| भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल 2026 से उठा विवाद हिंदू समाज की वैचारिक जागृति का संकेत देता है। समाज अब अपनी सभ्यतागत स्मृति, इतिहास और आत्मसम्मान के प्रति सजग हो चुका है। आवश्यकता पारदर्शिता, संतुलन और स्पष्ट सांस्कृतिक नीति की है, अन्यथा ‘संवाद’ के नाम पर यह मंच साहित्य नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन जाएगा। |
भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलएफ) 2026 से जुड़ा विवाद अब किसी स्थानीय सांस्कृतिक असहमति तक सीमित नहीं रहा। यह भारतीय सांस्कृतिक मंचों पर लम्बे समय से सक्रिय उस वैचारिक एकाधिकार को उजागर करता है, जो ‘संवाद’, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘समावेशिता’ जैसे शब्दों की आड़ में सभ्यतागत स्मृति पर सुनियोजित प्रहार करता रहा है। आज यह आयोजन साहित्य का उत्सव कम और वैचारिक एजेंडे तथा चंदाखोरी का मंच अधिक प्रतीत होता है, जहां आक्रांताओं के पुनर्पाठ को प्रगतिशीलता कहा जाता है और समाज की ऐतिहासिक पीड़ा को ‘न्यूएंस’ में बदल दिया जाता है, वह भी समाज के ही धन से।

भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र को इस वैचारिक प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जाना केवल संस्थागत विचलन नहीं है बल्कि यह मध्य प्रदेश शासन की असमंजसपूर्ण मौन सहमति का भी संकेत देता है। इस पूरे विवाद ने बीएलएफ के वैचारिक स्रोतों, आयोजक राघव चंद्रा के उदारवादी बैकग्राउंड, 44 संस्थाओं से जुड़ी संदिग्ध फंडिंग संरचना और सम्भावित विदेशी प्रभाव को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। पूर्ववर्ती विवादों से लेकर 2026 के बाबर केंद्रित सत्र तक यह स्पष्ट हो गया है कि बीएलएफ अब साहित्य का मंच नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष का मैदान बन चुका है, जो भारत की जख्मी सभ्यता के ऐतिहासिक घावों को बार-बार कुरेदता है।

भारत भवन, मध्य प्रदेश शासन द्वारा स्थापित, समकालीन कला, साहित्य, संगीत और रंगकर्म की एक विशिष्ट संस्था रही है। इसके ट्रस्ट आधारित बाय-लॉज स्पष्ट करते हैं कि वागर्थ, रंगमंडल, अनहद, रूपंकर और छवि जैसे प्रभाग रचनात्मक समकालीन अभिव्यक्ति के लिए हैं, न कि मध्यकालीन आक्रांताओं पर विवादास्पद वैचारिक चर्चा के लिए। इसके बाद भी बीएलएफ जैसे निजी आयोजन को बार-बार इस शासकीय परिसर में स्थान दिया जाना गम्भीर प्रश्न खड़े करता है। यदि यह उत्सव वास्तव में स्वतंत्र और गैर-सरकारी है, तो निजी परिसरों में आयोजन करने में क्या बाधा है। भारत भवन की सरकारी गरिमा का उपयोग कर वैचारिक मंच सजाना सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है, जो ट्रस्ट बाय-लॉज की भावना और सार्वजनिक उत्तरदायित्व दोनों के विरुद्ध है।
बीएलएफ के वैचारिक स्रोतों पर प्रश्न उठाना अब अपरिहार्य हो गया है। आयोजक और डायरेक्टर राघव चंद्रा की शैक्षणिक और वैचारिक पृष्ठभूमि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और सेंट स्टीफेंस कॉलेज जैसे परिसरों से जुड़ी रही है, जिन्हें लम्बे समय से वामपंथी और ओरिएंटलिस्ट दृष्टिकोण का गढ़ माना जाता है। समस्या शिक्षा या अनुभव की नहीं बल्कि उस वैचारिक दृष्टि की है, जो भारतीय सभ्यता को बाहरी दृष्टिकोण से देखती है, जहां हिंदू परम्पराओं को पिछड़ा और इस्लामी इतिहास को स्वाभाविक रूप से समावेशी बताने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि आयोजक वास्तव में समावेशी हैं तो बीएलएफ के विषय बार-बार हिंदू संवेदनाओं से क्यों टकराते हैं?
