| संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ इस दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई के ९०० से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों को उन्होंने संबोधित किया। नेहरू सेंटर, वरळी में रविवार, दिनांक ०८ फरवरी को संपन्न हुए प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित सदस्यों द्वारा पूछे गए विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों से जुड़े प्रश्नों के सीधे उत्तर दिए। |
भारत पर ५०० वर्षों तक शासन करने के बाद भी आक्रमणकारी जो नहीं कर सके, वे अब क्या करेंगे? ऐसा सीधा प्रश्न उठाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने वर्ष २०४७ में भारत विभाजित होगा, ऐसा भय रखने के बजाय तब तक अखंड भारत के निर्माण का आह्वान किया और कहा कि भारत को तोड़ने का सपना देखने वाले खुद टूट जाएंगे तथा उनके सपने कभी पूरे नहीं होंगे।
संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ इस दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई के ९०० से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों को उन्होंने संबोधित किया। नेहरू सेंटर, वरळी में रविवार, दिनांक ०८ फरवरी को संपन्न हुए प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित सदस्यों द्वारा पूछे गए विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों से जुड़े प्रश्नों के सीधे उत्तर दिए। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे।
उपस्थित लोगों द्वारा पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघनीति, हिंदुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्नों पर पू. सरसंघचालक जी ने समाधानकारी उत्तर दिए।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर बोलते हुए पू. सरसंघचालक जी ने बांग्लादेश के सवा करोड़ हिंदुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी, ऐसा विश्वास उन्होंने व्यक्त किया।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि हिंदू ही संघ का सरसंघचालक होगा, यह प्रतिपादन करते हुए उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक बनने के लिए किसी भी जाति का होना न तो बाधा है और न ही कोई अनिवार्य योग्यता। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं, ऐसा विश्वास डॉ. मोहन भागवत जी ने व्यक्त किया।
जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधानसम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है, ऐसा पू. सरसंघचालक जी ने कहा।
संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है, इस ओर भी डॉ. मोहन भागवत जी ने ध्यान आकर्षित किया।
जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान उन्होंने किया। विदेशी अवैध घुसपैठियों को रोजगार देने के बजाय वह अपने देश के हिंदू या मुस्लिम नागरिकों को क्यों न दिया जाए, ऐसा प्रश्न उन्होंने उठाया।
हिंदू और सिख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है।
‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिंदू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए। आधुनिक काल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इस ओर इंगित किया, ऐसा पू. सरसंघचालक जी ने कहा।
इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योगपति हर्ष गोयनका, सज्जन जिंदल, अजय पिरामल, कुमार मंगलम बिड़ला, अनन्या बिड़ला, एल एंड टी के एस. सुद्रमनयं, एच डीएफसी बैंक के सीईओ शशिधर जगदीशन, मोर्गन स्टेनली के रिथम देसाई, फिल्म जगत की हस्तियों में अक्षय कुमार, विक्की कौशल, अनन्या पांडेय, हृदयनाथ मंगेशकर, करण जोहर, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, सुबोध भावे, महेश मांजरेकर, जैकी श्रॉफ, विनीत कुमार सिंह, रवि दुबे, रुपाली गांगुली, वाईआरएफ के सीईओ अक्षय विधानी आदि विशेष तौर पर उपस्थित थे। इसके अलावा डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, खिलाड़ी, मीडिया प्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाओं के सदस्य, धर्मगुरु, लेखक, सोशल मीडिया तथा विज्ञापन क्षेत्र के व्यावसायिक सहभागी हुए।
- ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाई धर्म और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं, ऐसा विश्वास डॉ. मोहन भागवत जी ने व्यक्त किया। भारत रत्न सम्मान प्राप्त न होने पर भी स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी, ऐसा पू. सरसंघचालक जी ने कहा।
- भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को दिए गए स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है। संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्तिनिर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है, ऐसा स्पष्ट विचार डॉ. मोहन भागवत जी ने प्रकट किया।
- समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए पू. सरसंघचालक जी ने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए, ऐसी अपेक्षा पू. सरसंघचालक जी ने व्यक्त की।
- संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है, ऐसा पू. सरसंघचालक जी ने कहा।

