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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता

by हिंदी विवेक
in अप्रैल 2026, संस्कृति
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भारतीय संस्कृति में आदर्शों से सीख लेने की परम्परा है क्योंकि आदर्श जितने महान होंगे समाज भी उतना ही कर्तव्यनिष्ठ और धर्मपरायण होगा। इस आधार पर श्रीराम भक्त हनुमानजी का आदर्श और उनके गुणों को अपने व्यक्तित्व तथा जीवन में उतारकर वर्तमान पीढ़ी भी अपना जीवन संवार सकती है

संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जिसमें बाधा न हो और ऐसी कोई बाधा नहीं जिसका समाधान न हो। बाधाओं को पार करके अपने लक्ष्य की ओर वही लोग पहुंच पाते हैं जिनका जीवन ध्येयनिष्ठ है, जिनकी बुद्धि और विवेक जाग्रत है और जो समयानुरूप उचित निर्णय लेते हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि नेतृत्व और मार्गदर्शन कैसा हो। हनुमानजी का व्यक्तित्व इन्हीं विशिष्टताओं से समृद्ध है।

हनुमानजी ऐसे अनूठे व्यक्तित्व के धनी हैं जो जीवन के प्रत्येक आयाम पर सफलतम रहे। पुराण कथाओं के अनुसार हनुमानजी भगवान शिव के अंश हैं। उनकी गणना ग्यारहवें रुद्र के रूप में होती है। वे बल बुद्धि के निधान और देवों में सबसे विशिष्ट हैं। उनकी गणना 7 चिरंजीवियों में की जाती है। उनके चिरंजीव होने की मान्यता में दो दृष्टियां हैं। एक पूजा, आराधना, उपासना और भक्ति की दृष्टि। इसके अतिरिक्त उनके व्यक्तित्व से मिलने वाले संदेश की दूसरी दृष्टि।

हनुमानजी इस दृष्टि से भी कालजयी हैं। समय की यात्रा मनुष्य की जीवनशैली, मान्यता और प्राथमिकता बदल देती है। समय के साथ समस्या और उनके समाधान का स्वरूप भी बदलता है, लेकिन हनुमानजी की सीख में जीवन का मूलतत्व है। उनके कार्यों में बल, बुद्धि, युक्ति, दूरदृष्टि, व्यक्ति की परख के अनुरूप व्यवहार और भावी रणनीति का अद्भुत संदेश छिपा है। यदि बल की दृष्टि से देखें तो वे सूर्य को निगल सकते हैं, समुद्र को पार कर सकते हैं, पर्वत उठा सकते हैं, लंका का दहन कर सकते हैं, पाताल जाकर भगवान राम और लक्ष्मणजी को अहिरावण के बंधन से मुक्त करा सकते हैं। इतना बल और वीरता होने के बाद भी वे सदैव शांत रहते हैं, अपने बल, बुद्धि अथवा शौर्य का प्रदर्शन नहीं करते और न कभी उन्होंने स्वयं अपने कार्यों का वर्णन किया।

सबसे पहले शिक्षक का चयन। हनुमानजी माता-पिता की सलाह से शिक्षा के लिए सूर्यदेव के पास गए, लेकिन सूर्यदेव के पास समय न था, वे गतिमान रहते हैं। हनुमानजी ने उनकी गति से उनके सम्मुख चलते हुए शिक्षा ग्रहण की। सूर्यदेव को प्रकाश, ज्ञान और ऊर्जा संचार में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हनुमानजी ने उन्हीं से शिक्षा ली। हनुमानजी द्वारा शिक्षा ग्रहण करने के संकल्प और अपने गुरु के प्रति एकाग्रता का संदेश है। जो युवा एकाग्रता के साथ क्लॉस अटेंड करते हैं, पढ़ाई जा रही शिक्षा को पूर्णता के साथ ग्रहण करते हैं वही बच्चे प्रथम श्रेणी और प्राविण्य सूची में अपना स्थान बनाते हैं।

हनुमानजी के जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु मार्गदर्शक और नेतृत्व का चयन करना है। पहले सम्पूर्ण वानर समूह एकसाथ था, लेकिन बालि और सुग्रीव के बीच विवाद हुआ तो वानर समूह दो भागों में बंट गया। बालि राजा बना और सुग्रीव को प्राण बचाकर भागना पड़ा। सुग्रीव के साथ जामवंतजी नल-नील आदि कुछ वानर समूह भी राजधानी पम्पापुर से चल दिए। हनुमानजी चाहते तो राजा बालि के साथ रह सकते थे, लेकिन उन्हें बालि के भविष्य का अनुमान हो गया होगा तो वे भी सुग्रीव के साथ चल दिए। सुग्रीव की टोली में जामवंतजी सबसे वरिष्ठ और अनुभवी थे। यह समूह उन्हीं से सलाह लेकर काम करता था। हनुमानजी ने उन्हीं को अपना मार्गदर्शक बनाया। जामवंत जी की सलाह पर सुग्रीव ने रहने के लिए ऋष्यमूक पर्वत चुना। पर्वत के नीचे वनक्षेत्र में राम-लक्ष्मणजी को घूमते देखा तो उनका परिचय जानने के लिए जामवंतजी की सलाह पर ही सुग्रीव ने हनुमानजी को भेजा।

