राष्ट्रीय शैक्षिक नीति में भारतीय ज्ञान परम्पराओं के समावेश से हमने एक कदम आगे रखा है। अब उससे आगे जाकर भारतीय ज्ञान परम्परा प्रशिक्षण की स्वतंत्र व्यवस्था खड़ी करने का मार्ग अपनाना होगा। उससे आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और भारतीय ज्ञान परम्पराओं का समन्वय होगा।
नई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति एन ई पी 2020 के कारण लगभग 35 वर्षों के बाद देश में शैक्षिक व्यवस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हैं। विशेष रूप से प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्पराओं को राष्ट्रीय शैक्षिक नीति में शामिल किए जाने से हजारों वर्षों से भारतीय भूमि की ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति परम्पराओं का अध्ययन करने के लिए एक बहुत बड़ा अवसर उपलब्ध हो रहा है। भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति अत्यंत विशिष्ट थी। धर्मपालजी के शोध ग्रंथ के अनुसार भारत में मैकाले से पूर्व के काल में 3 लाख से अधिक गुरुकुल अस्तित्व में थे। इसका अर्थ है कि उस समय के अखंड भारत में लगभग प्रत्येक 8 से 10 गांवों में एक गुरुकुल अस्तित्व में था।
उनमें सभी वर्णों और जातियों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। बालिकाओं और स्त्रियों के लिए भी स्वतंत्र गुरुकुल कार्यरत थे। प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप कुटुंब शिक्षा, गुरुकुल शिक्षा, आचार्य शिक्षा, विशेष शिक्षा, समाज शिक्षा, संस्कार शिक्षा, अध्यात्म शिक्षा, मंदिर शिक्षा, लोक शिक्षा जैसा था। भारतीय समाज मूलतः ज्ञानाधिष्ठित समाज के रूप में ही जाना जाता था। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार ज्ञान और कौशल प्राप्त करने की सुविधाएं उपलब्ध थीं। 14 विद्याओं और 64 कलाओं की शिक्षा सभी प्रकार की ज्ञान की तृष्णा को शांत करने के लिए
और निःश्रेयस अभ्युदय जैसे जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर होने के लिए सभी को उपलब्ध थी। इसी से सम्पूर्ण विश्व की सबसे उन्नत और समृद्ध सभ्यता के रूप में भारतवर्ष की पहचान थी।
विभिन्न देशों से विद्यार्थी, शिक्षक, व्यापारी भारत की ओर आकर्षित होते थे। यहां रहकर ज्ञान ग्रहण करते थे। भारतीय समृद्धि की आधारशिला यहां की शिक्षा व्यवस्था थी। यही बात पहचानकर अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने का निश्चय किया और उसमें वे अत्यधिक सफल रहे। उन्होंने भारतीयों में भारतीय ज्ञान परम्पराओं के विषय में गलत धारणाएं बैठा दीं। प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल धार्मिक, आध्यात्मिक, कर्मकांडों का वर्णन करने वाला, पूजा, व्रत, उपासना का वर्णन करने वाला है। उसका प्रत्यक्ष जीवन से कोई सम्बंध नहीं है। आज के संसार में उसकी उपयोगिता शून्य है, ऐसी गलत धारणा सामूहिक जनमानस में बैठा दी गई। उससे भारतीय सनातन वैदिक ज्ञान उपहास और उपेक्षा का विषय बन गया।
आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की – पाश्चात्यों की देन है। केवल हां कहने वाले, आज्ञा पालन करने वाले, लाचार गुलाम तैयार करने वाली ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन गई है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने जीवन लक्ष्यहीन, तेजस्विता और आत्मविश्वास से रहित, क्षमता और कौशल के अभाव वाली पीढ़ियों का निर्माण किया है। दिशाहीन, एकांगी, भटकी हुई, भ्रमित ऐसी युवा पीढ़ी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है।
नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानसिक शक्ति का अभाव इस शिक्षा पद्धति ने उत्पन्न किया है। ऐसे में राष्ट्रीय शैक्षिक नीति में भारतीय ज्ञान परम्पराओं का समावेश एक क्रांतिकारी घटना है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के पुनरुत्थान की दिशा में यह पहला कदम है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मार्गदर्शक सूत्रों के अनुसार सम्पूर्ण शिक्षा क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परम्पराओं का विभिन्न पहलुओं से अध्ययन प्रारम्भ हो गया है। निश्चित रूप से यह अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है। 2020 से 2025 तक इन 5 वर्षों में विभिन्न प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं। प्रशिक्षण और उपक्रम कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
इसमें अखिल भारतीय तकनीकी संस्थान में आई. के. एस. नामक विभाग बनाया गया। उनके द्वारा कुछ सम्मेलनों का आयोजन किया गया। कुछ प्रदर्शनियां और प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं चलाई गईं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों के लिए 3 दिवसीय / 6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग कार्यक्रमों में भारतीय ज्ञान परम्परा प्रशिक्षण को शामिल किया गया।
तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में भी आई. के. एस. का स्वतंत्र विभाग बनाया गया। प्रत्येक महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में आई. के. एस. विभाग और आई. के. एस. समन्वयक की संरचना बनाई गई। उनके द्वारा सभाओं, सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है। तथा आई. आई. टी., आई. आई. एम. आदि संस्थाओं ने भी इसमें पहल की है। इससे भारतीय ज्ञान परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर भी अनेक प्रकार के कार्यक्रम, पॉडकास्ट हो रहे हैं। उनके द्वारा भी भारतीय ज्ञान परंपराओं के प्रचार-प्रसार में सहयोग मिल रहा है।
skill india : परंतु इन सबमें कमी यह है कि सरकार द्वारा अनिवार्य किए जाने के कारण ये उपक्रम चल रहे हैं। सरकारी आर्थिक सहायता मिल रही है, इसलिए सभाएं और सम्मेलन हो रहे हैं। भारतीय ज्ञान परम्पराओं को समझकर, उनका अध्ययन करके उनका वैज्ञानिक रूप से अंगीकार नहीं किया जा रहा। महाविद्यालयों के प्राध्यापकों और अन्य कर्मचारियों को आई. के. एस. एक अतिरिक्त कार्य का बोझ लगता है। इन सभी में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। भारतीय ज्ञान परम्पराओं के प्रति जागरूकता तो आ रही है। परंतु अपेक्षित लक्ष्य की ओर प्रगति होती नहीं दिखती। एक प्रकार की लापरवाही और सतही दृष्टिकोण दिखाई दे रहा है। इसका कारण भारतीय ज्ञान परम्पराओं के प्रति नकारात्मक सोच है। इसमें किसी का दोष नहीं है। कुल मिलाकर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ही इस प्रकार एकांगी बन गई है, यही वास्तविकता है।
इसके साथ ही भारतीय ज्ञान परम्पराएं अर्थात सनातन वैदिक आर्य हिंदू भारतीय ज्ञानपरम्पराएं हैं, इसका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करने की आवश्यकता है।
व्यर्थ में धर्मनिरपेक्षता के विचार की बाधा बीच में लाने की आवश्यकता नहीं है। इंडिया कहने पर हमारा विचार अधिकतम पिछले दो-तीन सौ वर्षों तक जाता है। भारत कहने पर हमारा विचार रामायण-महाभारत से लेकर सत्य, कृत, द्वापर और कलि जैसे महायुगों के, कल्प और मन्वंतर के इतिहास तक, वैदिक काल तक हजारों-लाखों वर्षों तक पीछे चला जाता है। भारतीय ज्ञान परम्पराएं सही अर्थों में वैज्ञानिक ज्ञान परम्पराएं हैं और इसीलिए उनका अस्तित्व हजारों वर्षों से है, यह हम सभी को ध्यान में रखना आवश्यक है।
–प्रो. क्षितिज पाटुकले

