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UGC: क्या सामाजिक विभाजन का एक षड्यंत्र है?

UGC: क्या सामाजिक विभाजन का एक षड्यंत्र है?

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 पर रोक के साथ देश में इसके विरुद्ध चल रहा आक्रामक विरोध थम गया। इसका भविष्य अब उच्चतम न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगा।

वस्तुत: विश्वविद्यालय के शैक्षणिक संस्थानों में जाति भेदभाव समाप्त करने या किसी तरह जाति आधारित अपमान या उत्पीड़न आदि के विरुद्ध कार्रवाई के लिए बनाए गए नियमों का ऐसा विरोध होगा, इसकी कल्पना शायद इसके निर्माण करने वालों की नहीं थी। विरोध और उसकी प्रतिक्रिया में समर्थन का अभियान से समाज में एकता और सद्भाव के लिए काम करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के अंदर चिंता पैदा हो रही थी।

जातीय तनाव या विद्वेष की आशंकायें बढ़ रहीं थीं। विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को मीडिया से बात करते हुए अपनी ओर से आश्वस्त किया कि किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री के वक्तव्य का इतना अर्थ लगाया जा सकता था कि सरकार ने इस नियम की आलोचना और विरोधों का संज्ञान लिया और इस पर मंथन चल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार या अधिकतर भाजपा राज्य सरकारों में जाति या मजहब के नाम पर सरकार के स्तर से किसी तरह के पक्षपात या भेदभाव का व्यवहार अभी तक नहीं देखा गया है। तो सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड का व्यावहारिक अनुभव करते हुए भी आखिर इस तरह यूजीसी नियमन के विरोध और उनकी प्रतिक्रिया में समर्थन की आक्रामकता कैसे पैदा हो गई?

किसी भी समाज का विवेकशील व्यक्ति भेदभाव दूर करने या समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाए गए सकारात्मक कदम का समर्थन करेगा। किंतु 13 जनवरी 2026 अधिसूचित होने के साथ देशव्यापी विरोध आरंभ हो गया। इसमें परिसरों में समानता समितियां या इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया था। ऊपरी तौर पर इसमें समस्या नहीं हो सकती। आवाज उठी कि इसका सामान्य जातियों के विरुद्ध दुरुपयोग होगा क्योंकि इसमें केवल अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्र ही जाति-आधारित भेदभाव का दावा कर सकते हैं। दूसरे, इसमें भेदभाव की झूठी शिकायत से सुरक्षा के प्रावधान नहीं है। यानी कोई झूठी शिकायत करता है तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इस पहलू को उच्चतम न्यायालय में भी रेखांकित किया।

न्यायालय ने नियमों को ऐसा अस्पष्ट बताया जिनसे किसे भेदभाव माना जाए और किसे नहीं, इसका फैसला कठिन होगा। इस पर आगे बढ़ने से पहले उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाते समय की गई टिप्पणियां ध्यान रखना आवश्यक है।

न्यायालय ने कहा कि अगर हम इस पर रोक नहीं लगाते तो स्थिति खतरनाक हो जाती। न्यायालय ने कहा कि कृपया कर समाज को पीछे न ले जाए, विश्वविद्यालय में हॉस्टलों में छात्र-छात्रायें रहते हैं और अब अंतरजातीय विवाह भी हो रहे हैं। न्यायालय ने यह भी प्रश्न उठाया कि क्या हम अलग-अलग समुदायों के लिए अलग हॉस्टलों की बात कर अमेरिका की उस स्थिति में जाना चाहते हैं जब श्वेतों और अश्वेतों के अलग-अलग विद्यालय थे? अब केंद्र सरकार को न्यायालय के निर्देश के अनुसार ऐसी समिति बनानी है जिसमें समाज को ठीक से समझने वाले लोग शामिल होंगे और वे इसमें बदलाव का सुझाव देंगे। उन सुझावों के आधार पर बनाए गए नियमन पर उच्चतम न्यायालय अंतिम मोहर लगाएगा।

न्यायालय के मत में पूरे नियमन की भाषा ऐसी है ही नहीं जो कानून और नियम की कसौटी पर खरी उतरे। न्यायालय का कहना था कि विशेषज्ञों को इसे पूरी तरह रीमॉडलिंग करनी करनी पड़ेगी। अगर न्यायालय दुरुपयोग की पूरी संभावना देख रहा है तो फिर इस तरह की ड्राफ्टिंग हुई कैसे?

