14 अप्रैल का दिन केवल एक औपचारिक जयंती नहीं है। यह दिन भारत के सामाजिक पुनर्जागरण, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना के एक ऐसे महापुरुष को स्मरण करने का दिन है जिसने अपने जीवन के अनुभवों से एक नया सामाजिक विमर्श खड़ा किया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आज केवल संविधान निर्माता नहीं हैं, वे करोड़ों लोगों के आत्मसम्मान का प्रतीक हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें देवतुल्य मानता है।

वैचारिक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि किसी भी व्यक्ति को भगवान बनाना उचित नहीं है, संविधान को आसमानी किताब बनाना उचित नहीं है, क्योंकि हर महापुरुष भी मनुष्य ही होता है और उसके विचारों को तर्क और विमर्श के आधार पर ही समझना चाहिए। लेकिन समाज की वास्तविकता को समझना भी आवश्यक है। सदियों की पीड़ा से गुजरने वाले समाज ने जब पहली बार अपने सम्मान की आवाज सुनी, तो स्वाभाविक रूप से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर उनके लिए आस्था और सम्मान के केंद्र बन गए।
हिंदू चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रकृति है। यह परंपरा विरोध को भी स्वीकार करती है। यही कारण है कि घोर नास्तिक चार्वाक को भी भारतीय परंपरा ने स्वीकार किया। चार्वाक वेदों को नहीं मानते थे, ईश्वर को नहीं मानते थे, आत्मा को नहीं मानते थे, फिर भी उन्हें भारतीय बौद्धिक परंपरा में स्थान मिला। देवगुरु बृहस्पति को चार्वाक दर्शन का प्रणेता माना गया।
भारतीय दर्शन परंपरा में नौ प्रमुख दर्शन माने गए हैं — न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत, बौद्ध, जैन और चार्वाक। इनमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन वेदों को प्रमाण नहीं मानते, फिर भी भारतीय चिंतन परंपरा ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया। यह भारतीय चिंतन की समावेशी प्रकृति का प्रमाण है।
गौतम बुद्ध ने वेदों को प्रमाण नहीं माना, कर्मकांडों का विरोध किया, फिर भी भारतीय समाज ने बुद्ध को अस्वीकार नहीं किया। हिंदू परंपरा में गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार भी माना गया। इस प्रकार बौद्ध मत भारतीय सनातन वैदिक परंपरा का ही एक अंग माना गया। जैसे शैव, शाक्त, वैष्णव, गणपत, जैन परंपराएँ हैं, वैसे ही बौद्ध परंपरा भी भारतीय सनातन चिंतन की एक धारा है। यही हिंदू चिंतन की विराटता है।
उपनिषदों में कहा गया है —
“श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः”
और स्वामी विवेकानंद ने इसी भाव को दोहराते हुए कहा था —
“वयम् अमृतस्य पुत्राः”
अर्थात हम सब अमृत के पुत्र हैं। यह भारतीय चिंतन का मूल दर्शन है हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है, हर व्यक्ति में दिव्यता है। यही भाव डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन संघर्ष में दिखाई देता है। उन्होंने समाज के उस वर्ग को सम्मान दिलाने का प्रयास किया, जिसे सदियों तक वंचित रखा गया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जीवन संघर्ष, विद्वत्ता और आत्मनिर्माण का अद्भुत उदाहरण है। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू (वर्तमान डॉ. आंबेडकर नगर) में हुआ। अत्यंत प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा साधन बनाया। प्रारंभिक जीवन में उन्हें अनेक सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इन्हें अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया।

बड़ौदा के प्रगतिशील शासक महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की। इसी छात्रवृत्ति के आधार पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी अध्ययन किया। उन्होंने अर्थशास्त्र, कानून, राजनीति और समाजशास्त्र जैसे अनेक विषयों का गहन अध्ययन किया और विश्वस्तरीय विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
यह तथ्य इस बात को भी दर्शाता है कि भारतीय समाज में विकृतियाँ अवश्य थीं, लेकिन समाज के भीतर सुधार, सहयोग और प्रतिभा को आगे बढ़ाने की परंपरा भी मौजूद थी। समाज के भीतर ही ऐसे व्यक्तित्व और संस्थाएँ थीं जिन्होंने प्रतिभा को प्रोत्साहित किया और सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जीवन इस बात का उदाहरण है कि भारतीय समाज में सामाजिक सुधार किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि समाज के भीतर से हुए यह तथ्य इतिहास और अनेक महापुरुषों के कार्यों से स्पष्ट होता है। अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन केवल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर तक सीमित नहीं था, बल्कि उनसे पहले और उनके समकालीन अनेक महापुरुषों ने इस दिशा में कार्य किया, और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश सामान्य वर्ग से आते थे।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने 19वीं शताब्दी में वेदों की ओर लौटने का आह्वान करते हुए जन्माधारित जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनकी प्रसिद्ध कृति “सत्यार्थ प्रकाश” (1875) में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि मनुष्य का मूल्य जन्म से नहीं, बल्कि गुण, कर्म और स्वभाव से निर्धारित होना चाहिए। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को जन्म से नहीं बल्कि कर्माधारित बताया। आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा और अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए व्यापक अभियान चलाया।
महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता को “राष्ट्रीय पाप” कहा। “हरिजन” पत्रिका (11 फरवरी 1933) में गांधी जी ने लिखा –
“Untouchability is a blot on Hinduism”
(अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर एक कलंक है)।
गांधी जी ने 1932 के पूना पैक्ट (24 सितम्बर 1932) में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के साथ समझौता कर अनुसूचित जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त किया। गांधी जी ने “हरिजन सेवक संघ” की स्थापना 1932 में की और मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया।
वीर विनायक दामोदर सावरकर ने रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर (1931) की स्थापना की, जहाँ सभी जातियों के लोगों को प्रवेश दिया गया। उनकी पुस्तक “हिंदुत्व” और अन्य लेखों में उन्होंने स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव का विरोध किया। सावरकर ने कहा था —
“जाति हिंदू समाज को कमजोर करती है और इसे समाप्त होना चाहिए”
(सावरकर, रत्नागिरी भाषण, 1933)
मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (1916) की स्थापना करते समय सभी वर्गों के छात्रों को शिक्षा के अवसर प्रदान किए। उन्होंने मंदिर प्रवेश और सामाजिक समरसता के पक्ष में अनेक वक्तव्य दिए।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने संविधान सभा की बहसों (1946-49) में राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि बताते हुए सामाजिक विभाजन को राष्ट्र के लिए खतरा बताया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 से ही शाखाओं में जाति-भेद समाप्त करने का व्यावहारिक प्रयास किया। इस संदर्भ में 1939 पुणे संघ शिक्षा वर्ग का उल्लेख मिलता है, जहाँ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्वयं उपस्थित हुए थे और उन्होंने देखा कि विभिन्न जातियों के स्वयंसेवक साथ रह रहे थे। इसका उल्लेख दत्तोपंत ठेंगड़ी और एच.वी. शेषाद्रि की पुस्तक “एकात्मता के पुजारी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर” में मिलता है।
परम पूज्य माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने भी सामाजिक समरसता पर बल दिया। उनकी पुस्तक “बंच ऑफ थॉट्स” तथा विभिन्न भाषणों में सामाजिक एकता को राष्ट्रीय शक्ति का आधार बताया गया है।
बाला साहेब देवरस ने 8 मई 1974 को पुणे के वसंत व्याख्यानमाला में स्पष्ट कहा —
“यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है”
(वसंत व्याख्यानमाला, पुणे, 1974)
गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और बाद में अवैद्यनाथ ने भी सामाजिक समरसता और मंदिर प्रवेश के पक्ष में आंदोलन चलाए।
यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण का प्रस्ताव केवल डॉ. आंबेडकर द्वारा नहीं, बल्कि संविधान सभा में व्यापक सहमति से पारित हुआ। संविधान सभा में अनेक सदस्यों जैसे सरदार पटेल, गोविंद बल्लभ पंत, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने सामाजिक न्याय के लिए विशेष प्रावधानों का समर्थन किया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का सामाजिक न्याय का चिंतन समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने का नहीं था, बल्कि समाज को बराबरी के स्तर पर लाने का था। उनका स्पष्ट उद्देश्य सामाजिक समरसता, समान अवसर और राष्ट्रीय एकता स्थापित करना था। उन्होंने आरक्षण को भी स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे एक अस्थायी उपाय माना, ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को अवसर मिलें और समाज संतुलन की दिशा में आगे बढ़ सके। इसी कारण संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राजनीतिक आरक्षण को सीमित अवधि के लिए रखा गया।
संविधान सभा में 25 नवम्बर 1949 को अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने लोकतंत्र की नींव को स्पष्ट करते हुए कहा—
“Political democracy cannot last unless there lies at the base of it social democracy.”(Constituent Assembly Debates, 25 November 1949)
अर्थात राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं रह सकता, जब तक समाज में सामाजिक लोकतंत्र स्थापित न हो।
उन्होंने आगे कहा“Social democracy means a way of life which recognises liberty, equality and fraternity as the principles of life.”
