सफलता की कहानी

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दुनिया भर में विकलांगों को दोयम दर्जे का स्थान प्राप्त होता है, जबकि सही दिशा मिलने पर वे भी सामान्य जनों की ही भांति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बेहतरीन मुकाम हासिल कर सकते हैं। सरकारों ने उनकी तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है परंतु समाज को और जागरुक होना पड़ेगा ताकि समाज का यह प्रभाग भी पूरी तरह मुख्य धारा के साथ चल सके।

आओ पहल करें

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प्रदूषण नियंत्रण के लिए हमें किसी दिन विशेष पर आश्रित होने की बजाय सामाजिक स्तर पर बहुत तेजी से कार्य करना चाहिए, क्योंकि इस महामारी ने बहुत खतरनाक रूप धारण कर लिया है। यदि लोग अभी नहीं चेते तो बहुत तेजी से इसके दुष्परिणाम सामने आएंगे और मानव जीवन खतरे में पड़ जाएगा।

 हम ‘छात्र प्रतिज्ञा’ भूल तो नहीं रहे?

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समय के साथ पाठशाला, पाठ्यपुस्तकों में काफी परिवर्तन हुए | लेकिन छात्र प्रतिज्ञा हमेशा से ही हमारे शालेय जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है | कहते हैं, बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जो आकार दिया जाए वे उसमें ढल जाते हैं | छात्र प्रतिज्ञा के कारण ये कच्ची मिट्टी के घडे, मानसिक रूप से परिपक्व होते हैं | और इसके एक एक शब्द का अर्थ समझने पर वे देश के और देशवासियों के और करीब आते हैं | लेकिन धीरे धीरे समाज में फैल रहे इस धर्म और जाती के आधार पर हो रहे भेदभाव और ‘लव्ह जिहाद’ और ‘धार्मिक कट्टरता’ जैसी बुराईयों से जन्मी नफरत ने कहीं ना कहीं हमारी इस प्रतिज्ञा को ठेस पँहुचाई है | और आज हम इसके मायने भूलते चले जा रहे हैं |

प्यार, धोखा, षड्यंत्र और 35 टुकड़े

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एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को 35 टुकड़ों में काटकर बेरहमी से मार डाला, यह न केवल प्यार करने वाले युवक-युवतियों के रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना है, बल्कि यह प्रेम के नाम पर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले आधुनिक शगल से जुड़ा चिंतनीय बिंदु भी है। प्रेम अंधा होता है। इसलिए यह न तो उम्र देखता है और न ही धर्म-जाति-संप्रदाय। यह कब और किसी से भी हो सकता है। राह चलते होने वाला प्रेम मंजिल तक ठीकठाक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दे, तो सोचनीय है कि यह प्रेम है या क्षणिक आकर्षण।

मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है भोजन

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मनुष्य के जीवित रहने के लिए भोजन मूलभूत आवशयकता है। भोजन से ही हमारा शरीर बनता है। भोजन के प्रति हमें सदैव कृतज्ञ होना चाहिए। भारतीय संस्कृति में भोजन को देवता माना गया है। भोजन के कई सारे प्रकार हैं। यह हर जगह अलग-अलग प्रकार से बनता है। जैसी जहाँ की संस्कृति है, वहाँ उस संस्कृति के अनुसार ही भोजन के प्रकार बनते हैं। पूरे जीव सृष्टि को भोजन प्रदान करने का कार्य प्रकृति करती है। फिर चाहे वह कोई सब्जी हो या कोई फल या फिर चावल, गेहूँ आदि की फसल हो। यह सब कुछ हमें पृथ्वी की प्रकृति की वजह से प्राप्त होता है।