बीएलएफ स्वयं को ‘कम्युनिटी ड्रिवन’ बताता है और कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप से दूरी का दावा करता है, जबकि रिपोर्टों से स्पष्ट है कि इसे 44 संस्थाओं से फंडिंग मिलती है, जिनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती, इससे संदेह और गहराता है। पूर्व में एक कांग्रेस नेत्री द्वारा इस विषय पर प्रवर्तन निदेशालय में शिकायत की बात भी सामने आई थी। प्रश्न यह भी है कि क्या इन स्रोतों में विदेशी सांस्कृतिक संगठन शामिल हैं।
2025 के आयोजन को UNESCO के City Of Literature टैग से जोड़ने का प्रयास भी विदेशी मान्यता की लालसा की ओर संकेत करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बीएलएफ की आयोजक संस्था society for culture environment के पास FERA और FEMA के अंतर्गत विदेशी चंदा लेने की स्वीकृति नहीं है, फिर भी फ्रांस से जुड़े सत्र को अश्रश्रळरपलश ऋीरपालरळीश से फंडिंग कराए जाने की चर्चा है। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है तो यह गम्भीर कानूनी जांच का विषय बनता है।
फैक्ट स्टॉर्म पॉलिसी एंड रिसर्च फाउंडेशन, भोपाल की रिपोर्ट के अनुसार 2023 से 2026 तक बीएलएफ में कई विदेशी वक्ताओं को आमंत्रित किया गया, जिनमें SALVATORS BABONES, VIRGINIE BOUYX और MIMI NICKLIN, William Dalrymple शामिल हैं। Salvatore Babones को छोड़कर अधिकांश विदेशी प्रतिभागी अपने देशों में प्रगतिशील, सेक्युलर और वैश्विक उदार वामपंथी बौद्धिक परम्परा से जुड़े रहे हैं। रिपोर्ट का एक चिंताजनक पहलू यह है कि William Dalrymple का संबंध Hay Festival से रहा है, जिसे George Soros के open society foundations से फंडिंग मिली है। बीएलएफ की ऑडिट रिपोर्ट में Dalrymple से जुड़े भुगतान और ग्रांट दर्ज होने की जानकारी सामने आती है, जो बीएलएफ को अप्रत्यक्ष रूप से Soros नेटवर्क से जोड़ती प्रतीत होती है।
बीएलएफ का इतिहास यह भी दर्शाता है कि विवाद अपवाद नहीं, बल्कि निरंतरता रहे हैं। 2023 में फिल्मकार ओनिर को making literature LGBTQ Neutral’ सत्र से अंतिम क्षण में हटाया गया, जहां आयोजकों ने सुरक्षा कारण बताए। इससे पहले 2021-22 में ‘i am gay, i am orin पुस्तक पर चर्चा को लेकर तत्कालीन संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने आपत्ति जताई और इसे भारत भवन की गरिमा के विपरीत बताया। ये घटनाएं दिखाती हैं कि बीएलएफ विविधता का दावा तो करता है, परंतु असहमति सामने आने पर या तो पीछे हटता है या विरोध को दबाता है।
2026 में आभास मल्दहियार की पुस्तक ‘Babur the quest for hindustan’ पर प्रस्तावित सत्र ने विवाद को निर्णायक मोड़ दिया। बाबर जैसे आक्रांता को संवेदनशील और मानवीय रूप में प्रस्तुत करना इतिहास का पुनर्पाठ नहीं बल्कि स्मृति विस्थापन है। वी. एस. नायपॉल की ‘जख्मी सभ्यता’ इसी अनुभव की अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार पश्चिम में हिटलर को मानवीय या रोमांटिक बनाना असम्भव है, उसी प्रकार भारत में बाबर को कवि या मानवीय बताना सभ्यतागत अपमान है। आभास मल्दहियार की वैचारिक यात्रा भी प्रश्नों के घेरे में है क्योंकि 2006-2011 के दौरान वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित रहे हैं। भारत भवन के न्यासियों द्वारा उठाई गई आपत्तियां इस विवाद को संस्थागत स्तर तक ले गई हैं। पूर्व न्यासी प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ और वर्तमान न्यासी डॉ. विजय मनोहर तिवारी द्वारा उठाए गए प्रश्न इस विषय की गम्भीरता को रेखांकित करते हैं।
-डॉ. विश्वास चौहान