(Constituent Assembly Debates, 25 November 1949) अर्थात सामाजिक लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित जीवन पद्धति है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बंधुत्व को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताते हुए चेतावनी दी—“Without fraternity, liberty and equality could not become a natural course of things.”
— (Constituent Assembly Debates, 25 November 1949) अर्थात यदि समाज में बंधुत्व नहीं होगा, तो स्वतंत्रता और समानता टिक नहीं पाएगी।
उन्होंने आगे लोकतंत्र के सामने खड़े खतरे की चेतावनी भी दी—“On the 26th of January 1950, we are going to enter into a life of contradictions. In politics we will have equality and in social and economic life we will have inequality.” (Constituent Assembly Debates, 25 November 1949)
यह चेतावनी स्पष्ट थी कि यदि सामाजिक असमानता बनी रही या समाज में विभाजन गहरा हुआ, तो लोकतंत्र संकट में पड़ सकता है।
यह स्पष्ट करता है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का लक्ष्य सामाजिक समरसता था, न कि स्थायी सामाजिक विभाजन।

यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने ओबीसी आरक्षण का कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं किया था। संविधान में अनुच्छेद 340 के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग आयोग की व्यवस्था की गई, लेकिन व्यापक ओबीसी आरक्षण बाद में मंडल आयोग (1979, बी.पी. मंडल) की सिफारिशों तथा 1990 में वी.पी. सिंह सरकार के निर्णय के बाद लागू किया गया। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने न तो ओबीसी आरक्षण का प्रस्ताव रखा था और न ही इसे संविधान में शामिल किया था।
दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिलता हो जहाँ बहुसंख्यक आबादी को स्थायी रूप से पिछड़ा, वंचित और शोषित घोषित किया गया हो। सामान्यतः इतिहास में अल्पसंख्यक समूहों के शोषण की चर्चा होती है, लेकिन भारत में एक नया विमर्श खड़ा किया जा रहा है जिसमें बहुसंख्यक समाज को ही स्थायी रूप से पीड़ित और शोषित बताया जा रहा है। यह केवल सामाजिक विश्लेषण नहीं, बल्कि एक संगठित वैचारिक निर्माण (Constructed Narrative) प्रतीत होता है, जिसके माध्यम से समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है।
आज बड़े पैमाने पर यह कहा जा रहा है कि हजारों वर्षों तक समाज के एक बड़े वर्ग को पानी तक नहीं पीने दिया गया, उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया और निरंतर शोषण किया गया। सामाजिक विकृतियों का अस्तित्व इतिहास में अवश्य रहा है, लेकिन पूरे समाज को शोषक और शोषित की स्थायी श्रेणी में बाँटना एक अलग प्रकार का वैचारिक निर्माण है।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी पूरी आबादी को “दुष्ट”, “शोषक” या “दोषी” घोषित करना होता है, तो सबसे पहले “काल्पनिक अन्याय” (Imagined Injustice) की एक व्यापक कथा तैयार की जाती है। 20वीं सदी का नाज़ी जर्मनी इसका सबसे भयावह उदाहरण है।
एडॉल्फ हिटलर और उसके प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने जर्मन समाज के भीतर यह धारणा स्थापित की कि जर्मनी की हर समस्या—प्रथम विश्व युद्ध की हार, आर्थिक संकट, बेरोज़गारी—इन सबके पीछे यहूदी समाज का एक संगठित षड्यंत्र है। इस विचार को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि स्कूलों, विश्वविद्यालयों, अखबारों और सांस्कृतिक माध्यमों के जरिए समाज के भीतर गहराई तक स्थापित किया गया।
नाज़ी विचारधारा में यह कहा गया कि जर्मन समाज को “शुद्ध” करने के लिए इस तथाकथित “दोषी वर्ग” को कमजोर करना आवश्यक है। परिणामस्वरूप, एक संपूर्ण समुदाय को ऐतिहासिक अपराधों का दोषी घोषित कर दिया गया, भले ही वर्तमान पीढ़ी का उन घटनाओं से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
आज जब हम जन्म, जाति या वंश के आधार पर किसी पूरे समुदाय को “शोषक” या “दोषी” घोषित करते हैं, तो हम अनजाने में उसी खतरनाक वैचारिक पद्धति की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ऐतिहासिक अन्यायों को पूरी तरह सुधारा नहीं जा सकता। यह एक असंभव लक्ष्य है। और इतिहास में कई बार ऐसे असंभव लक्ष्यों को जानबूझकर जीवित रखा जाता है, ताकि सामाजिक तनाव और वैचारिक संघर्ष बनाए रखा जा सके।
जिन व्यक्तियों के साथ अन्याय हुआ, वे अब जीवित नहीं हैं। जिन्होंने अन्याय किया, वे भी अब नहीं हैं। ऐसे में यदि ऐतिहासिक अन्याय को वर्तमान में सुधारने की बात की जाती है, तो यह व्यक्तियों के स्तर पर नहीं, बल्कि समुदायों के स्तर पर होती है। यही वह बिंदु है जहाँ स्थायी रूप से “पीड़ित समुदाय” और “दोषी समुदाय” की अवधारणा जन्म लेती है।
