बंगाल इस समय एक दोराहे पर खड़ा है। एक ओर वह ‘ममता मॉडल’ है जिसने कल्याणकारी योजनाएं तो दीं, किंतु साथ ही हिंसा और भ्रष्टाचार का ऐसा तंत्र विकसित किया, जिसने राज्य की लोकतांत्रिक साख को हिला दिया। दूसरी ओर ‘आशोल पोरिबोर्तन’ (असली परिवर्तन) का वादा है, जिसे भाजपा एक विकल्प के रूप में पेश कर रही है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति कभी भी केवल मतपेटियों का खेल नहीं रही। यह वर्चस्व, विचारधारा और अस्तित्व की वह लड़ाई है जहां ’रक्त’ और ’रंग’ (लाल, हरा और अब भगवा) प्राय: एक-दूसरे में मिल जाते हैं। बैशाख की तपती धूप और लू के थपेड़ों के बीच जब बंगाल विधानसभा चुनावों का प्रचार कई चरणों से गुजर रहा है तो हवाओं में एक अजीब सी बेचैनी है, यह बेचैनी किसी बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। प्रश्न अब मात्र यह नहीं है कि नबान्नो (सचिवालय) की सत्ता पर कौन बैठेगा बल्कि यह है कि क्या बंगाल की लहूलुहान चुनावी अपसंस्कृति इस बार परिवर्तन के जनादेश को स्वीकार कर पाएगी?
इस बार की लड़ाई ममता बनर्जी के लिए पिछले एक दशक की सबसे कठिन परीक्षा सिद्ध हो रही है। स्वयं मुख्य मंत्री के वक्तव्यों में वह आत्मविश्वास अब डगमगाता दिख रहा है जो कभी उनकी पहचान हुआ करता था। उनके हालिया शब्द ‘अगर तृणमूल रहा तो फिर मिलेंगे’, राजनीतिक गलियारों में महज एक विदाई सम्बोधन नहीं बल्कि सत्ता खिसकने के डर की स्वीकारोक्ति माने जा रहे हैं। जब एक ऐसा नेता जो ’अपराजेय’ माना जाता हो, वह स्वयं अपनी पार्टी के अस्तित्व पर ’अगर’ लगाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि बंगाल की जनता अब ’चुपचाप कमल छाप’ या किसी बड़े विकल्प की ओर मन बना चुकी है।

चुनाव आयोग का सख्त दृष्टिकोण और ‘वोटर लिस्ट’ का जिन्न
2026 के इस चुनाव में एक अलग ही तेवर में है। 2021 की चुनाव-पश्चात हिंसा ने संवैधानिक संस्थाओं पर जो दाग लगाए थे, आयोग इस बार उन्हें धोने के लिए कृतसंकल्प दिख रहा है। चरणों की संख्या को लेकर मचे घमासान और केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती ने सत्ताधारी दल के ’चुनावी प्रबंधन’ को भारी चोट पहुंचाई है। सबसे बड़ा विवाद ’वोटर लिस्ट’ को लेकर है। भाजपा और नागरिक समाज द्वारा सीमावर्ती जिलों में फर्जी मतदाताओं और रोहिंग्या घुसपैठियों के नाम शामिल करने के आरोपों ने इस चुनाव को ’जनसांख्यिकीय सुरक्षा’ बनाम ’वोट बैंक राजनीति’ की लड़ाई बना दिया है। आयोग द्वारा मतदाता सूची की विशेष छंटनी सख्ती ने उन समीकरणों को बिगाड़ दिया है जो दशकों से एक खास दल को बढ़त दिलाते आए थे।

मालदा कांड और कानून-व्यवस्था पर उठते प्रश्न
चुनाव के ऐन पहले मालदा में हुई साम्प्रदायिक हिंसा और संदेशखाली जैसे प्रकरणों ने बंगाल की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी है। मोथाबाड़ी की घटना ने पश्चिम बंगाल में केवल आंतरिक सुरक्षा की स्थिति पर ही प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया बल्कि उसने उस ’बंगाली भद्रलोक’ के गौरव को भी ठेस पहुंचाई है जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का दावा करता था। इन घटनाओं ने महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय प्रशासन अब निष्पक्ष नहीं रहा। कानून-व्यवस्था का गिरता स्तर भाजपा के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गया है। जहां टीएमसी इसे ’बाहरी साजिश’ बता रही है, वहीं जनता के बीच यह प्रश्न गूंज रहा है कि यदि सत्ता सुरक्षित नहीं रख सकती तो उसे सत्ता में रहने का अधिकार क्या है?
