसे वक्ताओं ने युवाओं को प्राचीन नायकों से प्रेरणा लेने की अपील की। यह सब राष्ट्रीय विचारधारा के नैरेटिव को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बना। शब्दोत्सव ने दिखाया कि राष्ट्रवाद और भक्ति को आधुनिक रूप देकर युवाओं से जोड़ा जा सकता है।
इससे विभाजनकारी नैरेटिव्स का मुकाबला होता है और एक सकारात्मक, एकजुट भारत का चित्र उभरता है। शब्दोत्सव में इतिहास के मिथकों को तोड़ने वाला विमर्श प्रमुख रहा। पूर्व एएसआई निदेशक धर्मवीर शर्मा ने कुतुब मीनार को प्राचीन विष्णु वेदशाला बताया, जिसके प्रमाणों ने दर्शकों को चकित किया। काशी के संतों ने इसे सनातनियों को सौंपने की मांग उठाई। ऐसे विमर्श राष्ट्रीय विचारधारा के नैरेटिव को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार प्रदान करते हैं। यह औपनिवेशिक इतिहास लेखन के विरुद्ध एक मजबूत आवाज है, जो भारत की सनातन विरासत को पुनः स्थापित करता है।
शब्दोत्सव ने सिद्ध किया कि साहित्यिक मंचों पर सकारात्मक राष्ट्रवादी नैरेटिव को प्रमुखता दी जा सकती है। यह अन्य आयोजनों जैसे जश्ने रेख्ता या जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सामने एक मजबूत विकल्प बन रहा है। शब्दोत्सव केवल आयोजन नहीं बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। पुस्तक मेले के छोटे मंच से स्टेडियम के भव्य आयोजन तक की यात्रा बताती है कि यदि दिशा स्पष्ट हो तो राष्ट्रीय विचारधारा का नैरेटिव मुख्यधारा बन सकता है। कुंदन जैसे हजारों लोग इसका प्रमाण हैं, जो वर्षों की निराशा के बाद इसकी वापसी से उत्साहित हैं। यदि यह आयोजन बिना बाधा के जारी रहता है तो यह राष्ट्रीय विचारधारा को न केवल मजबूत करेगा बल्कि युवाओं में देशप्रेम और सांस्कृतिक गौरव की भावना को स्थाई बनाएगा।
देश निर्माण में क्रिएटर्स की भूमिका पर मंथन
जिला सिरमौर के नाहन स्थित वालिया रिसोर्ट में क्रिएट फॉर नेशन कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें 80 से अधिक सोशल मीडिया क्रिएटर्स ने भाग लिया। कार्यक्रम की मुख्य थीम ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ था। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया का समाज पर प्रभाव और देश निर्माण में कंटेंट क्रिएटर्स की जिम्मेदार भूमिका पर गहन मंथन करना था। मुख्य अतिथि डॉ. रमेश पहाड़िया ने उद्बोधन में जोर दिया कि क्रिएटर्स को देश-धर्म हित और परिवार में संस्कारों को मजबूत करने वाली सकारात्मक सामग्री बनानी चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से समाज में जन जागरण और अच्छे कार्यों के प्रचार का आह्वान किया। मुख्य वक्ता प्रताप समयाल ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब समाज की सोच और दिशा निर्धारित करने का शक्तिशाली माध्यम बन चुके हैं। उन्होंने क्रिएटर्स से अनुरोध किया कि वे राष्ट्र और समाज के हित में प्रेरणादायक, जिम्मेदार एवं सकारात्मक कंटेंट का निर्माण करें।
आशीष कुमार ’अंशु’

