| छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास ने अपने प्रेरणादायी आदर्श जीवन और दासबोध ग्रंथ से व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र जीवन में आनेवाली विविध चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत किया है, जो वर्तमान में भी प्रासंगिक एवं मार्गदर्शक है। |
भारतीय संत-परम्परा में समर्थ रामदास महाराज का स्थान अत्यंत ऊंचा और विशिष्ट है। वे केवल एक संत, योगी अथवा अध्यात्मिक गुरु ही नहीं थे बल्कि राष्ट्र-निर्माण विचारधारा के प्रखर प्रवक्ता भी थे। प्रत्येक वर्ष माघ शुक्ल नवमी को मनाई जाने वाली रामदास नवमी (इस वर्ष 11 फरवरी) हमें उनके श्रेष्ट विचारों, राष्ट्र-धर्म के प्रति उनके योगदान तथा उनके अमर ग्रंथ ‘दासबोध’ की प्रासंगिकता पर चिंतन करने का अवसर प्रदान करती है।
वर्तमान में जब समाज अनेक नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चुनौतियों से जूझ रहा है तब समर्थ रामदास का चिंतन और दासबोध ग्रंथ का मर्म पहले से कहीं अधिक मार्गदर्शक सिद्ध होता है।
समर्थ रामदास: वन और साधना
समर्थ रामदास महाराज का जन्म 1608 ई. में महाराष्ट्र के जाम्ब गांव में हुआ। उनका बचपन से ही आध्यात्मिक झुकाव था। प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति ने ही उन्हें रामदास नाम दिया। उन्होंने कठोर तप, भ्रमण और साधना के माध्यम से न केवल आत्मोन्नति की बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का मार्ग भी प्रशस्त किया। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्चा साधु समाज से पलायन नहीं करता बल्कि समाज को जागृत करता है।
राष्ट्र-धर्म की अवधारणा और रामदास का योगदान
समर्थ रामदास का सबसे बड़ा योगदान राष्ट्र-धर्म की अवधारणा को आध्यात्मिक आधार प्रदान करना है। उनके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ या व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं था बल्कि राष्ट्र की रक्षा, समाज की संगठित शक्ति और स्वराज्य की स्थापना भी धर्म का ही अंग थी। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को भली-भांति समझा और हिंदू समाज को आत्मगौरव, शौर्य तथा संगठन का संदेश दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज को उनका मार्गदर्शन इस बात का जीवंत उदाहरण है। समर्थ रामदास ने छत्रपति शिवाजी महाराज को केवल एक योद्धा नहीं बल्कि धर्म, न्याय और लोककल्याण पर आधारित राज्य की कल्पना दी। हिंदवी स्वराज्य की प्रेरणा में समर्थ रामदास के विचारों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संत और सत्ता परस्पर विरोधी नहीं बल्कि राष्ट्रहित में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
दासबोध ग्रंथ : स्वरूप और मर्म
‘दासबोध’ समर्थ रामदास का प्रमुख और अमर ग्रंथ है। यह ग्रंथ 20 दशक और 200 समासों में विभाजित है। सरल, सहज और लोकभाषा में रचित यह ग्रंथ गुरु-शिष्य संवाद के रूप में प्रस्तुत है। दासबोध का मूल उद्देश्य मनुष्य को आत्मिक, नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर सक्षम बनाना है।
दासबोध का मर्म यह है कि मनुष्य पहले स्वयं को पहचाने, अपने दोषों को दूर करे और फिर समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी बने। इसमें आत्मज्ञान, भक्ति, वैराग्य के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन के सूत्र भी दिए गए हैं। आलस्य, अहंकार, लोभ, भय और अज्ञान जैसे दुर्गुणों से मुक्त होकर साहस, विवेक, परिश्रम और कर्तव्यनिष्ठा को अपनाने का संदेश दासबोध का केंद्रीय भाव है।
सामाजिक और नैतिक मार्गदर्शन
दासबोध ग्रंथ केवल साधकों के लिए नहीं बल्कि गृहस्थ, व्यापारी, शासक, विद्यार्थी और सामान्य नागरिक, सभी के लिए उपयोगी है। इसमें पारिवारिक जीवन, सामाजिक आचरण, नेतृत्व, न्याय और नीति पर गहन विचार मिलते हैं। समर्थ रामदास कहते हैं कि व्यक्ति का चरित्र ही राष्ट्र का चरित्र बनाता है। यदि नागरिक सदाचारी, कर्तव्यपरायण और निर्भीक होंगे तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा।
वर्तमान समय में दासबोध की प्रासंगिकता
आज का युग भौतिक प्रगति का है, किंतु नैतिक मूल्यों के क्षरण का भी साक्षी है। स्वार्थ, उपभोक्तावाद, हिंसा और वैचारिक भ्रम ने समाज को असंतुलित कर दिया है। ऐसे समय में दासबोध ग्रंथ हमें आत्मसंयम, विवेक और कर्तव्य की याद दिलाता है। यह ग्रंथ सिखाता है कि अधिकारों से पहले कर्तव्यों का बोध आवश्यक है।
राष्ट्र-धर्म की दृष्टि से भी दासबोध अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें सिखाता है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं बल्कि साझा संस्कृति, मूल्य और उत्तरदायित्व का बोध है। आज जब राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की आवश्यकता है तब समर्थ रामदास का यह संदेश- ‘पहले स्वयं सुदृढ़ बनो, फिर समाज और राष्ट्र को सुदृढ़ करो’ अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
युवाओं के लिए दासबोध एक प्रेरणास्रोत है। यह उन्हें आत्मविश्वास, परिश्रम और लक्ष्यबोध सिखाता है। समर्थ रामदास निर्भीकता और पुरुषार्थ पर विशेष बल देते हैं। वे कहते हैं कि निराशा और भय सबसे बड़े शत्रु हैं। आज के युवा यदि दासबोध के विचारों को आत्मसात करें तो वे न केवल व्यक्तिगत सफल
ता प्राप्त करेंगे बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि रामदास नवमी केवल एक तिथि नहीं बल्कि समर्थ रामदास के विचारों को आत्मसात करने का संकल्प दिवस है। उनका जीवन और दासबोध ग्रंथ हमें यह सिखाता है कि अध्यात्म और राष्ट्र-धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्चा अध्यात्म वही है जो समाज को जागृत करे और राष्ट्र को सशक्त बनाए।
आज आवश्यकता है कि हम दासबोध के मर्म को समझें, उसे अपने जीवन में उतारें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में राष्ट्र-निर्माण में योगदान दें। यही समर्थ रामदास को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही रामदास नवमी का वास्तविक संदेश भी है।
-लवकुश तिवारी