ओपिनियन पोल और जमीनी वास्तविकताओं का द्वंद्व
विभिन्न सर्वे और ओपिनियन पोल्स इस बार एक ’हंग असेंबली’ या तृणमूल की निर्णायक बढ़त की ओर संकेत कर रहे हैं। हालांकि बंगाल में सर्वे प्राय: फेल होते रहे हैं, परंतु जमीनी स्तर पर इस बार हवा की दिशा भांपना कठिन नहीं है। ग्रामीण बंगाल, जो कभी टीएमसी का अभेद्य दुर्ग था, अब ’भ्रष्टाचार’ और ’कट-मनी’ के बोझ तले कराह रहा है। ’लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने भले ही एक वर्ग को साधा हो, पर युवाओं में बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों में हुए महा-घोटालों ने एक गहरा आक्रोश पैदा किया है। उत्तर बंगाल और जंगलमहल में भाजपा की पकड़ पहले से ही मजबूत थी, परंतु इस बार दक्षिण बंगाल और कोलकाता के शहरी क्षेत्रों में भी ’परिवर्तन’ की गूंज सुनाई दे रही है।
ममता बनर्जी का नेतृत्व: ढहता हुआ तिलिस्म?
ममता बनर्जी निस्संदेह एक योद्धा रही हैं, किंतु 2026 में उनकी ’अकेली शेरनी’ वाली छवि पर अपनों के ही भ्रष्टाचार के दाग गहरे हो गए हैं। उनके भतीजे और पार्टी के दूसरे कमान अभिषेक बनर्जी की रणनीतियों और पुराने गार्ड्स के बीच का असंतोष जगप्रसिद्ध है। जब ममता कहती हैं कि ‘अगर तृणमूल रहा …’, तो वह वास्तव में अपने कैडर को यह संदेश दे रही हैं कि पार्टी अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यह वक्तव्य उनकी कमजोरी नहीं बल्कि उस हार का पूर्वाभास है जिसे उन्होंने कदाचित् दीवारों पर लिखा हुआ पढ़ लिया है।
चुनाव परिणाम के बाद की भयावह चुनौतियां
बंगाल का असली डर वोटिंग नहीं बल्कि वोटिंग के बाद का ’प्रतिशोध’ है। इतिहास साक्षी है कि यहां सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण नहीं होता। भाजपा की सम्भावित जीत या टीएमसी की सीटों में भारी गिरावट के बाद, कार्यकर्ताओं के बीच होने वाला ’खून-खराबा’ सबसे बड़ी चिंता है।
केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के लिए चुनौती यह है कि चुनाव सम्पन्न होने के बाद भी केंद्रीय बलों को कम से कम 2 महीने तक संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात रखा जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ’परिवर्तन’ का स्वागत रक्तपात से होने की आशंका है। नागरिक सुरक्षा आज बंगाल में सबसे बड़ी मांग बन गई है।
बंगाल की समस्या का समाधान केवल सत्ता परिवर्तन में नहीं बल्कि ’संस्थागत सुधार’ में है।
1. पुलिस का वि-राजनीतिकरण: पुलिस को पार्टी के कैडर के रूप में काम करना बंद करना होगा।
2. नागरिक समितियों का गठन: मोहल्लों और गांवों में सर्वदलीय शांति समितियों का गठन हो जो परिणामों के बाद हिंसा रोकने के लिए उत्तरदायी हों।
3. कठोर दंड: राजनीतिक हिंसा में शामिल अपराधियों पर त्वरित न्यायालयों में मुकदमा चले, चाहे वे किसी भी दल के हों।
बंगाल की जनता ने वामपंथ का अंधकार देखा और तृणमूल का अत्याचार भी सहा। अब समय ’सोनार बांग्ला’ के वास्तविक पुनर्निर्माण का है। भाजपा का 2026 का संकल्प पत्र केवल वादों का पुलिंदा नहीं बल्कि उस गौरवशाली बंगाल की वापसी का मार्ग है जहां रवींद्रनाथ टैगोर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने जीवित थे।
अमित शाह ने कोलकाता की रैली में कहा था कि बंगाल बदलाव के लिए तैयार है और यह बदलाव 2026 में इतिहास रचेगा।-विप्लव विकास
