बच्चों का मन कोरे कागज की तरह होता है जो लिखेंगे वही बालमन पढ़ेगा। बच्चों में नैतिक विकास के लिए आवश्यक है कि उन्हें धर्म व आस्था से जोड़ा जाए। एनिमेटेड सीरियल, फिल्म व कहानी के माध्यम से उन्हें पौराणिक कथाएं, रामायण आदि की जानकारी दी जा सकती है।
लगातार बदलती दुनिया में आज जहां एक ओर मानव समुदाय लगातार आर्थिक एवं भौतिक उन्नति के पथ पर अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का पतन, मानसिक तनाव सम्बंधी समस्याएं, नशे की प्रवृत्ति और अपराधीकरण भी बढ़ रहा है। भारतीय समाज भी इससे अछूता नहीं रहा है। समाज एवं परिवार से टूटकर नई पीढ़ी एकाकीपन की ओर बढ़ रही है

जिसका मूल कारण धार्मिक-सामाजिक मूल्यों की कमी है। इन मूल्यों की स्थापना पहले संयुक्त परिवारों में आपसी मेलजोल, दादी-नानी की कहानियों, सामुदायिक क्रियाकलापों, परम्पराओं एवं रस्मों तथा विविध धार्मिक कार्यक्रमों एवं अनुष्ठान के माध्यम से होती थी जो एक तरह से धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा को नई पीढ़ी के बच्चों के भीतर आत्मसात करने में सहायक होते थे, लेकिन आधुनिकता और शहरीकरण के कारण आज धर्म एवं आस्था से जुड़ने के माध्यम भी बदल गए हैं।
आज पूरा समाज सोशल मीडिया एवं इंटरनेट से जुड़ा हुआ है, ऐसे में बच्चों को धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा हेतु ऐसे कंटेंट भी सोशल प्लेटफार्म्स पर ही उपलब्ध कराना आवश्यक है। इनमें पौराणिक कथाओं पर रील्स, कविताएं, गीत, डांस, एनिमेटेड विडियोज, कार्टून विडियोज, धार्मिक और नैतिक मूल्यों पर प्रतियोगितात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों के भीतर धर्म-आस्था और नैतिक मूल्यों का बीजारोपण किया जा सकता है।

इस प्रकार का कंटेंट बहुत ही लाभदायक सिद्ध हो सकता है क्योंकि बच्चे जो देखते हैं, वही करने का प्रयास करते हैं। वर्तमान बाल मनोविज्ञान भी कहता है कि जितनी अधिक इंद्रियां सक्रिय होंगी अधिगम उतना ही अधिक होगा। अधिगम का अर्थ सीखने से है। बच्चा जब देखता भी है, सुनता भी है, कई बातों पर प्रतिक्रियास्वरूप बोलता भी है तो वह उसमें रुचि लेने लगता है और इस प्रकार वे मूल्य और शिक्षाएं उसके व्यवहार में रूपांतरण लाने लगते हैं।
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पुराणों की कथाएं गूढ़ धार्मिक विषयों को सरल करके व्यवहारिक जीवन के प्रसंगों के द्वारा लोगों को शिक्षित करने का कार्य करती हैं। यही कथाएं जब इन कंटेंट्स के माध्यम से बालमन तक पहुंचती है तो उन्हें नैतिक एवं चारित्रिक रूप से मजबूत बनाती हैं ताकि वे जीवन में हर कठिनाई का सामना बिना टूटे कर सकें। पौराणिक कथाओं में सार रूप में संदेश दिया गया है कि परोपकार सबसे बड़ा पुण्य और किसी को कष्ट पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है। ये शिक्षाएं बच्चों के मन को निर्मल करके सत्यनिष्ठा के मूल्यों का विकास करती हैं।

आज के समय में विभिन्न सीरियल्स, एनिमेटेड वीडियोज एवं वेब सीरीज के माध्यम से बच्चों तक आस्था और धर्म से जुड़ा कंटेंट पहुंच रहा है। यह कुछ सीमा तक उपयोगी भी है क्योंकि कथाओं के सीरियलों के माध्यम से बच्चों में ऐतिहासिक पात्रों की जानकारी और कथाओं का ज्ञान होता है। इसे और अधिक प्रभावकारी बनाने के लिए अभिभावकों और परिवार के सदस्यों का आचरण भी नैतिक शिक्षाओं को प्रोत्साहित करने वाला होना चाहिए।
प्रसन्नचित्त वातावरण, सामुदायिक आयोजनों में बच्चों की सहभागिता एवं धार्मिक शिक्षा के केंद्र स्थापित करके उनके द्वारा समय-समय पर कैंप आयोजित करके बच्चों में आस्था और मूल्यों का विकास किया जा सकता है। बच्चों में मंदिर, तीर्थ-क्षेत्रों में नियमित जाने एवं वहां पर पूजा-पाठ, साफ-सफाई, भंडारा, साधु सेवा आदि का अभ्यास करके अहंकार का त्याग, सामाजिक एकता का भाव एवं मानव सेवा हेतु समर्पित मूल्यों का अभ्यास करके सनातन मूल्यों की ओर अग्रसर किया जा सकता है।
-डॉ. हिमांशु थपलियाल

