| आतंकवाद के विरुद्ध भारत की प्रहार नीति (प्रोएक्टिव स्ट्राइक पॉलिसी) सीमा पार से होने वाली आतंकी गतिविधियों को नाकाम करने की एक सशक्त रणनीति है। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ’आतंक के स्रोतों’ को उनके गढ़ में ही नष्ट करने पर बल देती है। जिससे आतंकवाद के प्रायोजकों के मनोबल को भी गहरा आघात पहुंचता है। यह नीति राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सरकार की शून्य-सहिष्णुता की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। |
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनौतियां अब पारम्परिक नहीं रहीं। आतंकवाद अब केवल सीमा पार से होने वाली गोलाबारी तक सीमित नहीं है, यह विचारधारा, अत्याधुनिक तकनीक, अंतर्जाल (साइबर स्पेस) और स्थानीय तंत्र के जरिए पनपने वाला एक बहुआयामी संकट बन चुका है। इस बदलते परिदृश्य में गृह मंत्रालय द्वारा घोषित ‘प्रहार’ नीति भारत की सुरक्षा रणनीति में एक सकारात्मक, सशक्त और दूरगामी बदलाव का उद्घोष है। यह भारत की पहली व्यापक, सक्रिय और गुप्तचर-आधारित राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति है।
रणनीतिक दर्शन: ’प्रतिक्रिया’ से ’पूर्व-निवारण’ तक
दशकों तक हमारी रणनीति ’आघात सहकर उत्तर देने’ की रही है। ’प्रहार’ इस मानसिकता को जड़ से बदलती है। यह नीति केवल हमलों पर प्रतिक्रिया देने की योजना नहीं है बल्कि एक ’अग्रसक्रिय रक्षा’ (एक्टिव डिफेंस) के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। सरल शब्दों में कहें तो अब लक्ष्य केवल हमलों का उत्तर देना नहीं बल्कि हमले के षड्यंत्र और उसकी सम्भावना को ही गर्भ में समाप्त कर देना है।
यह रणनीति तीन अभेद्य स्तम्भों पर टिकी है:
सटीक पहचान: संकट का समय रहते सूक्ष्म और बुद्धिमत्तापूर्ण आकलन।
त्वरित प्रहार: चिन्हित संकट पर बिना समय गंवाए निर्णायक कार्रवाई।
स्थाई सुदृढ़ीकरण: कार्रवाई के बाद स्थिति को सामान्य बनाना और उस विषैले तंत्र की पुनरावृत्ति को रोकना।
यह नीति वैश्विक सुरक्षा मानकों के अनुरूप है, जो भारत को एक प्रतिक्रियाशील देश की छवि से निकालकर एक सक्रिय राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा करता है।
आतंक के इकोसिस्टम पर अंतिम वार
‘प्रहार’ की आक्रामकता को प्राय: केवल सैन्य कार्रवाई के चश्मे से देखा जाता है, जबकि इसका असली प्रहार शत्रु के इको-सिस्टम पर है। आज का आतंकवाद ‘आघात करो और छिप जाओ’ के सिद्धांत पर आधारित है, जहां शत्रु वार करके भीड़ या डिजिटल अंधेरे में ओझल हो जाता है। ऐसे में केवल रक्षात्मक रवैया पर्याप्त नहीं होता।
यह नीति आतंकियों के वित्तपोषण, रसद आपूर्ति और समाज के बीच छिपे उनके ’छद्म मददगारों’ को ध्वस्त करने पर केंद्रित है। गुप्त सूचनाओं के आधार पर की गई ’लक्षित कार्रवाई’ आतंकियों के मनोबल को तोड़ती है, जो किसी भी स्थाई शांति के लिए अनिवार्य है।

तकनीक: आधुनिक युग का अचूक ’शस्त्र’
आज के युद्ध का असली केंद्र अब तकनीकी क्षेत्र है। ‘प्रहार’ नीति में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फेस रिकग्निशन, डेटा एनालिसिस और निगरानी जैसे आधुनिक उपकरणों को सुरक्षा तंत्र का अभिन्न अंग बनाया गया है। इससे न केवल संदिग्ध गतिविधियों पर दृष्टि रखना सुलभ होगा बल्कि आतंकी षड्यंत्रों को उनके अंजाम तक पहुंचने से पहले ही विफल किया जा सकेगा।