यह अवधारणा अत्यंत खतरनाक होती है, क्योंकि इससे वर्तमान पीढ़ियों के बीच भी वैमनस्य पैदा होता है। वर्तमान पीढ़ी उन घटनाओं के लिए दोषी ठहराई जाती है जिनसे उसका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। दूसरी ओर, पीड़ित घोषित समुदाय के भीतर स्थायी हीनता बोध और आक्रोश की भावना पैदा होती है।
आज भारत में भी इसी प्रकार का जहरीला विमर्श तैयार किया जा रहा है। 85 प्रतिशत बनाम 15 प्रतिशत की मानसिकता बनाई जा रही है। बहुसंख्यक आबादी को शोषित घोषित किया जा रहा है और दूसरे वर्ग को ऐतिहासिक शोषक बताया जा रहा है। यह केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने का प्रयास प्रतीत होता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने सामाजिक अन्याय का विरोध किया, लेकिन उन्होंने कभी भी पूरे समाज को स्थायी शत्रु वर्गों में विभाजित करने की बात नहीं की। उन्होंने संवैधानिक मार्ग, शिक्षा और सामाजिक सुधार को समाधान माना।
यदि समाज को लगातार शोषक और शोषित की बाइनरी में बाँटा जाता रहा, तो यह वैचारिक संघर्ष धीरे-धीरे सामाजिक टकराव में बदल सकता है। इतिहास बताता है कि जब समाज स्थायी पहचान आधारित संघर्ष में फँसता है, तो वह अंततः व्यापक सामाजिक संघर्ष या गृहयुद्ध जैसी स्थितियों की ओर बढ़ सकता है।
विडंबना यह है कि यह सब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर किया जा रहा है, जबकि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का पूरा चिंतन समाज को जोड़ने का था, न कि विभाजित करने का। उन्होंने सामाजिक न्याय की बात की, लेकिन प्रतिशोध या वर्ग संघर्ष की राजनीति का समर्थन नहीं किया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह समान अवसर, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर आधारित था। समाज में हीनता, घृणा और स्थायी विभाजन की मानसिकता पैदा करना न सामाजिक न्याय है, न ही डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के अनुरूप।
आज जिस प्रकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर शोषक-शोषित की नई रेखाएँ खींची जा रही हैं, “85 बनाम 15” की मानसिकता बनाई जा रही है, और हिंदू समाज को परस्पर टकराव की दिशा में धकेला जा रहा है, वह केवल सामाजिक विभाजन नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर खतरा है। इस प्रक्रिया में वामपंथी, इस्लामी राजनीतिक समूह और ईसाई मिशनरी विचारधाराएँ भी अपने-अपने राजनीतिक और वैचारिक हितों के लिए इस विभाजनकारी विमर्श को बढ़ावा देती दिखाई देती हैं।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर समाज को आपस में लड़ाने, जातिगत वैमनस्य बढ़ाने और शोषक-शोषित की स्थायी रेखाएँ खींचने का प्रयास वास्तव में भारत की सामाजिक एकता को कमजोर करने वाला है। यह प्रवृत्ति यदि इसी प्रकार बढ़ती रही, तो समाज में गहरी दरारें उत्पन्न हो सकती हैं, जो अंततः राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के वास्तविक विचारों को समझा जाए और उनके नाम पर चल रही विभाजनकारी राजनीति को पहचाना जाए। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का मार्ग संघर्ष का नहीं, समरसता का था; विभाजन का नहीं, राष्ट्रनिर्माण का था। यही उनके विचारों की मूल भावना है और यही भारत की सामाजिक एकता का आधार भी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय के नाम पर तैयार किए जा रहे जहरीले विमर्श को समझा जाए और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के वास्तविक चिंतन सामाजिक समरसता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता को केंद्र में रखा जाए। यही भारत के भविष्य और समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
आज जिस प्रकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर “जय भीम जय मीम” जैसे नारे गढ़े जा रहे हैं और दलित-मुस्लिम राजनीतिक समीकरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है, वह डॉ. आंबेडकर के स्पष्ट विचारों और उनके लिखित विश्लेषण के बिल्कुल विपरीत है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भावनात्मक राजनीति के नहीं, बल्कि अध्ययन, तर्क और ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर अपने निष्कर्ष देने वाले विचारक थे।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इस्लाम, मुस्लिम समाज और मुस्लिम राजनीति का गहन अध्ययन किया था। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Pakistan or the Partition of India में उन्होंने स्पष्ट लिखा
“The brotherhood of Islam is not the universal brotherhood of man. It is brotherhood of Muslims for Muslims only.”