यदि रामचरितमानस के किष्किंधा कांड, सुंदर कांड और लंका कांड में वानर सेना अथवा हनुमानजी की कार्यशैली समझें तो मार्गदर्शक के रूप में सदैव जामवंतजी रहे हैं। वही समाज संगठित और उन्नतिशील होता है जिस समाज के वरिष्ठ, अनुभवी और योग्यजन मार्गदर्शन करते हैं। युवाओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे योग्यता अथवा डिग्री में आगे हो सकते हैं, लेकिन परिवार और कुटुम्ब के वरिष्ठजनों से मार्गदर्शन भी प्राप्त करें।

हनुमानजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष अपने बल अथवा शौर्य का दिखावा नहीं करना भी है। इसकी झलक माता सीता की खोज के लिए वानर सेना की मंत्रणा में मिलती है। समुद्रपार करके लंका जाने की मंत्रणा चली तो हनुमानजी शांत बैठे रहे। उन्होंने अपनी ओर से कुछ न कहा, जब जामवंतजी ने उन्हें प्रेरित किया तो बिना कोई क्षण गंवाए चल दिए। हनुमानजी के सभी कार्य पराक्रम और पुरुषार्थ से भरे हैं, लेकिन उन्होंने कभी प्रदर्शन नहीं किया, अपनी बल बुद्धि की डींग नहीं हांकी और न किसी कार्य का श्रेय स्वयं लिया।

उनकी विनम्रता की यह झलक लंका दहन के बाद दिखाई देती है। माता सीता का संदेश लेकर हनुमानजी जब रामजी के पास लौटे, तो रामजी ने उनके बल की सराहना की तब हनुमानजी ने बड़ी विनम्रता से कहा कि यह मेरा बल नहीं आपके नाम का यश है। व्यक्ति की श्रेष्ठता तब प्रतिष्ठित होती है जब वह उच्चतम कार्य परिणाम पर भी शांत बना रहे और अपने वरिष्ठ जनों के चरणों में श्रेय अर्पित कर दे।

कार्य की सफलता बुद्धि और विवेक के साथ यात्रा में मिलने वाले व्यक्तियों को पहचानकर बात करना भी महत्वपूर्ण होता है। हनुमानजी ने व्यक्तियों को पहचानने में कभी कोई चूक नहीं की। उन्होंने ही रामजी को पहचानकर सुग्रीव से परिचय कराया था। व्यक्ति पहचानकर उसके अनुरूप व्यवहार करने की यह विशेषता हनुमानजी की श्रीलंका यात्रा में भी देखा जा सकता है। माता सीता की खोज के लिए हनुमानजी समुद्री मार्ग से श्रीलंका की ओर प्रस्थित हुए। मार्ग में उन्हें अनेक लोग मिले। मैनाक पर्वत ने कहा कि यात्रा लम्बी है, तनिक विश्राम कर लीजिए, लेकिन हनुमानजी नहीं रुके। उन्होंने कहा ‘राम काज कीजे बिना, मोहे कहां विश्राम’ हनुमानजी के इस उत्तर में युवाओं को यह स्पष्ट है कि लक्ष्य की पूर्ति के बिना किसी प्रकार की शिथिलता नहीं होनी चाहिए। हनुमानजी आगे बढ़े। नागों की माता सुरसा ने उनका मार्ग रोककर उन्हें निगलने का अभिनय किया और कहा कि ‘आज सुरन्ह मोहि दीन अहारा’ अर्थात आज देवताओं ने मुझे अच्छा आहार दिया। इस एक वाक्य से हनुमानजी समझ गए कि यह राक्षसी नहीं देवों की प्रतिनिधि हैं।

चूंकि सात्विक और देव प्रवृत्ति के लोग स्वयं श्रेय नहीं लेते देवताओं के देते हैं। हनुमानजी ने पहले तो बचने का अभिनय किया फिर अति लघुरूप लेकर सिर नीचा करके विदा मांगी। सुरसा प्रसन्न हुई आशीर्वाद दिया और चली गईं हनुमानजी श्रीलंका के द्वार पर पहुंचे। नगर द्वार की रक्षा लंकिनी कर रही थी। हनुमानजी मच्छर के समान अति लघु रूप में प्रवेश करना चाहा, लेकिन लंकिनी ने देख लिया। लंकिनी ने बहुत रोष से कहा- ‘जानेहु नहिं मरम सठ मोरा’ अर्थात अरे मूर्ख तू मेरी सामर्थ्य को नहीं जानता यह वाक्य सुनते ही हनुमानजी ने एक घूंसा लंकिनी को मारा। वह घायल हो गई और हनुमानजी ने लंका में प्रवेश कर लिया।