वैचारिक मोर्चे पर एक मौन युद्ध
आतंकवाद का सबसे घातक पहलू उसकी कट्टरपंथी विचारधारा है। यदि युवा गुमराह होकर हिंसा की ओर आकर्षित हो रहे हैं तो इसका समाधान केवल बल प्रयोग से सम्भव नहीं है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आजीविका के अवसर और एक सकारात्मक ’राष्ट्रीय विमर्श’ की आवश्यकता है। ‘प्रहार’ नीति यदि इस वैचारिक मोर्चे और सामाजिक समावेश को समान महत्व देती है तो इसके परिणाम और भी व्यापक होंगे।
आतंकवाद के विरुद्ध पहली लड़ाई प्राय: गलियों, गांवों और छोटे कस्बों में लड़ी जाती है। इसलिए स्थानीय स्तर पर सतर्कता बढ़ाना और ’सामुदायिक सुरक्षा’ को मजबूत करना इस नीति की आत्मा होनी चाहिए। जब सामान्य नागरिक जागरूक होकर संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देते हैं, तब आतंकवाद की जड़ें स्वयं ही निर्बल होने लगती हैं।
एक नए भारत का उदय: सुरक्षा से स्वाभिमान तक
‘प्रहार’ नीति केवल एक सुरक्षा प्रतिवेदन नहीं बल्कि एक कड़ा संदेश है कि भारत अब अपनी सुरक्षा को लेकर रक्षात्मक नहीं बल्कि आत्मविश्वास से परिपूर्ण और निर्णायक दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है। यह एक ऐसे भारत की नींव रखती है, जहां सुरक्षा केवल सरकार का उत्तरदायित्व नहीं बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी बनती है।
यदि इसे प्रभावी क्रियान्वयन और जनभागीदारी का सम्बल मिला तो ‘प्रहार’ सुरक्षित और सशक्त भारत का सबसे मजबूत आधार स्तम्भ सिद्ध होगा। हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जहां राष्ट्र की अखंडता सर्वोपरि होगी।
वैश्विक परिदृश्य में क्यों प्रासंगिक है ‘प्रहार’ नीति?
विश्व की वर्तमान भू-राजनीति में ‘प्रहार’ नीति भारत को उन गिने-चुने देशों की पंक्ति में खड़ा करती है, जिन्होंने अपनी रक्षा रणनीति में ’अग्रसक्रिय हस्तक्षेप’ को वैधानिक स्थान दिया है। आज जब विश्व के विकसित राष्ट्र हाइब्रिड और छद्म युद्ध से जूझ रहे हैं, तब भारत का यह मॉडल वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों के लिए एक अध्ययन का विषय बन गया है। इस नीति ने भारत को एक ’उत्तरदायी वैश्विक शक्ति’ के रूप में स्थापित किया है, जो अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के भीतर रहते हुए कठोरतम निर्णय लेने का साहस रखती है।
वैश्विक रक्षा मंचों पर ‘प्रहार’ की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और राष्ट्रीय स्वाभिमान के बीच एक संतुलित सेतु का निर्माण करती है। यह नीति स्पष्ट करती है कि भारत की शांति का अर्थ उसकी निर्बलता नहीं है। जिस प्रकार वैश्विक महाशक्तियों ने अपनी सम्प्रभुता के लिए ’जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की नीति अपनाई है, ठीक उसी प्रकार ‘प्रहार’ के माध्यम से भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि 21वीं सदी के नए वैश्विक क्रम में हमारी सुरक्षा की शर्तें अब हम स्वयं लिखेंगे। यह सुरक्षित और सशक्त भारत की ओर एक ऐसा कदम है, जिसकी धमक आने वाले कई दशकों तक वैश्विक गलियारों में सुनाई देगी।
-अक्षय शर्मा