समाज में भेदभाव के विरुद्ध कोई कानून या नियमन हो और वह कानून और नियमन ही चरित्र में भेदभाव मूलक हो तो उसे क्या कहेंगे। कानून भेदभाव वाला नहीं हो सकता।

जानकारी यह है उसके अनुसार उच्चतम न्यायालय में 2019 में याचिका ले जाने वाली एक्टिविस्ट अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के मसौदे को ही कुछ अन्य उपबंध का सुझाव दे, दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने सीधे शिक्षा विभाग को भेज दिया। इतनी महत्वपूर्ण संसदीय समिति से, जिसमें सभी पार्टियों के अनुभवी सांसद शामिल हों, इस तरह का व्यवहार करें तो किसी को भी तकलीफ होगी।

आखिर जिस नियमन को उच्चतम न्यायालय भेदभावपूर्ण और पक्षपात पूर्ण मान रहा है उसे संसदीय समिति ने कैसे स्वीकार कर लिया? हमारे देश का दुर्भाग्य है कि किसी भी मुद्दे को संवेदनशीलता तथा समाज और देश की एकता अखंडता के दूरगामी दृष्टिकोण ध्यान में रखने की जगह निहित स्वार्थों के साथ अनेक प्रकार के नकारात्मक सोच से व्यवहार करते हैं। उसका परिणाम ऐसा ही आता है।

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इसे कोई नकार नहीं सकता कि दलित और जनजाति समुदाय के साथ हमारे समाज में अतिवाद की सीमा तक भेदभाव हुए। कोई मनुष्य किसी के लिए अछूत हो जाए और उसका स्पर्श किया हुआ पानी तक हम न पियें, इससे ज्यादा अमानवीय कुछ नहीं हो सकता। पर क्या आज भी वही स्थिति है? अब शहरों को छोड़िए गांव में भी कुछ एक अपवाद की घटनाएं छोड़ दें तो यह विषय किताबों तक सीमित है।

आज जिन्हें सवर्ण या कानूनी शब्दावली में सामान्य वर्ग कहते हैं वे दलित या जनजाति लोगों का खान-पान उठना बैठना सब चल रहा है। स्थानीय निकाय से लेकर राज्यों तक के नेतृत्व में दलित, जनजाति और ओबीसी के लोग शीर्ष पर हैं।

जाति के मामले में उच्च होने की मानसिकता रखने वालों बदलाव से स्वयं को सम्मानित किया है। समाज के बदलाव के इस दौर को स्वीकार न कर जो कुछ अतीत में हुआ उसके अनुसार बोलना व्यवहार करना और कानून या नियम बनाना क्या किसी के हित में है? इस नियमन का आधार क्या है?

अगस्त 2019 में, रोहित वेमुला की माँ राधिका वेमुला और पायल तडवी की माँ अबेदा सलीम तडवी की ओर से एक्टिविस्ट अधिवक्ताओं इंदिरा जयसिंह, प्रसन्ना एस. और दिशा वाडेकर ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव-रोधी उपाय लागू करने की माँग की गई।

2016 में तेलंगाना के रोहित वेमुला की आत्महत्या देशव्यापी बवंडर का कारण बना था। प्रचार यही हुआ कि दलित छात्र ने उत्पीड़न और भेदभाव से प्रेरित होकर आत्महत्या कर लिया। मई 2024 में तेलंगाना पुलिस ने उच्च न्यायालय में इसकी क्लोजर रिपोर्ट लगाते हुए लिखा कि रोहित वेमुला अनुसूचित जाति से नहीं बल्कि बद्देरा समुदाय यानी पिछड़ी जाति से था। उसने गलत प्रमाण पत्र बनाकर मेडिकल में नामांकन कराया।

पुलिस के अनुसार उसे भय था कि उसकी असलियत सामने वाले आने वाली है इसलिए उसने आत्महत्या कर लिया। रोहित वेमुला ने अपने आत्यहत्या के पूर्व लिखे पत्र में भी कहीं नहीं लिखा कि दलित होने के कारण हुए उत्पीड़न ने उसे आत्महत्या को विवश किया है। उसने लिखा कि इसके लिए कोई दोषी नहीं है और अपनी मानसिक अवस्था का विवरण दिया है।

सच यह है कि इस देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन, परिवार या ऐसी विचारधाराओं के विरुद्ध अभियान चलाने वाले एनजीओ, एक्टिविस्ट, राजनेताओं आदि ने झूठ फैलाया। उच्चतम न्यायालय में यह विषय इसी रूप में लिया गया। पायल तडवी का विषय रोहित विमला की तरह नहीं है किंतु वहां भी मूल कारण वह नहीं जो बताया गया। तो पूरा विषय फैलाए झूठ पर आधारित है।

यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय सलाहकार परिषद की अनुशंसा पर 2012 में पहली बार विश्वविद्यालय के लिए नियमन बने थे। वह भी केवल अनुसूचित जाति-जनजाति के संदर्भ में था और उसमें दुरुपयोग को हतोत्साहित करने तथा सामान्य समिति में सभी वर्गों के लोगों को शामिल करने का प्रावधान था। इसकी पृष्ठभूमि 2012 में यूपीए शासन काल द्वारा निर्मित और लागू किया गया यूजीसी नियमन था। याचिका में 2012 नियमों के सख्त क्रियान्वयन की माँग की गई थी। इनमें विश्वविद्यालयों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ या इक्वल अफरचुनिटी सेल स्थापित करने की मांग मुख्य थी।