मोरबी त्रासदी से सबक ले देश

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जाहिर है, मोरबी त्रासदी पूरे देश के लिए चेतावनी होनी चाहिए। हर श्रेणी के पुलों तथा फ्लाई ओवरों की गहन समीक्षा होनी चाहिए। सभी राज्य इसके लिए आदेश जारी कर एक निश्चित समय सीमा के अंदर समीक्षा रिपोर्ट मंगवाए और उसके अनुसार जहां जैसी मरम्मत या बदलाव की जरूरत हो वो किया जाए। समीक्षा हो तो ऐसी अनेक पहलें निकलेंगे जिन्हें तत्काल बंद करने का ही विकल्प दिखाई देगा। कुछ ऐसे पुल हैं जिन्हें तोड़कर नए सिरे से बनाना होगा। समस्या को टालने से वह और विकराल होता है। जो समस्या सामने है उनका समाधान भविष्य का ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। मोरबी त्रासदी ने हम सबको झकझोरा है लेकिन अगर देश ने इसे सबक नहीं लिया तो ऐसी त्रासदी बार-बार होती रहेंगी। स्वयं मोरबी और राजकोट प्रशासन को आगे यह निर्णय करना होगा कि पुल को रखा जाए या नहीं और नहीं रखा जाए तो इसका विकल्प क्या हो सकता है। 

जीवनशैली सांस्कृतिर दापोन (जीवनशैली ही संस्कृति का दर्पण)

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पूर्वोत्तर के आठों राज्य लगभग समान संस्कृति साझा करते हैं। उन्होंने आधुनिकता के प्रवाह के बावजूद अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखा है। धीरे-धीरे देश और दुनिया के अन्य भागों के लोगों तक उनकी सांस्कृतिक विशेषताएं पहुंचने लगी हैं। स्वतंत्रता के पश्चात लगभग सात दशकों तक हाशिए पर रख दिए जाने के बाद पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में भी विकास की गंगा प्रवाहमान होने लगी है।

24 x 7 काम ही काम

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कोरोना आपदा ने हमारे जीवन में काफी कुछ बदल दिया है। पहले जो लोग जिंदगी को बेफिक्र अंदाज में जीते थे, बगैर किसी की परवाह किए, अब वे भी हर छोटी-छोटी सी बात की परवाह करने लगे हैं। कोरोना ने न सिर्फ जीवन के प्रति हमारा नजरिया बदल दिया है, बल्कि हमारे रहन-सहन का ढंग, खान-पान की आदतें, हमारे जीवन में रिश्तों की अहमियत तथा हमारे कामकाज का ढंग आदि बहुत कुछ भी प्रभावित हो गया है।

वर्क फ्रॉम होम का टेंशन

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आप  और हम अपने आप को कितना भी मां सरस्वती के पुत्र कहते रहे हैं पर असली में तो मां सरस्वती का वरद हस्त प्राप्त आठ बाय तीन इंची लाड़ले बच्चे मोबाइल को ही है।

खरीदारी सबसेऽऽऽ सुखद अनुभूति

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किसी भी महिला के जीवन के सबसे सुखद क्षणों में से एक होता है, जब वह अपनी खरीदारी के शौक के पलों को जी रही होती है। उस समय उस महिला के चेहरे पर जो मुस्कान होती है, उसका मोल चुकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसके कुछ क्षणों के पश्चात् ही उस परिवार के पुरुष की जेब ढीली हो चुकी होती है।

खत लिखने की खत्म होती परम्परा

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चिट्ठियों से होते हुए हम ईमेल तक पहुंच गए हैं लेकिन उसे भुला नहीं पाए हैं। पिछली कितनी ही पीढ़ियों के जीवन में सांस और रक्त की तरह रही थीं चिट्ठियां। लेकिन वर्तमान पीढ़ी उसे भूल चुकी है। उन्हें धैर्य शब्द का मतलब ही नहीं मालूम, जबकि चिट्ठियां धैर्य की परीक्षा लेती हैं।

वृद्धजनों का करें मान-सम्मान

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लोग भूल जाते हैं कि उन्हें भी वृद्ध होना है। आज जो व्यवहार वे अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, वही व्यवहार उनके बच्चे उनके साथ भी कर सकते हैं, क्योंकि वे अपने बच्चे को जैसे संस्कार देंगे, वे उसी के अनुसार व्यवहार करेंगे। इसलिए सबको चाहिए कि वे अपने माता-पिता एवं सभी वृद्धजनों का मान-सम्मान करें तथा अपने बच्चों को भी इसकी शिक्षा दें। इस प्रकार हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर पाएंगे।

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