उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड की समाप्ति और सभी संस्थानों को विद्यालय शिक्षा बोर्ड से जोड़ने का निर्णय आधुनिक शिक्षा के दृष्टिकोण से मिश्रित, लेकिन सम्भावनाओं से भरा कदम माना जा सकता है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे किस प्रकार लागू किया जाता है।
उत्तराखंड सरकार ने 1 जुलाई 2026 से राज्य मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उसके स्थान पर ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ गठित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। अक्टूबर 2025 में राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद यह निर्णय औपचारिक रूप से लागू होने की प्रक्रिया में है। इस कदम का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में एकरूपता, गुणवत्ता और आधुनिकता को बढ़ावा देना है ताकि सभी छात्र मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सकें।
नए प्रावधान के अनुसार राज्य के सभी मदरसों को अब उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। साथ ही 2026-27 शैक्षणिक सत्र से गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे आधुनिक विषयों को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा। यह परिवर्तन शिक्षा के दायरे को व्यापक बनाने और विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धी युग के अनुरूप तैयार करने की दिशा में एक प्रयास है।

सरकार का तर्क है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पारम्परिक ज्ञान तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि छात्रों को समकालीन समाज और रोजगार की आवश्यकताओं के अनुरूप भी सक्षम बनाना चाहिए। विज्ञान और गणित जैसे विषय विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता और विश्लेषणात्मक सोच को विकसित करते हैं, जबकि सामाजिक विज्ञान उन्हें समाज, संविधान और नागरिक कर्तव्यों की समझ प्रदान करता है। ऐसे में पाठ्यक्रम का आधुनिकीकरण विद्यार्थियों के समग्र विकास में सहायक हो सकता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह निर्णय केवल मुस्लिम मदरसों तक सीमित नहीं है बल्कि राज्य के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों- मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी पर समान रूप से लागू होगा। इससे शिक्षा के क्षेत्र में समान मानकों और पारदर्शिता की स्थापना का प्रयास दिखाई देता है। समान नियमों के अंतर्गत संचालित संस्थान विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों को अधिक सुलभ बना सकते हैं।

हालांकि किसी भी शैक्षणिक ढांचे में परिवर्तन स्वाभाविक रूप से चुनौतियां लेकर आता है। पारम्परिक संस्थानों के लिए नए पाठ्यक्रम और मानकों के अनुरूप ढलना समय और संसाधनों की मांग कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार संक्रमण काल में आवश्यक मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि यह बदलाव सहज और प्रभावी ढंग से लागू हो सके।
समग्र रूप से देखा जाए तो यह निर्णय शिक्षा सुधार की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा प्रतीत होता है। यदि इसे संतुलित, संवादात्मक और सहयोगात्मक तरीके से लागू किया गया तो यह कदम राज्य के विद्यार्थियों को आधुनिक ज्ञान, कौशल और अवसरों से जोड़ने में सहायक सिद्ध हो सकता है। शिक्षा समाज के निर्माण का आधार है और उसका उद्देश्य सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करना होना चाहिए। उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा सकता है।
यह कदम आधुनिक शिक्षा की दिशा में सकारात्मक सिद्ध हो सकता है, बशर्ते इसे संवेदनशीलता, समावेशिता और पर्याप्त संसाधनों के साथ लागू किया जाए। शिक्षा का उद्देश्य किसी भी समुदाय की पहचान को कमजोर करना नहीं बल्कि विद्यार्थियों को व्यापक अवसरों से जोड़ना होना चाहिए। यदि यही संतुलन बना रहा तो यह निर्णय राज्य के शिक्षा परिदृश्य को सशक्त बना सकता है।
-डॉ. राकेश भट्ट