 

यहां एक बात विचारणीय है कि हनुमानजी ने देवि सुरसा को माता कहा, हाथ जोड़े जबकि लंकिनी को घूंसा मारा। दोनों ने केवल एक एक वाक्य बोला, लेकिन हनुमानजी का व्यवहार दोनों से अलग-अलग रहा। इसका रहस्य दोनों के वाक्य में छिपा है। सात्विक वृत्ति के लोग स्वयं श्रेय नहीं लेते इसलिए सुरसा ने कहा देवताओं ने आहार दिया जबकि लंकिनी ने कहा अरे मूर्ख तू मेरा सामर्थ्य नहीं जानता। यहां मैं का उपयोग है। मैं का उपयोग अहंकार का प्रतीक है। यह समझने में हनुमानजी को देर नहीं लगी। वे समझ गए कि लंकिनी असुर कुल की है। लक्ष्य पूर्ति की यात्रा में यह आवश्यक है कि मार्ग में बाधा के रूप में दिखाई दे रहे व्यक्ति अथवा घटनात्मक स्वरूप से किस प्रकार सामना करके आगे बढ़ा जाए।

युवाओं के लिए हनुमानजी का एक संदेश उचित नेतृत्व के अंतर्गत काम करने और सदैव अपने कार्य दायित्व की सीमा में रहने का भी है। अपने जीवन के आरम्भिक काल में हनुमानजी रामजी की टोली में नहीं थे, वे सुग्रीव की टोली के सदस्य थे। रामजी से परिचय हुआ और वे रामजी के अनुयायी बने। सुग्रीव का आचरण अहंकार से मुक्त सत्य पर आधारित तो था लेकिन स्वभाव में भीरुता थी।

इसलिए वह छिपकर बैठ गया था। नेतृत्व की भीरुता अधिकतर पराक्रमी अनुयायियों की प्रतिभा का दमन कर देती है जबकि वीर और पुरूषार्थी नेतृत्व पूरे समूह की प्रतिभा निखारता है। कल्पना कीजिए हनुमानजी रामजी के सम्पर्क में न आते और पूरा जीवन सुग्रीव के सानिध्य में ही रहते तो क्या उनकी प्रतिभा, बल और बुद्धि का परिचय संसार को मिल पाता? युवाओं को संदेश है कि यदि वीर हो तो वीर के नेतृत्व में ही काम करो।

हनुमानजी की विनम्रता और दूरदृष्टि का एक संदेश बाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में भी है। लव और कुश ने अयोध्या के यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया था। न तो अयोध्यावासी जानते थे कि ये दोनों बालक अयोध्या के राजकुमार हैं और न लव-कुश ही परिवार से परिचित थे। भीषण युद्ध ठन गया। यह वन क्षेत्र महर्षि बाल्मीकि आश्रम की सीमा से लगा हुआ था। हनुमानजी को यह जानकारी थी कि माता सीता इसी आश्रम में हैं।

लव-कुश की युद्ध शैली देखकर हनुमानजी हत्प्रभ हुए। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। यह हनुमानजी की दूरदृष्टि थी कि उन्होंने लव कुश के साथ युद्ध करने से बचने का मार्ग निकाला और चुपचाप बंदी बन गए।

हनुमानजी के जीवन में दूरदर्शिता, बुद्धि विवेक, बल पराक्रम, धैर्य, संयम की ऐसी असंख्य घटनाएं हैं। उन्होंने सदैव बिना कोई क्षण गंवाए अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ने का मार्ग निकाला है। आज भले समय बदल गया है। प्राथमिकता और कार्यशैली भी बदली है लेकिन सफलता के मूलतत्व में कोई परिवर्तन नहीं आया। लक्ष्य तक पहुंचने की पहली प्राथमिकताएं वही हैं जिनका संदेश हनुमानजी के जीवनवृत से मिलता है।

यदि बल-बुद्धि है लेकिन विवेक कम है तो लक्ष्य प्रभावित होगा। यदि बुद्धि, बल और विवेक तीनों हैं लेकिन अपनी योग्यता के प्रदर्शन का भाव है तब भी परिणाम प्रभावित होता है। यह सब गुण हैं लेकिन उचित नेतृत्व और मार्गदर्शन का अभाव हो तब भी प्रतिभा का समुचित उपयोग नहीं हो पाता। आज की पीढ़ी को विशेषकर युवाओं को हनुमानजी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि वे अपने भीतर बुद्धि, बल, विवेक, धैर्य, दूरदर्शिता, उचित व्यक्ति से उचित व्यवहार हो और इसके साथ उचित मार्गदर्शन और योग्य नेतृत्व भी हो।

-रमेश शर्मा

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