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इसमें कहा गया था कि प्रवेश, मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और कैंपस जीवन में जातिगत पक्षपात होता है और 2012 के ढाँचे का लगभग पूरी तरह से पालन नहीं हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में नोटिस जारी किए, लेकिन मामला जनवरी 2025 तक लंबित रहा। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर यूजीसी द्वारा तैयार पहला मसौदा थोड़ा संतुलित था। ये फिर उसके विरुद्ध न्यायालय गये और दोबारा आदेश आया। इसकी परिणति हमारे सामने है।

यूपीए काल में कांग्रेस का उद्देश्य खोए हुए मुसलमान, दलित व जनजातियों का वोट वापस लाना था और उसके लिए समाज को विभाजित करने वाले अनेक ढांचे खड़े कर दिए। लक्षित हिंसा विधेयक और यूजीसी नियमन उन्हीं में शामिल था। विरोध के बाद लक्षित हिंसा विधेयक वापस हो गया लेकिन नियमन लागू हुआ। विचार इस पर होना चाहिए था कि यूपीए सरकार में लाए गए उस नियमन की आवश्यकता है या नहीं ?
आंकड़े बताते हैं कि 2019-20 में 173 शिकायतें आईं तो 2023-24 में 378। 2019-20 में कुल छात्रों की संख्या 3 करोड़ 85 लाख के आसपास थी और इसके अनुसार प्रति करोड़ 50 शिकायतें थीं।

2023-24 में लगभग 4 करोड़ 40 लाख छात्र यानी एक करोड़ पर लगभग 84 शिकायतें की गई। कह सकते हैं कि सभी शिकायतें नहीं की गई किंतु यह संख्या अत्यंत कम है और यह सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है।

ध्यान रखने की बात है कि 2019-20 के 173 में से 155 तथा 2023-24 में 378 में से 341 शिकायतों का निपटारा भी हो गया। सच है कि विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षा संस्थानों में सभी जाति के छात्र एक दूसरे के साथ रहते हैं और जातीय आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव अपवाद हो सकता है, सामान्य स्थिति नहीं। तो आवश्यकता इसे और सुदृढ़ करने की तथा विश्वविद्यालय में निपटारा हो रहा है तो उसे सशक्त करने की होनी चाहिए।

इस समय पूरे देश में वातावरण हिंदू समाज के बीच एकता का है। हम लंबे समय से देख रहे हैं कि हिंदुत्व के विषय पर धीरे-धीरे लोग जातीय सीमाओं से बाहर निकलकर सामने आते हैं। उसमें ऐसे विधान दूरियां बढ़ाने के भूमिका निभाते हैं जिसकी कोशिश भारत विरोधी या निहित स्वार्थी तत्व लगातार करते रहे।
20 मार्च 2018 से लेकर 19 जनवरी 2026 तक उच्चतम न्यायालय के अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार या भेदभाव से संबंधित तीन महत्वपूर्ण फैसले हैं। उच्चतम न्यायालय ने 2018 की फैसले में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के रिकॉर्ड का उल्लेख करते कुछ विश्लेषण किया था।

उदाहरण के लिए वर्ष 2015 में इस कानून के तहत न्यायालय द्वारा कुल 15, 638 मुकदमों का निपटारा किया गया। इसमें से 11024 मामलों में या तो अभियुक्तों को बरी कर दिया गया या फिर वे आरोप मुक्त साबित हुए। जबकि 495 मुकदमों को वापस ले लिया गया।

2016 की पुलिस जाँच में अनुसूचित जाति को प्रताड़ित किये जाने के 5347 झूठे मामले सामने आए, जबकि अनुसूचित जनजाति के कुल 912 मामले झूठे पाए गए। कोई नियम बनाते समय इसका ध्यान न रखें तो उसका अर्थ है कि हम समाज में भेदभाव रहित समरस और समता मूलक समाज के रास्ते केवल बाधा खड़ी कर रहे हैं।

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल अपशब्दों का प्रयोग करना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं है, जब तक कि ऐसा कृत्य किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के स्पष्ट इरादे से न किया गया हो। केवल अपमान, गाली देना भले ही आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी हो, तब तक दंडनीय नहीं है, जब तक उसमें जातिगत अपमान का विशिष्ट आशय सिद्ध न हो।

इसके अनुसार अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला तभी बनता है, जब अपमान या गाली-गलौज विशेष रूप से जातिगत आधार पर और सार्वजनिक रूप से की गई हो, न कि केवल व्यक्तिगत विवाद में। अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि अपमान किसी सार्वजनिक स्थान पर और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए किया गया हो। यदि गाली-गलौज व्यक्तिगत विवाद के कारण है, न कि पीड़ित की जाति के कारण, तो यह कानून लागू नहीं होगा।

कोई भी नियमन बनाते समय उच्चतम न्यायालय के इस आदेश के अनुरूप ही होना चाहिए। पिछले अनेक वर्षों से इस मामले में ज्यादा संख्या में दलित और जनजातीय और अन्य पिछड़ी जातियों ने मुसलमान के विरुद्ध दायर किए हैं, जबकि सामान्य वर्ग के मामले काफी कम हो गए हैं।

– अवधेश कुमार

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