Pakistan or the Partition of India, डॉ. बी.आर. आंबेडकर
अर्थात डॉ. आंबेडकर के अनुसार इस्लाम का भाईचारा सार्वभौमिक मानवता पर आधारित नहीं है, बल्कि मुसलमानों तक सीमित है। यह टिप्पणी उन्होंने किसी राजनीतिक विवाद में नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज की संरचना का अध्ययन करने के बाद की थी।
इसी पुस्तक में उन्होंने आगे लिखा
“Islam is both a religion and a social system… Islam can never allow a true Muslim to adopt India as his motherland.” – Pakistan or the Partition of India, डॉ. बी.आर. आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्लाम में मज़हब और राजनीति अलग-अलग नहीं हैं, जिसके कारण आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद के साथ सामंजस्य कठिन हो जाता है। उन्होंने मुस्लिम समाज में सुधार की धीमी गति का भी उल्लेख किया और कहा कि धार्मिक संरचना परिवर्तन को सीमित करती है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने मुस्लिम राजनीति की आलोचना करते हुए यह भी लिखा कि पृथकतावादी राजनीति ने भारत के राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित किया और अंततः विभाजन जैसी स्थिति उत्पन्न हुई। उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति और पृथक पहचान की मांग का भी विश्लेषण किया।
ऐसे स्पष्ट विचार रखने वाले डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को आज “जय भीम जय मीम” जैसे नारों के माध्यम से एक कृत्रिम राजनीतिक समीकरण से जोड़ना उनके विचारों के साथ अन्याय है। डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक न्याय की बात की, लेकिन धार्मिक आधार पर राजनीतिक गठबंधन बनाने का समर्थन कभी नहीं किया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का पूरा चिंतन सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक लोकतंत्र पर आधारित था। उन्होंने समाज को जोड़ने की बात की, न कि नए प्रकार के विभाजन खड़े करने की।
इसलिए “जय भीम जय मीम” जैसे नारे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों की समग्रता के विपरीत हैं और उनके नाम का उपयोग कर नए राजनीतिक समीकरण खड़े करने का प्रयास उनके मूल चिंतन से मेल नहीं खाता।
डॉ. आंबेडकर ने “Who Were the Shudras?” में आर्य आक्रमण सिद्धांत को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि आर्य आक्रमण का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और शूद्र भारतीय समाज का ही अंग थे। उन्होंने शूद्रों को मूलतः क्षत्रिय वर्ग से उत्पन्न बताया, जो सामाजिक संघर्षों के कारण निम्न स्थिति में चले गए।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध मत स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई मत नहीं चुना जो भारत की सांस्कृतिक परंपरा से अलग हो। उनके पास इस्लाम और ईसाई मज़हब स्वीकार करने के प्रस्ताव भी आए थे, लेकिन उन्होंने भारतीय परंपरा से निकले बौद्ध मत को स्वीकार किया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में बौद्ध मत के पतन का कारण इस्लामिक आक्रमण थे।

नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश का उदाहरण देते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा कि बौद्ध शिक्षा केंद्रों को इस्लामिक आक्रमणों के दौरान नष्ट किया गया। यह उनका ऐतिहासिक विश्लेषण था, जिसे उन्होंने मुखरता से प्रस्तुत किया।उन्होंने “The Buddha and His Dhamma” में बुद्ध के विचारों को सामाजिक समरसता, नैतिकता और समानता का आधार बताया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर केवल संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि वे एक गहरे आर्थिक चिंतक भी थे। उनके आर्थिक विचार कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा से स्पष्ट रूप से भिन्न थे। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कम्युनिस्ट विचारधारा की तीखी आलोचना की।
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Buddha or Karl Marx” में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि मार्क्सवाद हिंसा पर आधारित है, जबकि बुद्ध का मार्ग नैतिक परिवर्तन का है। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्टों का लक्ष्य प्राप्त करने का साधन हिंसा और तानाशाही है, जबकि लोकतंत्र और नैतिकता बुद्ध के मार्ग का आधार है।
-दीपक कुमार द्विवेदी
